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12th UP

12 up board hindi ,rashtra ka swaroop,vasudev sharan agrawal,राष्ट्र का स्वरुप ,वासुदेव शरण अग्रवाल

September 6, 2022
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12 up board hindi ,rashtra ka swaroop,vasudev sharan agrawal,राष्ट्र का स्वरुप ,वासुदेव शरण अग्रवाल

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राष्ट्र का स्वरूप, वासुदेव शरण अग्रवाल

rashtra ka swaroop,vasudev sharan agrawal

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निर्देशः गद्य भाग में आपकों गद्य पाठों में से कोई दो गद्यांश दिये जाएगे, आपको अपनी सुविधा के अनुसार एक ही गद्यांश चुनना है, गद्यांश में दो-दो अंक के पाँच प्रश्न होगे, इनमें से एक प्रश्न में पाठ एवं लेखक का नाम पूछा जाएगा, एक प्रश्न में रेखांकित पंक्ति की व्याख्या करना है, शेष तीन प्रश्न गद्यांश से संबंधित होगे।


संकेत-1 भूमि, भूमि पर बसने वाला ………………………… आवश्यक धर्म है।
भूमि, भूमि पर बसने वाला जन और जन की संस्कृति, इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है।
भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनंत काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरित होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथिवी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है। जो राष्ट्रीयता पृथिवी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जडें़ पृथिवी में जितनी गहरी होगी उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवति होगा। इसलिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।
प्रश्न-1 राष्ट्र का स्वरूप कैसे बनता है ?
उत्तर भूमि, जन और संस्कृति के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है।
प्रश्न-2 भूमि के प्रति हमारा आवश्यक कर्तव्य क्या है ?
उत्तर भूमि के भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा कर्त्तव्य है।
प्रश्न-3 भूमि के प्रति हमारी राष्ट्रीयता कब बलवती होगी ?
उत्तर भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरित होगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती होगी।
प्रश्न-4 राष्ट्रीय विचारधारा की जननी किसे कहा है ?
उत्तर पृथिवी राष्ट्रीय विचारधारा की जननी है।
प्रश्न-5 राष्ट्रीयता निर्मूल कब हो जाती है ?
उत्तर जब तक राष्ट्रीयता की भावना पृथिवी से न जुडी हो, वह राष्ट्रीयता निर्मूल रहती है।
प्रश्न-6 राष्ट्रीय भावों का अंकुर कब पल्लवित होगा ?
उत्तर राष्ट्रीयता की जड़े पृथिवी में जितनी गहरी होगी उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा।
प्रश्न-7 लेखक ने आवश्यक धर्म किसे माना है ?
उत्तर पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना हमारा आवश्यक धर्म है।
प्रश्न-8 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है – वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-2 इस कर्तव्य की पूर्ति सैकड़ों ………………………… उजाला दिखाई देगा।
इस कर्त्तव्य की पूर्ति सैकडों-हजारों प्रकार से होनी चाहिए। पृथिवी से जिस वस्तु का संबंध है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उसका कुशल-प्रश्न पूछने के लिए हमें कमर कसनी चाहिए। पृथिवी का सांगोपांग अध्ययन जागरणशील राष्ट्र के लिए बहुत हीे आनंदप्रद कर्त्तव्य माना जाता है। गाँवों और नगरों में सैकड़ों केन्द्रों से इस प्रकार के अध्ययन का सूत्रपात होना आवश्यक है।
उदाहरण के लिए, पृथिवी की उपजाऊ शक्ति को बढाने वाले मेघ जो प्रतिवर्ष समय पर आकर अपने अमृत जल से इसे सींचते हैं; हमारे अध्ययन की परिधि के अंतर्गत आने चाहिए। उन मेघजलों से परिवर्द्धित प्रत्येक तृणलता और वनस्पति का सूक्ष्म परिचय प्राप्त करना ही हमारा कर्त्तव्य है।
इस प्रकार जब चारों ओर से हमारे ज्ञान के कपाट खुलेंगे, तब सैकड़ों वर्षाें से शून्य और अंधकार से भरे हुए जीवन के क्षेत्रांे में नया उजाला दिखायी देगा।
उदाहरण के लिए
प्रश्न-1 किस कर्तव्य की पूर्ति सैकड़ों-हजारों प्रकार से होनी चाहिए ?
उत्तर पृथिवी के भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति जो हमारा कर्त्तव्य है, इसकी पूर्ति सैकड़ों-हजारों प्रकार से होनी चाहिए।
प्रश्न-2 पृथिवी के सांगोपांग अध्ययन को लेखक ने क्या माना है ?
उत्तर पृथिवी के सांगोपांग अध्ययन को लेखक ने आनन्दप्रद कर्त्तव्य माना है।
प्रश्न-3 लेखक ने किस कार्य को परिधि में आने वाला कर्तव्य बतलाया है ?
उत्तर मेघजलों से परिवर्द्धित प्रत्येक तृणलता और वनस्पति का सूक्ष्म परिचय प्राप्त करना कर्त्तव्य परिधि में आता है।
प्रश्न-4 लेखक के अनुसार नया उजाला कब दिखाई देगा ?
अथवा
ज्ञान के कपाट खुलने पर क्या होगा ?
उत्तर जब हमारे ज्ञान के कपाट खुलेगें, तब जीवन के क्षेत्रों में नया उजाला दिखाई देगा।
प्रश्न-5 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-3 धरती माता की कोख में ………………………… ज्ञान होना भी आवश्यक है।
धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं जिनके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है उससे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों-करोडों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं की पृथिवी के गर्भ में पोषण मिला है। दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथिवी की देह को सजाया है। हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच-पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है। पृथिवी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों से सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं। नाना भाँति के अनगढ़ नग विन्ध्य की नदियों के प्रवाह में सूर्य की धूप से चिलकते रहते हैं, उनको जब चतुर कारीगर पहलदार कटाव पर लाते हैं तब उनके प्रत्येक घाट से नयी शोभा और सुन्दरता फूट पड़ती है, वे अनमोल हो जाते हैं। देश के नर-नारियों के रूप-मंडन और सौन्दर्य-प्रसाधन में इन छोटे पत्थरों का भी सदा से कितना भाग रहा है; अतएव हमें उनका ज्ञान होना भी आवश्यक है।
प्रश्न-1 धरती वसुन्धरा क्यों कहलाती है ?
उत्तर धरती माता की कोख में अमूल्य निधियाँ भरी है, जिसके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है।
प्रश्न-2 पृथिवी की देह को किसने सजाया है ?
उत्तर नदियों पहाड़ों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टी से पृथिवी की देह को सजाया है।
प्रश्न-3 पत्थर सौन्दर्य के प्रतीक कब बन जाते हैं ?
उत्तर ये पत्थर कुशल शिल्पियों द्वारा सँवारे जाने पर सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं।
प्रश्न-4 घाट अनमोल कब हो जाते है ?
उत्तर जब चतुर कारीगर अनगढ़ नगों को पहलदार कटाव पर लाते है, तो घाट सुन्दर हो जाते है और वे अनमोल हो जाते है।
प्रश्न-5 नर-नारियों के सौन्दर्य प्रसाधन में किनका हाथ होता है ?
अथवा
सौन्दर्य प्रसाधनों के माध्यम से लेखक ने किस ओर ध्यान दिलाया है ?
उत्तर नर-नारियों के सौन्दर्य प्रसाधन नदियों द्वारा लाई गये पत्थरों से ही निर्मित होते है।
प्रश्न-6 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-4 पृथिवी और आकाश के अन्तराल ………………………… प्राप्त किया जा सकता है।
पृथिवी और आकाश के अंतराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथिवी के चारों ओर फैले हुए गंभीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सब के प्रति चेतना और स्वागत के नये भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नयी किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब तक हम सोए हूए के समान हैं।
विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अथक परिश्रम के द्वारा नित्य आगे बढ़ाना चाहिए। हमारा यह ध्येय हो कि राष्ट्र में जितने हाथ हैं उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना रीता न रहे। तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और समग्र रूपमंडन प्राप्त किया जा सकता है।
प्रश्न-1 लेखक के अनुसार किनके प्रति चेतना और स्वागत के नए भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए ?
उत्तर इस धरती पर जो सागर है, सागर में जो जलचर है, रत्न राशियाँ है, उनके प्रति भी चेतना और स्वागत के नए भाव राष्ट्र में फैलना चाहिए।
प्रश्न-2 लेखक के अनुसार हम कब तक सोये हुए के समान है ?
उत्तर धरती और आकाश के बीच जो कुछ भी है, उनके प्रति यदि हमारे हृदय में जिज्ञासा की नई किरण नहीं फूटेगी तब तक हम सोये हुए के समान है।
प्रश्न-3 विज्ञान और उद्यम को मिलाकर लेखक क्या खड़ा करना चाहता है ?
उत्तर विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का नया ठाट खड़ा करना चाहता है। ?
प्रश्न-4 लेखक के अनुसार हमारा ध्येय क्या होना चाहिए ?
अथवा
मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और रूपमंडन को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर लेखक के अनुसार हमारा ध्येय होना चाहिए कि राष्ट्र में जितने हाथ है, उसमें से कोई राष्ट्र को समुन्नत के कार्य में भाग लिए बिना रीता न रहे, तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और समग्र रूपमंडन प्राप्त हो सकेगा।
प्रश्न-5 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-5 मातृभूमि पर निवास करने ………………………… माता पृथिवी को प्रणाम है।
मातृभूमि पर निवास करने वाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथिवी हो और मनुष्य न हों, तो राष्ट्र की कल्पना असंभव है। पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का स्वरूप संपादित होता है। जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थाें में पृथिवी का पुत्र है –
(माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।)

  • भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ।
    जन के हृदय में इस सूत्र का अनुभव ही राष्ट्रीयता की कुंजी है। इसी भावना से राष्ट्र-निर्माण के अंकुर उत्पन्न होते हैं।
    यह भाव जब सशक्त रूप में जागता है तब राष्ट्र-निर्माण के स्वर वायुमंडल में भरने लगते हैं। इस भाव के द्वारा ही मनुष्य पृथिवी के साथ अपने सच्चे संबंध को प्राप्त करते हैं। जहाँ यह भाव नहीं है वहाँ जन और भूमि का संबंध अचेतन और जड़ बना रहता है। जिस समय भी जन का हृदय भूमि के साथ माता और पुत्र के संबंध को पहचानता है उसी क्षण आनंद और श्रद्धा से भरा हुआ उसका प्रणाम-भाव मातृभूमि के लिए इस प्रकार प्रकट होता है –
    (नमो मात्रे पृथिव्यै। नमो मात्रे पृथिव्यै।)
    माता पृथिवी को प्रणाम है। माता पृथिवी को प्रणाम है।
    प्रश्न-1 लेखक ने राष्ट्र का दूसरा अंग किसे कहा है ?
    उत्तर भूमि पर निवास करने वाले मनुष्य अथवा जन को लेखक ने राष्ट्र का दूसरा अंग कहा है।
    प्रश्न-2 राष्ट्र का स्वरूप किससे सम्पादित होता है ?
    उत्तर पृथिवी और जन के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप सम्पादित होता है।
    प्रश्न-3 किसके कारण पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है ?
    उत्तर जन के कारण पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है।
    प्रश्न-4 राष्ट्रीयता की कुंजी क्या है ? ‘अथवा’ किस भावना से राष्ट्र निर्माण का अंकुर उत्पन्न होता है?
    अथवा
    किस भाव के अभाव में जन और भूमि का संबंध अचेतन और जड हो जाएगा ?
    उत्तर ‘भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ’ जन के हृदय में इस सूत्र का अनुभव ही राष्ट्रीयता की कंुजी है। इसके अभाव में जन और भूमि का संबंध अचेतन और जड हो जाएगा।
    प्रश्न-5 भूमि के साथ माता-पुत्र का संबंध होने पर क्या भाव प्रकट होगा ?
    उत्तर भूमि के साथ माता-पुत्र का संबंध होने पर ”माता पृथिवी को प्रणाम, माता पृथिवी को प्रणाम“ यह भाव प्रकट होगा।
    प्रश्न-6 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
    उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-6 माता पृथिवी को प्रणाम ………………………… पहले ध्यान देना चाहिए।
यह प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़ बन्धन है। इसी दृढ़ भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जाता है। इसी दृढ़ चट्टान पर राष्ट्र का चिर जीवन आश्रित रहता है। इसी मर्यादा को मानकर राष्ट्र के प्रति मनुष्यों के कर्त्तव्य और अधिकारों का उदय होता है। जो जन पृथिवी के साथ माता और पुत्र के संबंध को स्वीकार करता है, उसे ही पृथिवी के वरदानों में भाग पाने का अधिकार है। माता के प्रति अनुराग और सेवाभाव पुत्र का स्वाभाविक कर्त्तव्य है। वह एक निष्कारण धर्म है। स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अधःपतन को सूचित करता है। जो जन मातृभूमि के साथ अपना संबंध जोड़ना चाहता है उसे अपने कर्त्तव्यों के प्रति पहले ध्यान देना चाहिए।
प्रश्न-1 भूमि और जन का दृढ़ बंधन क्या है ? ‘अथवा’ राष्ट्र भवन किस भावना से तैयार होगा ?
अथवा
राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और अधिकार का उदय कब होगा ?
उत्तर ”माता पृथिवी को प्रणाम है, माता पृथिवी को प्रणाम है“ यह भाव ही भूमि और जन का दृढ़ बंधन है। इसी भाव से राष्ट्र का भवन तैयार होता है। माता पृथिवी को प्रणाम इसी मर्यादा को मानने पर कर्त्तव्य और अधिकारों का उदय होगा।
प्रश्न-2 लेखक के अनुसार पृथिवी का वरदान किसे प्राप्त होगा ?
उत्तर जो जन, भूमि के साथ माता-पुत्र का संबंध स्वीकार करता है, उसे ही पृथिवी के वरदान का अधिकारी माना जाना चाहिए।
प्रश्न-3 पुत्र का स्वाभाविक कर्तव्य क्या है ?
उत्तर माता के प्रति अनुराग और सेवा भाव पुत्र का स्वाभाविक कर्तव्य है।
प्रश्न-4 स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम किस बात का सूचक है ?
उत्तर स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अद्यः पतन का सूचक है।
प्रश्न-5 मातृभूमि के साथ संबंध जोड़ने वालों को लेखक ने क्या सलाह दी है ?
उत्तर लेखक के अनुसार जो जन मातृभूमि के साथ अपना संबंध जोड़ना चाहता है, उसे अपने कर्त्तव्यों के प्रति पहले ध्यान देना चाहिए।

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संकेत-7 माता अपने सब पुत्रों ………………………… भावना से संचालित होना चाहिए।
माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथिवी पर बसने वाले जन बराबर हैं। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है वह समान अधिकार का भागी है। पृथिवी पर निवास करने वाले जनों का विस्तार अनंत है – नगर और जनपद, पुर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले हैं, फिर भी मातृभूमि के पुत्र हैं और इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो संबंध है उसमें कोई भेदभाव उत्पन्न नहीं हो सकता। पृथिवी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र है। समन्वय के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है। किसी जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। अतएव राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी होगी। राष्ट्र के शरीर के एक भाग में यदि अंधकार और निर्बलता का निवास है तो समग्र राष्ट्र का स्वास्थ्य उतने अंश में असमर्थ रहेगा इस प्रकार समग्र राष्ट्र को जागरण और प्रगति की एक जैसी उदार भावना से संचालित होना चाहिए।
प्रश्न-1 माता और भूमि में क्या साम्य है ?
उत्तर जैसे माता अपनी सभी सन्तानों के प्रति समान भाव रखती है, वैसे ही धरती भी सभी जन के प्रति समान भाव रखती है, उसमें भी ऊँच-नीच का भाव नहीं होता है।
प्रश्न-2 लेखक के अनुसार समान अधिकार का भागी कौन है ?
उत्तर लेखक के अनुसार जो मातृभूमि के उदय के साथ जुडा है, वह समान अधिकार का भागी है।
प्रश्न-3 लेखक ने यह क्यों कहा कि भूमि का सौहार्द भाव अखंड है ?
उत्तर इस भूमि पर अनेक जन बसते है, सबके अलग-अलग धर्म है, भाषा है, रहन-सहन, खान-पान में भिन्नता है, फिर भी कोई भेद भाव नहीं है, इस कारण उनका भूमि के प्रति सौहार्द भाव अखण्ड है।
प्रश्न-4 लेखक के अनुसार किस स्थिति में राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता ?
उत्तर लेखक के अनुसार किसी जन को पीछे छोड़कर कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रश्न-5 ”राष्ट्र और जन में अन्योन्याश्रय संबंध है,“ कैसे ?
उत्तर राष्ट्र रूपी शरीर के किसी एक अंग में यदि अंधकार और निर्बलता का निवास है तो समग्र राष्ट्र पर उसका प्रभाव पड़ता है, इस तरह कहा जा सकता है कि राष्ट्र और जन में अन्योन्याश्रय संबंध है।
प्रश्न-6 राष्ट्र को किस भावना से जाग्रत होना चाहिए ?
उत्तर राष्ट्र को जागरण और प्रगति की एक जैसी उदार भावना से संचालित होना चाहिए।
प्रश्न-7 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-8 जन का प्रवाह अनन्त ………………………… घाटों का निर्माण करना होता है।
जन का प्रवाह अनंत होता है। सहस्त्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातःकाल भुवन को अमृत से भर देती हैं तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र-निवासी जन नयी उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर हैं। जन का संततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।
प्रश्न-1 लेखक ने किसके प्रवाह को अनन्त कहा है और क्यों ?
उत्तर लेखक ने जन के प्रवाह को अनन्त कहा है क्योंकि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली सतत प्रक्रिया है।
प्रश्न-2 राष्ट्रीय जन का जीवन कब तक अमर है ?
उत्तर राष्ट्रीय जन का जीवन तब तक अमर है, जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातः काल भुवन को अमृत से भरती रहेगी।
प्रश्न-3 किस स्थिति के उपरान्त भी राष्ट्र निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर अमर है ?
उत्तर इतिहास के अनेक उतार चढ़ाव पार करने के उपरान्त भी राष्ट्र निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर अमर है।
प्रश्न-4 जन का प्रवाह किसकी भाँति है और उसे किसका निर्माण करना है ?
उत्तर जन का प्रवाह सतत प्रवाही नदी की भाँति है, जिसके किनारों पर उत्थान के घाटों का निर्माण करना है।
प्रश्न-5 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संस्कृति

संकेत-9 राष्ट्र का तीसरा अंग ………………………… समन्वय पर निर्भर है।
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंधमात्र है; संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि संभव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिये जायें तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अंतर्निहित है। ज्ञान और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है। भूमि पर बसने वाले जन ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा है और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, दोनों के रूप में हमें राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते हैं। जीवन के विकास की युक्ति ही संस्कृति के रूप में प्रकट होती है। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ इस युक्ति को निश्चित करती है और उससे प्रेरित संस्कृति का विकास करती है। इस दृष्टि से प्रत्येक जन की अपनी-अपनी भावना के अनुसार पृथक्-पृथक् संस्कृतियाँ राष्ट्र में विकसित होती हैं, परन्तु उन सबका मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय पर निर्भर है।
प्रश्न-1 लेखक ने राष्ट्र का तीसरा अंग किसे कहा है ?
उत्तर लेखक ने जन संस्कृति को राष्ट्र का तीसरा अंग कहा है।
प्रश्न-2 सभ्यता के निर्माण का श्रेय किसे है, लेखक ने इसकी किसकी संज्ञा दी है ?
उत्तर सभ्यता के निर्माण का श्रेय लेखक ने मनुष्य को दिया है, लेखक ने इसे जीवन की श्वास प्रश्वास की संज्ञा दी है।
प्रश्न-3 संस्कृति के बारे में लेखक ने क्या कहा है ?
उत्तर संस्कृति के अभाव में जन की कल्पना कबंध मात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है, संस्कृति द्वारा राष्ट्र वृद्धि संभव है। इसके अभाव में राष्ट्र का लोप हो जाएगा। संस्कृति ही जीवन विटप का पुष्प है। संस्कृति ही ज्ञान और कर्म का समन्वय करती है।
प्रश्न-4 लेखक के अनुसार राष्ट्र की वृद्धि कब संभव है ?
उत्तर लेखक के अनुसार संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र वृद्धि संभव है।
प्रश्न-5 राष्ट्र के लिए जन और भूमि के साथ और किसका स्थान महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर राष्ट्र के लिए जन और भूमि के साथ संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
प्रश्न-6 किस स्थिति में राष्ट्र का लोप हो जाएगा ?
उत्तर संस्कृति से विरहित हो जाने पर राष्ट्र का भी लोप हो जाएगा।
प्रश्न-7 जीवन के विटप का पुष्प किसे कहा है ? यह भी बतलाइए कि जीवन का सौन्दर्य और यश किसमें अन्तर्निहित है?
उत्तर जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति को कहा है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है।
प्रश्न-8 संस्कृति क्या है ?
अथवा
किन दो रूपों में राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते है ?
उत्तर ज्ञान और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है, मनुष्य द्वारा ज्ञान से सोचा और कर्म से रचा, इन दोनों रूपों में हमें संस्कृति के दर्शन होते है।
प्रश्न-9 जीवन के विकास की युक्ति किस रूप में प्रकट होती है और इसका विकास कैसे होता है ?
उत्तर जीवन के विकास की युक्ति संस्कृति रूप में प्रकट होती है। जन जब अपनी विशेषताओं से युक्ति को निश्चित करता है, तो संस्कृति का विकास होता है।
प्रश्न-10 अलग-अलग संस्कृतियों का मूल आधार क्या है ?
उत्तर अलग-अलग संस्कृतियों का मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय है।
प्रश्न-11 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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संकेत-10 ;पद्ध जंगल में जिस प्रकार ………………………… राष्ट्र का सुखदायी रूप है।
जंगल में जिस प्रकार अनेक लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य भाव से उठते हुए पारस्परिक सम्मिलन से अवरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन अपनी संस्कृतियों के द्वारा एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र में रहते हैं। जिस प्रकार जल के अनेक प्रवाह नदियों के रूप में मिलकर समुद्र में एकरूपता प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवन की अनेक विधियाँ जल के अनेक प्रवाह नदियों के रूप में मिलकर समुद्र में एकरूपता प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवन की अनेक विधियाँ राष्ट्रीय संस्कृति में समन्वय प्राप्त करती हैं। समन्वय युक्त जीवन ही राष्ट्र का सुखदायी रूप है।
;पपद्ध साहित्य, कला, नृत्य ………………………… राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।
साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विश्वव्यापी आनंद-भाव है वह इन विविध रूपों में साकार होता है। यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखायी पड़ते हैं, किन्तु आंतरिक आनंद की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता है। जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनंद-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनंदित होता है। इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।
प्रश्न-1 संस्कृति में भेद होते हुए भी राष्ट्र जन कैसे रहते है ?
उत्तर जिस प्रकार जंगल में अनेक लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य भाव से उठते हुए पारस्परिक सम्मिलन से अवरोधी स्थिति प्राप्त करते है, उसी प्रकार जन भी भेद होते हुए भी एक दूसरे के साथ रहते है।
प्रश्न-2 राष्ट्रीय जीवन की अनेक विधियाँ संस्कृति में कैसे समन्वय प्राप्त करती है ?
उत्तर जिस प्रकार अलग-अलग नदिया एक ही सागर में मिलकर एकरूपता प्राप्त करती है, उसी प्रकार अनेक विधियाँ संस्कृति में समन्वय प्राप्त करती है।
प्रश्न-3 राष्ट्र का सुखदायी रूप किसे कहा है ?
उत्तर समन्वययुक्त जीवन को राष्ट्र का सुखदायी रूप कहा है।
प्रश्न-4 राष्ट्रीय जन अपने मानसिक भावों को किस रूप में प्रकट करते है ?
उत्तर राष्ट्रीय जन अपने मानसिक भावों को साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद के रूप में प्रकट करते है।
प्रश्न-5 आत्मा का विश्वव्यापी आनन्द भाव किस रूप में साकार होता है ?
उत्तर आत्मा का विश्वव्यापी आनन्द भाव साहित्य, कला, नृत्य, गीत और अमोद-प्रमोद के रूप में साकार होता है।
प्रश्न-6 संस्कृति के बाह्य और आन्तरिक रूप की क्या विशेषता है ?
उत्तर संस्कृति के बाह्य लक्षण अनेक दिखाई पड़ते है किन्तु आन्तरिक आनन्द की दृष्टि से उसमें एक सूत्रता है, यही इसकी विशेषता है।
प्रश्न-7 सहृदय व्यक्ति की क्या विशेषता है ?
उत्तर सहृदय व्यक्ति की विशेषता है कि वह प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है।
प्रश्न-8 कौनसी भावना राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है ?
उत्तर विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए उदार भावना ही स्वास्थ्यकर है।
प्रश्न-9 उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।
उत्तर उक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक है राष्ट्र का स्वरूप और लेखक है-वासुदेव शरण अग्रवाल।

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