समास किसे कहते है ?
दो या दो से अधिक शब्दों के परस्पर मेल से बने किसी सार्थक नवीन शब्द को समास कहते है .
समास में प्रयुक्त सामासिक पद किसे कहते है ?
समास के नियमों के अनुसार बने नवीन शब्द को सामासिक शब्द कहते है। इसे समस्तपद भी कहा जाता हैं। समास होने के बाद विभक्तियों चिह्न का लोप हो जाता हैं। जैसे-रसोई घर
समास-विग्रह किसे कहते है ?
सामासिक शब्दों को पृथक पृथक कर उनके बीच के संबंधों को स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है।विग्रह के पश्चात सामासिक शब्दों का लोप हो जाता है जैसे-रसोई+ घर =रसोई के लिये घर
समास में प्रयुक्त शब्द पूर्वपद और उत्तरपद किसे कहते है ?
समास में दो पद अर्थात दो शब्द होते हैं। पहलेवाला पद पूर्वपद और बाद में आनेवाला पद उत्तरपद कहलाता हैं।
जैसे- रसोई +घर =रसोई घर रसोई +घर, जिसमें रसोई पूर्व पद है,और घर उत्तर पद है।
संस्कृत में समासों का बहुत प्रयोग होता है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी समास उपयोग होता है। समास के बारे में संस्कृत में एक सूक्ति प्रसिद्ध है:
द्वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः।
तत् पुरुष कर्म धारय येनाहं स्यां बहुव्रीहिः॥
समास के कितने भेद होते है –
व्याकरणिक रूप से समास के छह भेद माने गए है ,
(1) अव्ययीभाव (2) तत्पुरुष समास (3) कर्मधारय समास (4) बहुव्रीहि समास (5) द्वन्द्व समास (6) द्विगु समास
1– अव्ययीभाव
जिस समास में पूर्व पद प्रधान हो, और वह अव्यय हो , अव्ययीभाव समास कहलाता हैं। जैसे –यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार )
अव्ययी समास की पहचान – इसका समस्त पद अव्यय होता है अर्थात समास लगाने पर इसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता .तथा विभक्ति चिह्न का भी प्रयोग नहीं होता ।
पहला पद प्राय:उपसर्ग होता है जो अव्यय का कार्य करता उपसर्गों से बने पद (जिनमे उपसर्ग विशेषण न हो):- आ, निर्, प्रति, निस्, भर, खुश, बे, ला, यथा उपसर्गों से बने पद अव्ययीभाव समास होते है। उदाहरण: आजीवन ,निर्दोष ,) प्रतिदिन),बेघर (बे+घर) ,लावारिस (ला+वारिस) = यथाशक्ति ,यथाक्रम – भरपेट ,भरपूर ,भरसक, आमरण, निडर हर रोज इनमें यथा , आ ,भर,निर अव्यय हैं।
एक जैसे दो शब्दों के मध्य बिना संधि नियम के कोई मात्रा या व्यंजन आये:- उदाहरण: हाथोंहाथ दिनोदिन
जहाँ एक ही शब्द की बार बार आवृत्ति हो, अव्ययीभाव समास होता है जैसे – दिनोंदिन, रातोंरात, घर घर, हाथों-हाथ बीचो-बीच ,रोज़-रोज़,हाथोंहाथ – हाथ ही हाथ में,रातोंरात आदि
भरपेट- पेट भरकर,हररोज़ – में,प्रतिदिन – प्रत्येक दिन ,प्रत्यक्ष ,प्रतिवर्ष – हर वर्ष,बेशक – शक के बिना,निडर – डर के बिना,निस्संदेह – संदेह के बिना,खूबसूरत – अच्छी सूरत वाली
2- तत्पुरुष समास
इस समास में उत्तरपद प्रधान होता है तथा सामासिक पद बन जाने पर विभक्ति का का लोप हो जाता है
जैसे – विद्या +आलय =विद्यालय
विग्रह –विद्या के लिए आलय
सामासिक पद =विद्यालय
तत्पुरुष समासकी पहचान –
सामासिक पद का विग्रह करने पर (8 कारकों में से कर्ता और संबोधन को छोड़कर शेष 6 कर्म (कारक चिन्ह: “को” ) , करण (कारक चिन्ह: “से, के द्वारा”), सम्प्रदान (कारक चिन्ह “के लिए”), अधिकरण (कारक चिन्ह “में, पर” . संबंध (कारक चिन्ह “का, के, की”) ,. अपादान (कारक चिन्ह “से” [अलग होने का भाव]) कारक चिह्नों में से किसी एक कारक चिह्न का प्रयोग होता है
कर्म तत्पुरुष (गिरहकट – गिरह को काटने वाला)
करण तत्पुरुष (मनचाहा – मन से चाहा)
संप्रदान तत्पुरुष (रसोईघर – रसोई के लिए घर)
अपादान तत्पुरुष (देशनिकाला – देश से निकाला)
संबंध तत्पुरुष (गंगाजल – गंगा का जल)
अधिकरण तत्पुरुष (नगरवास – नगर में वास)
तत्पुरुष समास का अन्य भेद
नञ तत्पुरुष समास- जिस समास में पहला पद निषेधात्मक हो उसे नञ तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे –
असभ्य( न सभ्य ) अनंत( न अंत ) अनादि ( न आदि ) असंभव( न संभव )
सिद्धिप्राप्त = सिद्धि को प्राप्त नगरगत = नगर को गत
हस्तलिखित = हाथों से लिखित
तुलसीरचित = तुलसी के द्वारा रचित
रसोईघर = रसाई के लिए घर
जबखर्च = जेब के लिए खर्च
पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
देशनिकाला = देश से निकाला
राजपुत्र = राजा का पुत्र
घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
आपबीती = आप पर बीती
विश्व प्रसिद्ध = विश्व में प्रसिद्ध
मतदाता = मत को देने वाला
गिरहकट = गिरह को काटने वाला
जन्मजात = जन्म से उत्पन्न
मुँहमाँगा = मुँह से माँगा
गुणहीन = गुणों से हीन
हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
युद्धभूमि = युद्ध के लिए भूमि
धनहीन = धन से हीन
भयभीत = भय से भीत
जन्मान्ध = जन्म से अन्धा
प्रेमसागर = प्रेम का सागर
दिनचर्या = दिन की चर्या
भारतरत्न = भारत का रत्न
नीतिनिपुण = नीति में निपुण
आत्मविश्वास = आत्मा पर विश्वास
घुड़सवार = घोड़े पर सवार
युद्धक्षेत्र= युद्ध का क्षेत्र
गुरुदक्षिणा= गुरु के लिए दक्षिणा
यशप्राप्त= यश को प्राप्त
कुलश्रेष्ठ= कुल में श्रेष्ठ
3- कर्मधारय समास-
इस समास का उत्तरपद प्रधान होता है तथा पूर्वपद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध होता है ,
जैसे -भवसागर(संसार रूपी सागर );
घनश्याम(बादल जैसे काला )
चंद्रमुख (चंद्र जैसा मुख)
कमलनयन ( कमल के समान नयन )
देहलता (देह रूपी लता )
दहीबड़ा (दही में डूबा बड़ा )
नीलकमल ( नीला कमल )
पीतांबर ( पीत अंबर अर्थात पीला वस्त्र )
सज्जन ( सत् अर्थात अच्छा जन )
नरसिंह ( नरों में सिंह के समान )
कालीमिर्च = ( काली है जो मिर्च )
नीलकमल = ( नीला है जो कमल )
पीताम्बर =( पीत अर्थात पीला है जो अम्बर )
चन्द्रमुखी = ( चन्द्र के समान मुख वाली )
सद्गुण = ( सद् हैं जो गुण )
4- बहुव्रीहि समास
इस समास के दोनों पद अप्रधान होंते है और समस्तपद से प्रकट अर्थ प्रधान होता है .
उदहारण
दशानन – दश है आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण
नीलकंठ- नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव
सुलोचना- सुंदर है लोचन जिसके अर्थात् मेघनाद की पत्नी
पीतांबर – पीला है अम्बर (वस्त्र) जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण
लंबोदर- लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् श्री गणेश
दुरात्मा- बुरी आत्मा वाला ( दुष्ट)
श्वेतांबर- श्वेत है जिसके अंबर (वस्त्र) अर्थात् माँ सरस्वती
चतुरानन- चार है आनन जिसके (ब्रह्मा )
महात्मा – महान् आत्मा है जिसकी अर्थात् ऊँची आत्मा वाला।
नीलकण्ठ – नीला कण्ठ है जिनका अर्थात् शिवजी।
लम्बोदर – लम्बा उदर है जिनका अर्थात् गणेशजी।
गिरिधर – गिरि को धारण करने वाले अर्थात् श्रीकृष्ण।
मक्खीचूस – बहुत कंजूस व्यक्ति
कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर
कर्मधारय में समस्त-पद का एक पद दूसरे का विशेषण होता है। इसमें शब्दार्थ प्रधान होता है। जैसे – नीलकंठ = नीला कंठ। बहुव्रीहि में समस्त पद के दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य का संबंध नहीं होता अपितु वह समस्त पद ही किसी अन्य संज्ञादि का विशेषण होता है। इसके साथ ही शब्दार्थ गौण होता है और कोई भिन्नार्थ ही प्रधान हो जाता है। जैसे – नील+कंठ = नीला है कंठ जिसका शिव।
5- द्विगु समास
इस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण होता है तथा समस्त पद से समूह अथवा समूह का बोध होता है। जैसे –
नवग्रह- नौ ग्रहों का समूह
दोपहर- दो पहरों का समूह
त्रिलोक- तीन लोकों का समूह
चौमासा- चार मासों का समूह
नवरात्र- नौ रात्रियों का समूह
शताब्दी- सौ अब्दो (वर्षों) का समूह
नवरत्न- नौ रत्नों का समूह
सप्तदीप – सात दीपों का समूह
त्रिभुवन – तीन भुवनों का समूह
दुराहा- दो राहों का समूह
सतसई- सात सौ दोहों का समूह
तिरंगा- तीन रंगों का समूह
दशानन- दस आननों (मुखों) का समूह
पंचवटी- पाँच वट वृक्षों का समूह
सप्ताह- सात दिनों का समूह
पंजाब- पाँच आबों का समूह
अठन्नी- आठ आनों का समूह
नवग्रह- नौ ग्रहों का समूह
नवरत्न- नव रत्नों का समूह
शताब्दी- सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
नवरात्र- नव (नौ) रातों का समूह
पंचमुखी -पाँच मुखों का समूह
त्रिफला- तीन फलों का समूह
चवन्नी चार आनों का समूह
अठन्नी- आठ आनों का समूह
त्रयम्बकेश्वर- तीन लोकों का ईश्वर
6- द्वन्द्व समास
इस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर ‘और’, अथवा, ‘या’, एवं योजक चिन्ह का प्रयोग होता हैं ,
पहचान –विग्रह करने पर “और “ व “ या “का प्रयोग होता है .
“और” का प्रयोग समान तथा”या” का प्रयोग असमान प्रकृति के पदों के होता है।
उदहारण
राम-कृष्ण = राम और कृष्ण
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
राधा-कृष्ण
शिव –पार्वती
सीता-राम
माता-पिता ,
भाई-बहन,
राजा-रानी,
दु:ख-सुख,
दिन-रात,
राजा-प्रजा
धर्माधर्म = धर्म या अधर्म
सुरासुर = सुर या असुर
संधि और समास में अंतर
संधि वर्णों में होती है। इसमें विभक्ति या शब्द का लोप नहीं होता है। जैसे – देव + आलय = देवालय।
समास दो पदों में होता है। समास होने पर विभक्ति या शब्दों का लोप भी हो जाता है। जैसे – माता और पिता = माता-पिता।
समास-व्यास से विषय का प्रतिपादन
यदि आपको लगता है कि सन्देश लम्बा हो गया है (जैसे, कोई एक पृष्ठ से अधिक), तो अच्छा होगा कि आप समास और व्यास दोनों में ही अपने विषय-वस्तु का प्रतिपादन करें अर्थात् जैसे किसी शोध लेख का प्रस्तुतीकरण आरम्भ में एक सारांश के साथ किया जाता है, वैसे ही आप भी कर सकते हैं। इसके बारे में कुछ प्राचीन उद्धरण भी दिए जा रहे हैं।
विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत्।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥ (महाभारत आदिपर्व १.५१)
— अर्थात् महर्षि ने इस महान ज्ञान (महाभारत) का संक्षेप और विस्तार दोनों ही प्रकार से वर्णन किया है, क्योंकि इस लोक में विद्वज्जन किसी भी विषय पर समास (संक्षेप) और व्यास (विस्तार) दोनों ही रीतियाँ पसन्द करते हैं।
ते वै खल्वपि विधयः सुपरिगृहीता भवन्ति येषां लक्षणं प्रपंचश्च।
केवलं लक्षणं केवलः प्रपंचो वा न तथा कारकं भवति॥ (व्याकरण-महाभाष्य २। १। ५८, ६। ३। १४)
— अर्थात् वे विधियाँ सरलता से समझ में आती हैं जिनका लक्षण (संक्षेप से निर्देश) और प्रपंच (विस्तार) से विधान होता है। केवल लक्षण या केवल प्रपंच उतना प्रभावकारी नहीं होता।



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