aadi granth- guru granth sahib

ईश्वर एक है किन्तु भूखंड पर निवास करनेवाले मनुष्य अनेक है .मनुष्यों के भी अलग -अलग संप्रदाय है .अलग-अलग संप्रदाय के अलग अलग ईश्वरीय स्वरुप है ,वैचारिक मतैक्य है .अवधारणाएँ है और उसी के अनुरूप परम्पराएँ है ,पूजा -विधान है .किन्तु एक बात सभी संप्रदाय में समान है –एक धर्म गुरु और दूसरा धर्म ग्रन्थ .रामायण और भगवद्गीता हिन्दू धर्म के ,सूत पिटक,अभि धम्म पिटक और विनय पिटक बौद्ध धर्म के ,कल्प सूत्र ,आचारांग सूत्र और भगवती सूत्र जैन धर्म के ,प्रमुख धर्म ग्रन्थ है , कुरान शरीफ इस्लाम धर्म का ,बाइबिल इसाई धर्म का ,जेंद अवेस्ता पारसी धर्म का सिगांग यहूदियों का धर्म ग्रन्थ है ,इसी तरह गुरु ग्रन्थ साहिब सिख धर्म का पवित्र धर्म ग्रन्थ है .
‘गुरु ग्रंथ साहिब’ सिख समुदाय का प्रमुख धर्मग्रन्थ जिसे सिख समुदाय का आदि ग्रन्थ भी कहा जाता है । सिख समुदाय के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने सन् 1604 ई. में संगृहीत कराया था । 30 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द सम्मिलित किये, ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ मे पृष्ठों की संख्या 1430 है तथा 3,000 शबद सिक्ख गुरुओं द्वारा अभिलिखित हैं ।
गुरु की भांति आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं आत्मोत्थान करने के कारण सिख अनुयायी गुरु ग्रन्थ साहिब को गुरुवत् पूज्य मानते हुए 'गुरूग्रंथ साहिब जी' से संबोधित करते है . गुरु ग्रन्थ साहिब को 'गुरुबानी' कहा जाता है ,यही कारण है कि सिख धर्म के अनुयायी गुरु ग्रन्थ साहिब को देहधारी गुरू स्वरूप में मानते है ।
aadi granth guru granth sahib
इसका कारण यह है कि गुरु नानक देव कहते है कि सद्गुरु की शरण में जाने से ही मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि देहधारी गुरू के समान ही गुरु ग्रन्थ साहिब को स्वच्छ रेशमी वस्त्र में वेष्टित कर चांदनी के नीचे किसी गुरु गद्दी के समान गद्दी पर 'पधराया' जाता है, चंवर ढाला जाता है , पुष्प चढ़ाते हैं, आरती उतारते हैं .अनुयायी देह शुद्धि के लिए जल से स्नानकर गुरु ग्रंथसाहिब के सम्मुख उपस्थित होते है ,ऐसी परंपरा है . प्रात: काल, सायंकाल, शयनबेला के लिए निश्चित वाणी अथवा स्तुतिगान का समय निर्धारित होता हैं
यद्यपि गुरु ग्रन्थ साहिब जी गुरुमुखी लिपि में रचित हुआ है किन्तु इसमे विविध भाषाओंऔर बोलियों का सम्मिश्रण भी है । विविध संतों की वाणी का समावेश होने के कारण गुरु ग्रन्थ साहिब की भाषा को ‘सन्त भाषा’ भी कह दिया जाता है
अनुयायियों में श्रद्धा ,भक्ति और आस्था का भाव जाग्रत करने वाला अद्वितीय ग्रन्थ हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब आत्मविषयक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावों की सरल सहज और ह्रदयग्राह्यी उपदेशों की पवित्र अभिव्यंजना है –
गुरु ग्रन्थ साहिब में कर्म की महत्ता को रेखांकित किया है । गुरु ग्रन्थ साहिब ईश्वर प्राप्ति अथवा साधना पाठ की ओर अग्रसित होने के लिए गृह त्याग अथवा वैराग्य का समर्थन नहीं करता । आत्मोत्थान और ध्यान वैसे ही स्वीकार है जैसे अन्य धर्म में स्वीकारोक्ति है । ईश्वर को अन्यत्र खोजने की अपेक्षा ह्रदय ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। गुरु ग्रन्थ साहिब अपने अनुयायियों को पारमार्थिक कर्म के प्रति प्रेरित करता है . मधुर – विनम्र व्यवहार व शब्द प्रयोग को ह्रदय पर विजय पाने का उपाय बताया गया है .
विविध धर्म गुरुओं और संतों की वाणियों में भाषावैविध्य होने के उपरांत भी संगृहीत रचनाओ में वैचारिक साम्य के कारण सामंजस्य एवं एकरूपता ही दृष्टिगोचर होती हैं।
गुरुद्वारों में कहीं अखंड तो कहीं साप्ताहिक होता है .मांगलिक एवं विशेष अवसरों पर विशेष अंशों का पाठ किये जाने की भी परंपरा है ., सिख अनुयायी का का जीवन ‘गुरु ग्रन्थ साहिब के दार्शनिक सिद्धांत, आध्यात्मिक साधना से प्रभावित रहता है।
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