संक्षेपण
- उदाहरण:
भारतीय नारी त्याग, बलिदान, साहस, शक्ति और सेवा की सजीव मूर्ति है। जीवन के सुख-दुःख में छाया की भांति पुरूष का साथ देने के कारण वह अर्द्धांगिनी, घर की व्यवस्थापिका होने के कारण वह लक्ष्मी और श्लाघनीय गुणों के कारण वह देवी कही जाती है। स्वार्थ और भोगलिप्सा को तिलांजलि देकर भारतीय नारी ने आत्म बलिदान द्वारा समय-समय पर ऐसी ज्योति प्रज्वलित की है कि पुनीत प्रकाश में मनुष्य ने अपना मार्ग ढंूढा है। उसकी शक्ति के सामने यमराज को भी हारना पड़ा है। सती सावित्री वीरंागना लक्ष्मीबाई एवं तपस्विनी उर्मिला की दिव्य झाकियाँ प्रेरणा के स्त्रोत हैं और पुरूष को चेतना एवं जागरण का संदेश देते हैं। नारी का सम्मान करके ही पुरूष का जीवन कुसुम सुवासित होता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
संक्षेपण:
त्याग, बलिदान, साहस तथा सेवा, ये भारतीय नारी के आलौकिक गुण है। उसे पुरूष की अर्द्धांगिनी, गृह लक्ष्मी तथा देवी कहा जाता है। उसके आत्म बलिदान के प्रकाश में ही पुरूष का मार्ग प्रशस्त हुआ है। जहाँ नारी को सम्मान मिले, वहीं देवता निवास करते हैं। - उदाहरण:
राष्ट्रभाषा की आवश्यकता राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से भी है।अपने को एक ही राष्ट्र के निवासी वाले दो व्यक्ति किसी विदेशी भाषा में बात करें, यह हास्यास्पद असंगति है। यह इस बात का घोतक भी है कि उस देश में कोई समुन्नत भाषा नहीं है। दूसरे के सामने हाथ पसारना समृद्धि का नही दरिद्रता का र्चिी है। दूसरे की भाष से काम चलाना भी बहुत कुछ वैसा ही है। जिसकी अपनी भाषा है, वह दूसरे की भाष क्यों उधार ले? इससे राष्ट्रीय सम्मान में बट्टा लगता है। विदेशों में जाने पर भारतीयों को अंग्रेजी में बातें करते देखकर वहाँ के निवासी आश्चर्य से पूछ बैठते है कि क्या आपकी कोई भाषा नहीं? इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाए? भाषाएँ तो हमारे यहाँ अनेक है- एक से एक सुन्दर व समृद्ध। हीनभावना के कारण उनको नहीं अपनाते। अपनी साहित्यिक और भाषिक समृद्धि पर सन्देह बना रहता है।
संक्षेपण:
अपने देश की राष्ट्र की राष्ट्र भाषा का प्रयोग राष्ट्र के प्रति सम्मान का परिचायक है किन्तु विदेशी भाषा का प्रयोग तथा अपनी राष्ट्र भाषा को हीन समझना, दूसरे राष्ट्रों की दृष्टि में भाषा के मामले में अपनी दरिद्रता को प्रकट करना है। - उदाहरण:
आप भोजन बन्द कर दीजिए या कम कर दीजिए, आपका शरीर जीर्ण हो जायेगा और अचिराद् नाशोन्मुख होने लगेगा। इस तरह आप साहित्य के रसास्वादन से अपने मस्तिष्क को वंचित कर दीजिए, वह निष्क्रिय हो कर धीरे-धीरे किसी काम का नहीं रह जायेगा। बात यह है कि शरीर के जिस अंग का जो काम है, वह उससे न लिया जाये तो उसके काम करने की शक्ति नष्ट हुए बिना नहीं रहती। यदि आप मस्तिष्क को निष्क्रिय और कालान्तर में निर्जीव-सा नहीं कर डालना चाहते हों, तो साहित्य का सतत् सेवन करना चाहिए और उसमें नवीनता तथा पौष्टिकता लाने के लिए उसका उत्पादन भी करना चाहिए।
संक्षेपण: अभ्यास
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पृथ्वी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यही स्वराज्य की भावना है। जब प्रत्येक व्यक्ति जिस पृथ्वी पर उसका जन्म हुआ है, उसे अपनी मातृ-भूमि समझने लगता है, तो उसका मन मातृभूमि से जुड़ जाता है। मातृभूमि उसके लिए देवी हो जाती है। उसके हृदय के भाव मातृ-भूमि के हृदय से जा मिलते है। जीवन में चाहे जैसा अनुभव हो, वह मातृभूमि से द्रोह की बात नहीं सोचता, मातृभूमि के प्रति जब यह भाव दृढ होता है, वही से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है उस स्थिति में मातृभूमि पर बसने वाले नागरिकगण एक दूसरे से सौदा करने या शर्त तय करने की बात नहीं सोचते। मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य की बात सोचते है।
संक्षेपण: जब मनुष्य मातृभूमि से माता-तुल्य प्रेम करने लगता राष्ट्रीयता की भावना का जन्म होता है। अपनी वैयक्तिक सत्ता का त्याग कर वह मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करते हुए कभी उसके प्रति ड्डतघ्नता का व्यवहार नहीं करता। - उदाहरण:
चरित्र निर्माण का प्रथम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण विद्यालय घर है। प्रत्येक मनुष्य घर में ही अपना सर्वोत्कृष्ट अथवा निकृष्ट नैतिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है। एक कहावत है कि शिष्टाचार ही मनुष्य को बनाता है। एक अन्य कहावत के अनुसार मस्तिष्क व्यक्ति का निर्माता है। लेकिन दोनों से अधिक सत्य यह है कि व्यक्ति का निर्माण घर में ही होता है। इसका कारण यह है कि घरेलू प्रशिक्षण में शिष्टाचार एवं मानसिक विकास के साथ ही चरित्र निर्माण भी सम्मिलित है। यह घर ही है, जहाँ हृदय द्वार खोला जाता है, आदतें बनती बिगड़ती हैं, प्रतिभा विकसित होती है और अच्छे या बुरे ढाँचे में चरित्र ढाला जाता है। समाज के सिद्धान्त एवं सूत्र, चाहे ये उचित हों या अनुचित शुद्ध या अशुद्ध घर से ही निकलते हैं। कानून स्वयं घरों का प्रतिबिम्ब है। निजी जीवन में बच्चों के मन-मस्तिष्क में रोपी गई विचार धाराएँ ही आगे चलकर विश्व में प्रसारित होती हैं और सार्वजनिक मान्यताओं का रूप धारण कर लेती हैं। अतः जिनके हाथों में बच्चों के विकास पथ की डोर है, उनसे भी अधिक शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं जिनके हाथों में सत्ता की बागडोर है।
संक्षेपण: अभ्यास
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……………………………………………………………………………………………………………………………………………………….. - उदाहरण:
ईश्वर भी सहायक और अनुकुल उन्हीं का होता है जो अपनी सहायता अपने आप कर सकते हैं। आपे आप सहायता करने की भावना आदमी में सच्ची तरक्की की बुनियाद है। सुप्रसिद्ध पुरूषों की जीवनी इसका उदाहरण तो है ही, वरन प्रत्येक जाति के लोगों मंे बल और ओज तथा गौरव एवं महत्व के आने का सच्चा द्वार आत्म निर्भरता है। बहुधा देखने में आता है कि किसी काम के करने में बाहरी सहायता इतना लाभ नहीं पहँुचा सकती जितनी आत्म निर्भरता। समाज के बन्धनों में भी देखिए तो बहुत तरह के संशोधन सरकारी कानूनों के द्वारा वैसे नहीं हो सकते, जैसे समाज के एक-एक मनुष्य का अपने संशोधन अपने आप अलग-अलग करने से हो सकते हैं। कड़े से कड़ा समाज आलसी को परिश्रमी, अपव्ययी या फिजूल खर्च को किफायतदार या परिमित व्ययशील, क्रोधी को शान्त या सहृदयशील, सूम को उदार, लोभी को संतोषी, मूर्ख को विद्वान, दर्पान्ध को नम्र, दुराचारी को सदाचारी, कदर्प को उन्नातमना, दरिद्र भिखारी को धनाड्य, भीरू डरपोक को वीर धूरीण, झूठे गपोडियों को सच्चा, चोर को साह, व्यभिचारी को एक पत्नी व्रतधारी इत्यादि नहीं बना सकता, किन्तु ये बातें हम अपने प्रयत्न और चेष्ठा से अपने में ला सकते हैं।
संक्षेपण: अभ्यास
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……………………………………………………………………………………………………………………………………………………….. - उदाहरण:
क्या आर्थिक उन्नाति का वास्तविक अर्थ उन्नाति से संघर्ष है? मेरी मान्यता है कि आर्थिक उन्नाति से हमारा अभिप्राय असीम भौतिक प्रगति से होता है और वास्तविक उन्नाति को हम नैतिक उत्थान के रूप में मानते हैं, जो हमारे आन्तरिक स्थायी तत्व की उन्नाति के समान है। अतः यह विषय इस प्रकार कहा जा सकता है – क्या नैतिक उत्थान भौतिक प्रगति से समान अनुपात में नहीं होता। मैं जानता हूँ कि यह पहले वाले विचारणीय तथ्य से अधिक व्यापक तथ्य है। लेकिन मैं ऐसा सोचने का साहस कर सकता हूँ कि हम कम व्यापक तथ्य को अपनाते हुए भी हमारा अभिप्राय व्यापक तथ्य से होता है। इसका कारण यह है कि यह अनुभव करने के लिए हमारे पास विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान है कि हमारे दृश्य ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण विश्राम अथवा अनुक्रिया जैसी कोई वस्तु नहीं है। इसलिए यदि भौतिक प्रगति का नैतिक उन्नाति से कोई संघर्ष नहीं है तो भौतिक प्रगति को आगे बढ़ाना चाहिए।
संक्षेपण: अभ्यास
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……………………………………………………………………………………………………………………………………………………….. - उदाहरण:
भारतीय संस्कृति में आर्ष ज्ञान सर्वोच्च है। इस ज्ञान का प्रादुर्भाव सृष्टि के आरम्भ में हुआ। )षिगण रज और तम के स्पर्श से रहित थे। अतः उनकी बुद्धि देश और काल की सीमाओं से परे का ज्ञान भी स्वायत्त करती थी। वे थे भी दीर्घायु। फलतः जिस प्रकार पार्पत्य निर्झर की वारिधारा अपने उद्गम स्थान में पवित्र और निर्मल है, उसी प्रकार यह असाधरण बहुविध ज्ञान स्वच्छ और शुभ्र था। आज का मानव रज और तम से अभिभूत है। वह अधिक से अधिक शतवर्ष जीवी है। उनका भोजन इतना शुद्ध नहीं। संसार का वायुमण्डल भी स्वार्थ, धोखा, असत्य भाषण और मारकाट के कुलिषत भावों से ओत प्रोत है। अतः वर्तमान मानव का बुद्धि स्तर बहुत उच्च नहीं। इतिहास इसका साक्ष्य है। इस अवस्था से युग-युग में मानव का विकास हुआ या हृास, यह प्रश्न विचार योग्य है। इस सिद्धान्त पर पाश्चात्य ज्ञान और आर्ष की टक्कर अवश्यभावी है।
संक्षेपण: अभ्यास
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……………………………………………………………………………………………………………………………………………………….. - उदाहरण:
मैं दुनिया में एक छोर से दूसरे छोर तक गया और देखा कि प्रत्येक स्थान पर गुलामी, प्रशंसा और आदर की उत्सव यात्रा के साथ मौजूद हैं। लोग उसकी बलिवेदी पर नवयुवकों और नवयुवतियों की भेंट चढ़ाते हैं और उसे देवता के नाम से पुकारते हैं। उसके चरणों मंे सुगन्ध या शराब चढ़ाते हैं और उसे बादशाह के नाम से पुकारते हैं। उसकी मूर्तियों के सामने धूप बत्तियां सुलगाते हैं और अवतार का नाम देते हैं। शीश नवाते हुए उसके सामने गिरते हैं और उसे कानून कहते हैं। उसके लिए लड़ते हैं और एक दूसरे का वध करते हैं और उसका नाम राष्ट्रीयता रखते हैं। अपने आपको उसकी इच्छा पर छोड़ते हैं और उसे पृथ्वी पर परमात्मा की छाया समझते हैं। उसके विचार और विश्वास के जोश में अपने घरों को आग लगाते हैं तथा इमारतों को गिराते हैं और उसके भाई बन्दी व समानता के नाम से याद करते हैं।
संक्षेपण: अभ्यास
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