12cbse/hindi/antra/bharat-ram ka prem/Tulasidas/vyakhya/MCQ/ भरत-राम का प्रेम’ तुलसीदास-vyakhya
‘भरत-राम का प्रेम’ तुलसीदास कविता का प्रतिपाद्य
‘भरत-राम का प्रेम’ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित *रामचरितमानस* के ‘अयोध्याकांड’ से लिया गया एक अत्यंत करुण और भावप्रधान प्रसंग है। इस काव्यांश में उस स्थिति का वर्णन है जब श्रीराम पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास को प्रस्थान कर चुके होते हैं। जब भरत को इस घटना का ज्ञान होता है, तो वह अत्यंत व्याकुल हो उठता है और श्रीराम को अयोध्या लौटाने के उद्देश्य से चित्रकूट की ओर प्रस्थान करता है। उसके साथ अयोध्या के अनेक नर-नारी भी चलते हैं, जो राम के वियोग से गहरे दुःखी हैं।
चित्रकूट में आयोजित सभा में भरत श्रीराम के समक्ष अपने हृदय के भाव प्रकट करता है। वह कहता है कि श्रीराम का उसके प्रति विशेष स्नेह रहा है और बचपन से ही दोनों के बीच गहरा प्रेम और अपनत्व बना हुआ है। भरत का मानना है कि इस निष्कलुष प्रेम को विधाता ने ही स्वीकार नहीं किया, इसलिए उसकी माता के माध्यम से दोनों भाइयों के बीच भेद उत्पन्न कर दिया गया।
भरत यह भी व्यक्त करता है कि अयोध्या के समस्त नर-नारी और उनकी माताएँ श्रीराम के वनगमन से अत्यंत दुःखी हैं। वह इस समस्त अनर्थ और विडंबना का मूल कारण स्वयं को मानता है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को तपस्वियों के समान वेश में देखकर भरत को अपना जीवित रहना भी अनुचित प्रतीत होता है। वह अनुभव करता है कि मानो विधाता ने समस्त दुःख और पीड़ाएँ कैकेयी के पुत्र भरत के ही भाग्य में लिख दी हों। इस प्रकार यह काव्यांश भरत और राम के आदर्श भ्रातृ-प्रेम, त्याग, आत्मग्लानि और करुणा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है तथा भारतीय संस्कृति में पारिवारिक मूल्यों और नैतिक आदर्शों की उच्चता को उजागर करता है।
सप्रसंग व्याख्या-
1.
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढे। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।
कहब मोर मुनिनाथ निखाहा। एहि तें अधिक कहौं में काहा॥
मैं जानडैं निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥
मो पर कृषा सनेहु बिसेखी। खोलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥
सिसुपन तें परिहरेडैं न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेंहुँ खेल जितावहिं मोही।।
महूँ सनेह सकोच्च बस सनमुख कही न बैन।
द्रसन तृपित न आजु लगि प्रेम पिआसे नैन॥
प्रसंग -प्रस्तुत पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य *‘रामचरितमानस’* के *‘अयोध्याकांड’* के प्रसिद्ध *‘भरत–राम का प्रेम’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में उस भावुक क्षण का चित्रण है, जब भरत अयोध्या का राजपद राम को सौंपने और उन्हें वापस ले जाने के उद्देश्य से चित्रकूट पहुँचे हैं। सभा में श्रीराम भरत की महानता और विनय की सराहना करते हैं।
व्याख्या -इन पंक्तियों में चित्रकूट में आयोजित सभा का हृदयस्पर्शी दृश्य प्रस्तुत है। जब श्रीराम भरत के गुणों की प्रशंसा करते हैं, तब मुनि वशिष्ठ भरत से अपने हृदय की बात प्रकट करने के लिए कहते हैं। यह सुनते ही भरत का शरीर प्रेम-भाव से रोमांचित हो उठता है और वे आदरपूर्वक सभा में खड़े हो जाते हैं। उनके कमल के समान नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगती है।
भरत विनम्रता से कहते हैं कि जो कुछ उन्हें कहना था, वह तो मुनिनाथ पहले ही व्यक्त कर चुके हैं; अब कहने को और शेष ही क्या रह गया है। वे कहते हैं कि वे अपने स्वामी श्रीराम के स्वभाव को भली-भाँति जानते हैं। प्रभु राम का हृदय इतना करुणामय है कि वे अपराधियों पर भी कभी क्रोध नहीं करते, फिर उनके प्रति तो उनका स्नेह और कृपा स्वाभाविक ही है।
भरत स्मरण करते हैं कि उन्होंने बचपन से लेकर आज तक कभी श्रीराम को अप्रसन्न नहीं देखा। वे सदा उनके साथ रहे और प्रभु राम ने भी कभी उनका मन नहीं दुखाया। श्रीराम ने कभी भी भरत की इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया। प्रभु की कृपा और वात्सल्य को भरत ने अपने हृदय में गहराई से अनुभव किया है। खेल में हार जाने पर भी श्रीराम प्रेमवश उन्हें विजयी घोषित कर देते थे।
भरत आगे कहते हैं कि उन्होंने सदा प्रभु राम का आदर किया है और प्रेम तथा संकोच के कारण उनके सामने कभी खुलकर बोलने का साहस नहीं किया। प्रभु राम के प्रेम के प्यासे उनके नेत्र आज तक उनके दर्शन से तृप्त नहीं हो पाए हैं। इस प्रकार भरत का श्रीराम के प्रति निष्कलुष, विनम्र और अनन्य प्रेम मार्मिक रूप से प्रकट होता है।
विशेष –
* भरत का श्रीराम के प्रति निष्काम, अनन्य और आदर्श भ्रातृ-प्रेम अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुआ है।
* अनुप्रास, उपमा, रूपक तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों का सशक्त प्रयोग है।
* भाषा अवधी है, जिसमें माधुर्य और सरलता का विशेष गुण विद्यमान है।
* अभिधा शब्द-शक्ति के माध्यम से भावों की सीधी और मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।
—
बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQs
**प्रश्न 1.** यह प्रसंग *रामचरितमानस* के किस कांड से लिया गया है?
(क) बालकांड
(ख) अरण्यकांड
(ग) अयोध्याकांड
(घ) उत्तरकांड
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 2.** मुनि वशिष्ठ ने भरत से क्या करने को कहा?
(क) सभा छोड़ने को
(ख) राम की प्रशंसा करने को
(ग) अपने मन की बात कहने को
(घ) अयोध्या लौटने को
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 3.** भरत के नेत्रों से अश्रु क्यों बहने लगे?
(क) दुःख के कारण
(ख) भय के कारण
(ग) राम के प्रति प्रेम और भावुकता के कारण
(घ) थकान के कारण
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 4.** भरत के अनुसार श्रीराम का स्वभाव कैसा है?
(क) कठोर और अनुशासनप्रिय
(ख) पराक्रमी और उग्र
(ग) करुणामय और क्षमाशील
(घ) रहस्यमय और मौन
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 5.** इस काव्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(क) राजधर्म
(ख) भ्रातृ-ईर्ष्या
(ग) भरत का राम के प्रति अनन्य प्रेम
(घ) वन-जीवन का वर्णन
**सही उत्तर :** (ग)
व्याख्या –
2.
बिधि न सकेठ सेहि मोर दुलारा। नीच बीच जननी मिस पारा॥
यहड कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा ॥
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
फरह कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।
सपनेहुं दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥
बिनु समझें निज अघ परिपाकू। जारिठँ जायँ जननि कहि काकू॥
हुदयँ हेरि हारेडँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा ॥
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू”।
साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहडँ सुथल सति भाड।
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराज।।
प्रसंग -प्रस्तुत पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित *रामचरितमानस* के *अयोध्याकांड* के प्रसिद्ध *‘भरत–राम का प्रेम’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में चित्रकूट की सभा में भरत, श्रीराम से अयोध्या लौटने का विनम्र आग्रह करते हुए यह विश्वास दिलाते हैं कि राम के वनवास में उनका कोई दोष नहीं है। साथ ही वे अपने और राम के मध्य स्थित निष्कलुष भ्रातृ-प्रेम को अत्यंत करुण और विनीत भाव से प्रकट करते हैं।
व्याख्या -इन पंक्तियों में भरत चित्रकूट की सभा में अपने और श्रीराम के अटूट प्रेम का उल्लेख करते हुए अत्यंत आत्मग्लानि और विनय के साथ कहते हैं कि विधाता को शायद उनका और राम का निष्कलुष स्नेह सहन नहीं हुआ, इसलिए उसने उनकी नीच माता के माध्यम से दोनों भाइयों के बीच भेद उत्पन्न कर दिया। परंतु भरत तत्काल ही इस विचार को भी अस्वीकार कर देते हैं और कहते हैं कि इस प्रकार किसी को दोषी ठहराना उन्हें शोभा नहीं देता।
भरत स्पष्ट करते हैं कि अपनी दृष्टि से कोई भी स्वयं को साधु या पवित्र घोषित नहीं कर सकता। यदि वे यह कहें कि उनकी माता नीच है और वे स्वयं साधु एवं सदाचारी हैं, तो ऐसा सोचना ही असंख्य पापों के समान है। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे कौवे की बोली से उत्तम धान नहीं उग सकता और जैसे काली सीप से मोती उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार इस घटना में किसी को भी दोषी ठहराना अनुचित है।
भरत स्वीकार करते हैं कि यह सब उनके अपने दुर्भाग्य का परिणाम है—उन पापों का फल, जिन्हें वे ठीक से समझ भी नहीं पाए। वे अपने हृदय में आत्ममंथन करते हुए कहते हैं कि उन्होंने आवेश में आकर अपनी माता को कटु वचन कहे, जिससे उनका अंतःकरण और अधिक व्यथित हो गया। वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपने मन के हर कोने में समाधान खोजने का प्रयास किया, किंतु उन्हें अपनी भलाई का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता।
अंततः भरत को केवल एक ही उपाय सूझता है—गुरु महाराज की शरण और श्रीराम-सीता की स्वामित्व-भावना। वे मानते हैं कि गुरु सर्वसमर्थ हैं और श्रीराम उनके स्वामी हैं; यही विश्वास उन्हें उचित और कल्याणकारी प्रतीत होता है। इस पवित्र तीर्थ-स्थल पर, साधुओं की इस सभा में, भरत सत्यभाव से यह घोषणा करते हैं कि उनका प्रेम कपट, छल या दिखावा नहीं है। उनके इस प्रेम की सत्यता को केवल सर्वज्ञ मुनि वशिष्ठ और स्वयं श्रीराम ही भली-भाँति जानते हैं।
इस प्रकार भरत का आत्मदैन्य, भ्रातृ-प्रेम, विनय और आत्मसमर्पण अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त हुआ है।
विशेष –
* भरत का श्रीराम के प्रति **निष्कलुष, आत्मत्यागपूर्ण एवं अनन्य भ्रातृ-प्रेम** सजीव रूप में प्रकट हुआ है।
* अनुप्रास, स्वरमैत्री, रूपक एवं उदाहरण अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
* अवधी भाषा का सहज, स्वाभाविक और प्रवाहमय प्रयोग प्रसंग को अत्यंत भावप्रवण बनाता है।
* तत्सम एवं तद्भव शब्दावली का संतुलित समन्वय भाषा को माधुर्य प्रदान करता है।
* भरत का आत्मग्लानि-भाव, विनय और गुरु-भक्ति *रामचरितमानस* की आदर्श मूल्य-परंपरा को उजागर करता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1. यह काव्यांश रामचरितमानस के किस कांड से लिया गया है?
(क) बालकांड
(ख) अरण्यकांड
(ग) अयोध्याकांड
(घ) उत्तरकांड
सही उत्तर : (ग) अयोध्याकांड
प्रश्न 2. चित्रकूट की सभा में भरत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(क) राजसिंहासन ग्रहण करना
(ख) राम से क्षमा याचना करना
(ग) राम को अयोध्या लौटने के लिए विनम्र आग्रह करना
(घ) माता कैकेयी का पक्ष लेना
सही उत्तर : (ग) राम को अयोध्या लौटने के लिए विनम्र आग्रह करना
प्रश्न 3. भरत क्यों कहते हैं कि किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है?
(क) क्योंकि सब कुछ राजनीति का परिणाम है
(ख) क्योंकि वे स्वयं को निर्दोष मानते हैं
(ग) क्योंकि स्वयं को साधु और माता को नीच मानना पाप के समान है
(घ) क्योंकि राम ऐसा चाहते हैं
सही उत्तर : (ग) क्योंकि स्वयं को साधु और माता को नीच मानना पाप के समान है
प्रश्न 4. ‘कौवे की बोली से उत्तम धान नहीं उग सकता’—यह उदाहरण किस भाव को स्पष्ट करता है?
(क) अहंकार
(ख) आत्मदैन्य और विनय
(ग) वीरता
(घ) उपहास
सही उत्तर : (ख) आत्मदैन्य और विनय
प्रश्न 5. भरत के अनुसार उनकी भलाई का एकमात्र उपाय क्या है?
(क) राजत्याग
(ख) मौन व्रत
(ग) गुरु की शरण और श्रीराम को स्वामी मानना
(घ) तपस्या
सही उत्तर : (ग) गुरु की शरण और श्रीराम को स्वामी मानना
***
व्याख्या –
3.
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥
देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं॥
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिडँ सब सूला।।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेडँ ऐहि घाएँ।।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयड न बेहू॥
अब सबु आँखिन्ह देखेडें आई। जिअत जीव जड़ सबड सहाई।।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तज्ञाह बिषम बियु तामस तीछी।।
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दु:ख दैउ सहावइ काहि।।
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प्रसंग :-प्रस्तुत पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य *रामचरितमानस* के *अयोध्याकांड* के प्रसिद्ध *‘भरत–राम का प्रेम’* प्रसंग से उद्धृत हैं। इस प्रसंग में चित्रकूट की सभा में भरत द्वारा श्रीराम से अयोध्या लौटने का करुण आग्रह किया गया है। तुलसीदास ने यहाँ भरत के मन में व्याप्त वेदना, आत्मग्लानि और भ्रातृ-प्रेम का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
**व्याख्या -इन पंक्तियों में भरत चित्रकूट की सभा में श्रीराम के समक्ष अयोध्या की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए उन्हें वापस चलने का विनम्र अनुरोध करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीराम के प्रति अपने प्रेम और आज्ञापालन के प्रण को निभाते हुए महाराज दशरथ का निधन हो जाना और माता कैकेयी की दुर्बुद्धि—इन दोनों घटनाओं का साक्षी सारा संसार है। इस हृदयविदारक प्रसंग से समस्त माताएँ अत्यंत व्याकुल हैं; उनका दुःख देखा नहीं जाता। संपूर्ण अवध के नर-नारी भी श्रीराम के वियोग रूपी असहनीय ताप से संतप्त हो रहे हैं।
भरत आत्मग्लानि से भरकर स्वीकार करते हैं कि इन समस्त अनर्थों का मूल कारण वे स्वयं हैं। यह सब सुन-समझकर उन्होंने हर प्रकार का दुःख सहा है। वे कहते हैं कि जब उन्हें यह समाचार मिला कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण मुनियों के वेश में, नंगे पाँव, बिना जूते पहने वन की ओर प्रस्थान कर गए हैं, तब—भगवान शंकर साक्षी हैं—उन्हें यह आश्चर्य होता है कि इतने गहरे आघात के बावजूद उनके प्राण क्यों नहीं निकल गए।
भरत आगे कहते हैं कि जब उन्होंने निषादराज का प्रेम देखा, तब उनका हृदय, जो वज्र से भी कठोर प्रतीत होता था, वह क्यों नहीं फट गया। अब वे स्वयं चित्रकूट आकर सब कुछ प्रत्यक्ष देख चुके हैं। वे अपने को जड़-जीव कहते हुए कहते हैं कि यह शरीर जीवित रहकर ऐसे दृश्य कैसे सहन कर रहा है—ऐसे दृश्य, जिन्हें देखकर मार्ग के साँप और बिच्छू भी अपना तीव्र विष और उग्र क्रोध त्याग देते हैं।
भरत अत्यंत करुण स्वर में कहते हैं कि जिन रघुनंदन, लक्ष्मण और सीता को कैकेयी शत्रु-सा प्रतीत हुई, उसी कैकेयी का पुत्र होकर यह असहनीय दुःख सहना उनके भाग्य में लिखा है। दैव की इस क्रूर लीला से बढ़कर और किसे ऐसा दुःख सहना पड़ा होगा? इस प्रकार भरत का आत्मदैन्य, भ्रातृ-प्रेम और वेदना इस प्रसंग में चरम रूप में प्रकट होती है।
विशेष –
* भरत के **आत्मग्लानि, करुणा और अनन्य भ्रातृ-प्रेम** का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
* अनुप्रास, स्वरमैत्री और पदमैत्री अलंकारों के प्रयोग से काव्य में लय और माधुर्य की सृष्टि हुई है।
* अवधी भाषा का सहज, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण प्रयोग भावों को प्रभावशाली बनाता है।
* तत्सम, तद्भव और देशज शब्दावली का संतुलित समन्वय काव्य को जन-जीवन से जोड़ता है।
* स्वरमैत्री के कारण पद्यांश में संगीतात्मकता और भावगहनता बढ़ गई है।
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बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1. यह काव्यांश रामचरितमानस के किस कांड से लिया गया है?
(क) बालकांड
(ख) अरण्यकांड
(ग) अयोध्याकांड
(घ) उत्तरकांड
सही उत्तर : (ग) अयोध्याकांड
प्रश्न 2. चित्रकूट की सभा में भरत श्रीराम से क्या आग्रह करते हैं?
(क) राज्य स्वीकार करने का
(ख) वनवास समाप्त करने का
(ग) अयोध्या लौट चलने का
(घ) तपस्या करने का
सही उत्तर : (ग) अयोध्या लौट चलने का
प्रश्न 3. भरत के अनुसार अयोध्या की दयनीय दशा का मुख्य कारण क्या है?
(क) राम का राज्य त्याग
(ख) दशरथ का निधन और कैकेयी की दुर्बुद्धि
(ग) मंत्रियों की नीति
(घ) जनता की असहयोगिता
सही उत्तर : (ख) दशरथ का निधन और कैकेयी की दुर्बुद्धि
प्रश्न 4. भरत स्वयं को ‘अनर्थों का मूल’ क्यों मानते हैं?
(क) क्योंकि वे राज्य चाहते थे
(ख) क्योंकि वे वन नहीं गए
(ग) क्योंकि वे आत्मग्लानि और दैन्य से ग्रस्त हैं
(घ) क्योंकि राम ने ऐसा कहा
सही उत्तर : (ग) क्योंकि वे आत्मग्लानि और दैन्य से ग्रस्त हैं
प्रश्न 5. इस काव्यांश में भरत का कौन-सा भाव चरम रूप में व्यक्त हुआ है?
(क) वीरता
(ख) अहंकार
(ग) आत्मग्लानि, करुणा और भ्रातृ-प्रेम
(घ) शांति
सही उत्तर : (ग) आत्मग्लानि, करुणा और भ्रातृ-प्रेम *********************************
तुलसीदास के पदों का प्रतिपाद्य
‘पद’ – तुलसीदास
तुलसीदास के पदों का प्रतिपाद्य
‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित *गीतावली* से दो करुण और भावप्रवण पद संकलित किए गए हैं। इन पदों में श्रीराम के वन-गमन के पश्चात माता कौशल्या की गहन मानसिक वेदना, वात्सल्य और वियोगजन्य पीड़ा का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है।
प्रथम पद में माता कौशल्या की उस मनोदशा को उकेरा गया है, जो राम के वन जाने के बाद उत्पन्न हुई है। वे बार-बार राम के बचपन से जुड़ी वस्तुओं—धनुष, जूतियाँ आदि—को देखकर उन्हें अपने हृदय से लगा लेती हैं। कभी वे अनायास ही राम को जगाने के लिए लोरी या गीत गाने लगती हैं, तो कभी भोजन के लिए पुकार उठती हैं, मानो राम अभी भी उनके समीप हों। किंतु जैसे ही उन्हें राम के वन-गमन का स्मरण होता है, वे स्तब्ध होकर चित्र की भाँति निश्चल रह जाती हैं। यह पद माँ के वात्सल्य और वियोग की गहराई को अत्यंत प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करता है।
द्वितीय पद में भी राम के वन-गमन से व्याकुल माता कौशल्या की करुण मनःस्थिति का ही चित्रण किया गया है। इस पद में वे राम को उनके पाले हुए घोड़ों की स्मृति दिलाते हुए अयोध्या लौट आने का अनुरोध करती हैं। उनके वियोग में वे घोड़े दुर्बल और शिथिल होते जा रहे हैं। माता कौशल्या राम से आग्रह करती हैं कि वे एक बार आकर उन्हें अवश्य देख लें। यह पद माँ के हृदय में बसे पुत्र-प्रेम, तड़प और करुण पुकार को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार तुलसीदास के ये पद राम के वन-गमन के प्रसंग में माता कौशल्या के वात्सल्य, वियोग और करुणा की भावनाओं को अत्यंत संवेदनशील और मार्मिक रूप में व्यक्त करते हैं तथा पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करते हैं।
सप्रसंग व्याख्या-
1.
जननी निरखति बान धनुहियाँ।
बार बार उर नैनानि लावति प्रभुजू की ललित पनहियाँ।
कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे।
“उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुल सखा सब द्वारे।”
कबहुँ कहति यों “बड़ी बार भई जाहु भूप पहँ, भैया।”
बंधु बोलि जेंइय जो भावै कई निछावरि मै या”
कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी-सी।
तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी-सी।।
प्रसंग : प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित *‘गीतावली’* के *अयोध्याकांड* से लिया गया है। इस पद में कवि ने राम के वन-गमन के पश्चात माता कौशल्या की करुण, व्याकुल और हृदयविदारक अवस्था का चित्रण किया है। पुत्र-वियोग में संतप्त माता के मातृ-स्नेह और विरह-वेदना को अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
व्याख्या -कवि वर्णन करता है कि श्रीराम के वन चले जाने के बाद माता कौशल्या उनके बचपन के खेल-कूद से जुड़ी वस्तुओं को देखकर शोक से भर उठती हैं। वे कभी राम के खेलने के धनुष को देखती हैं और कभी उनकी नन्हीं-नन्हीं सुंदर जूतियों को उठा कर बार-बार अपने हृदय से लगाती हैं तथा नेत्रों से स्पर्श करती हैं। इन वस्तुओं में उन्हें अपने प्रिय पुत्र की सजीव उपस्थिति का आभास होता है।विरह की इस अवस्था में माता कौशल्या कभी अतीत में लौट जाती हैं। वे पहले की भाँति प्रातःकाल राम के शयन-कक्ष में पहुँचकर उन्हें स्नेहपूर्ण वचनों से जगाने लगती हैं—“हे पुत्र! उठो, तुम्हारे मुखचंद्र पर तुम्हारी माता न्योछावर होती है। देखो, तुम्हारे छोटे भाई और सखा द्वार पर खड़े प्रतीक्षा कर रहे हैं।”कभी वे स्नेह में डूबी हुई कह उठती हैं—“भैया, अब बहुत देर हो गई है। महाराज के पास जाओ, अपने भाइयों को बुलाकर लाओ। जो तुम्हें अच्छा लगे, वही भोजन करो। माता तुम पर निछावर होती है।”परंतु जैसे ही उन्हें राम के वन-गमन का स्मरण होता है, वे सहसा चकित हो उठती हैं और चित्र में अंकित मूर्ति की भाँति निश्चेष्ट हो जाती हैं। उनका हृदय विरह की अग्नि में दग्ध होने लगता है।
तुलसीदास कहते हैं कि इस दशा का यथार्थ वर्णन कर पाना संभव नहीं है। जहाँ सच्चा और गहन प्रेम होता है, वहाँ शब्द भी असमर्थ हो जाते हैं। प्रेम की तीव्रता में चित्त विवश होकर विरह की ज्वाला में जल उठता है और वाणी मौन हो जाती है। इस प्रकार माता कौशल्या का मातृ-हृदय राम-वियोग में पूर्णतः विह्वल हो उठता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1. यह पद गोस्वामी तुलसीदास की किस कृति से लिया गया है?
(क) रामचरितमानस
(ख) कवितावली
(ग) गीतावली
(घ) विनयपत्रिका
सही उत्तर : (ग) गीतावली
प्रश्न 2. इस पद में किस पात्र की करुण अवस्था का चित्रण किया गया है?
(क) माता कैकेयी
(ख) माता सुमित्रा
(ग) माता कौशल्या
(घ) माता उर्मिला
सही उत्तर : (ग) माता कौशल्या
प्रश्न 3. राम के वन-गमन के बाद माता कौशल्या किन वस्तुओं को देखकर अत्यंत व्याकुल हो जाती हैं?
(क) राम का मुकुट और धनुष
(ख) राम के वस्त्र और आभूषण
(ग) राम के खेलने का धनुष और उनकी जूतियाँ
(घ) राम की माला और खड़ाऊँ
सही उत्तर : (ग) राम के खेलने का धनुष और उनकी जूतियाँ
प्रश्न 4. माता कौशल्या का राम को पहले की भाँति जगाना किस भाव को प्रकट करता है?
(क) क्रोध
(ख) मोह
(ग) मातृ-स्नेह और विरह
(घ) आश्चर्य
सही उत्तर : (ग) मातृ-स्नेह और विरह
प्रश्न 5. इस काव्यांश में प्रमुख रूप से कौन-सा रस व्यक्त हुआ है?
(क) शृंगार रस
(ख) शांत रस
(ग) करुण रस
(घ) वात्सल्य रस
सही उत्तर : (ग) करुण रस
व्याख्या-
2.
राघौ! एक बार फिरि आवौ।
ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज वार वार चुचुकारे।
क्यों जीवाहं, मेरे राम लाडिले! ते अब निपट बिसारे।।
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे।
तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।।
सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन केहियो मातु संदेसो।
तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो ॥
प्रसंग : प्रस्तुत पद तुलसीदास द्वारा रचित ‘गीतावली’ के अयोध्याकांड से लिया गया है। इस पद में राम वन-गमन से व्याकुल अयोध्या के घोड़ों की दशा का वर्णन करते हुए माता कौशल्या राम को अयोध्या आने के लिए कहती हैं।
व्याख्या : कवि लिखता है कि राम के वनगमन से अयोध्या के पशु-पक्षी भी विरह-व्यथित हैं। माता कौशल्या राम के द्वारा पालित घोड़ों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे राघव! तुम एक बार तो अवश्य लौट आओ। यहाँ अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों को देखकर फिर वन में चले जाना, जिन्हें तुमने दूध पिलाकर, अपने ही कर-कमलों से पुष्ट कर बार-बार दुलारा और पुचकारा था। ऐ मेंरे लाडले राम! उन्हें तुमने एकदम भुला दिया है।तुम्हारे इस प्रकार उन्हें भुला देने से वे कैसे जीवित रह सकेंगे ? इन घोड़ों को तुम्हारे अत्यंत प्रिय समझकर भरत इनकी तुमसे भी सौ गुनी अधिक देखभाल करते हैं, फिर भी वे तुम्हारे वियोग में दिन-प्रतिदिन इस प्रकार से दुर्वल होते जा रहे हैं जैसे कमल को पाले ने मार दिया हो। किसी पथिक को संबोधित करते हुए माता कौशल्या कहती है कि हे पथिक! सुनना, यदि राम तुम्हें वन में कहीं मिलते हैं तो उन्हें उनकी माता का यह संदेश दे देना और कहना कि माता कौशल्या को सब से अधिक इनकी चिंता लगी हुई है।
विशेष :
अनुप्रास, रूपक, उपमा, स्वरमैत्री और पुनरुक्तिप्रकाश अरंकारों का सहज प्रयोग किया गया है।
अवधी मिश्रित ब्रजभाषा का सहज रूप से प्रयोग किया है।
करुण रस का प्रयोग है।
स्वरमैत्री का प्रयोग हुआ है।
बहु-विकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1. यह पद तुलसीदास की किस कृति से लिया गया है?
(क) रामचरितमानस
(ख) कवितावली
(ग) गीतावली
(घ) विनयपत्रिका
सही उत्तर : (ग) गीतावली
प्रश्न 2. इस पद में किस पात्र की विरह-दशा का वर्णन किया गया है?
(क) माता कैकेयी
(ख) माता सुमित्रा
(ग) माता कौशल्या
(घ) माता उर्मिला
सही उत्तर : (ग) माता कौशल्या
प्रश्न 3. माता कौशल्या राम के वनगमन के बाद किन वस्तुओं को देखकर व्याकुल हो जाती हैं?
(क) राम का धनुष और बाण
(ख) राम के वस्त्र और मुकुट
(ग) राम की जूतियाँ और खेल-कूद का धनुष
(घ) राम की माला और सिंहासन
सही उत्तर : (ग) राम की जूतियाँ और खेल-कूद का धनुष
प्रश्न 4. माता कौशल्या का राम को पहले की भाँति जगाने का दृश्य किस भाव को प्रकट करता है?
(क) क्रोध
(ख) आश्चर्य
(ग) मातृ-स्नेह और विरह
(घ) वीरता
सही उत्तर : (ग) मातृ-स्नेह और विरह
प्रश्न 5. इस काव्यांश में प्रमुख रूप से कौन-सा रस व्यक्त हुआ है?
(क) शृंगार रस
(ख) वीर रस
(ग) शांत रस
(घ) करुण रस
सही उत्तर : (घ) करुण रस
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