12cbse/hindi/antra /baarahmasa-malik mohammad jayasi/‘बारहमासा’ / मलिक मुहम्मद जायसी / सप्रसंग व्याख्या/MCQ
‘बारहमासा’ काव्यांश का प्रतिपाद्य-
बारहमासा’ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य *पद्मावत* के ‘नागमती वियोग खंड’ का एक अत्यंत करुण और भावप्रधान अंश है। इस काव्यांश में कवि ने राजा रत्नसेन के वियोग में व्याकुल रानी नागमती की गहन विरह-व्यथा को प्रकृति और ऋतुओं के माध्यम से अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है। ‘बारहमासा’ के अंतर्गत वर्ष के विभिन्न महीनों का वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि समय और ऋतु-परिवर्तन नायिका के विरह को कैसे और अधिक तीव्र बना देते हैं। पाठ्यक्रम में निर्धारित चार छंदों में अगहन, पूस, माघ और फागुन मास के प्रभावों का चित्रण किया गया है।
अगहन मास की शीतलता नागमती के विरह-दुःख को और गहरा कर देती है। दिन छोटे और रातें लंबी हो जाने से उसका एकाकीपन बढ़ जाता है और पति-वियोग की पीड़ा असहनीय हो उठती है। वह प्रियतम के विरह में तिल-तिल कर विरहाग्नि में जलती हुई प्रतीत होती है।
पूस मास में तीव्र ठंड और सूर्य के दक्षिणायन होने से उसकी अवस्था और अधिक दयनीय हो जाती है। सूर्य के समान जीवन-ऊर्जा देने वाला उसका प्रियतम उसके पास नहीं है, इसलिए वह ठंड से काँपती हुई मरणासन्न-सी हो जाती है। माघ मास में पाले के साथ वर्षा और ओलों का पड़ना उसके दुःख को और बढ़ा देता है। प्रियतम की जुदाई में उसकी आँखों से निरंतर आँसू बहते रहते हैं और वह दिन-प्रतिदिन दुर्बल होती चली जाती है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि विरह रूपी अग्नि उसे जलाकर भस्म कर देगी।
फागुन मास में चलने वाली तीव्र और शीतल हवाएँ ठंड के प्रभाव को और बढ़ा देती हैं, जिससे नागमती की देह पीली पड़ जाती है। उसे लगता है कि जैसे वृक्षों के सूखे पीले पत्ते झड़ जाते हैं, वैसे ही वह भी जीवन से झड़ जाएगी। उसकी विरह-व्यथा इतनी प्रबल हो जाती है कि वह कामना करती है कि उसका शरीर वियोग्नि में जलकर राख बन जाए और वह राख पवन के सहारे उड़कर उसके प्रियतम के चरणों में जा गिरे।
इस प्रकार ‘बारहमासा’ काव्यांश नायिका के विरह को प्रकृति, ऋतुओं और समय के परिवर्तन से जोड़कर अत्यंत सशक्त और करुणात्मक रूप में प्रस्तुत करता है तथा प्रेम-वियोग की तीव्रता को पाठक के हृदय तक पहुँचा देता है।
सप्रसंग व्याख्या-
1.
अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काड़ी।
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरे बिरह ज्यों दीपक बाती।
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।।
घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रंग लै गा नाहू ॥
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥
सियरि अगिनि बिरहिनि छिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा।।
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जरम करै भसमंतू॥
पिय सौं कहेहु संदेसरा, ऐ भैवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुओं हम लाग॥
प्रसंग :-प्रस्तुत पंक्तियाँ सूफी-काव्य परंपरा के महान कवि **मलिक मुहम्मद जायसी** द्वारा रचित महाकाव्य *‘पद्मावत’* के *‘बारहमासा’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में कवि ने राजा रत्नसेन के वियोग में संतप्त उनकी पत्नी **रानी नागमती** की करुण और मार्मिक विरह-दशा का चित्रण किया है। ‘बारहमासा’ के अंतर्गत विभिन्न मासों के माध्यम से नायिका की बदलती मानसिक अवस्था को प्रस्तुत किया गया है। यह काव्यांश विशेष रूप से **अगहन मास** की विरह-वेदना को व्यक्त करता है।
व्याख्या :-इन पंक्तियों में कवि अगहन मास के आगमन के साथ विरहिणी नागमती की बढ़ती हुई पीड़ा का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। अगहन के महीने में जब दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं, तब नागमती की विरह-वेदना और अधिक तीव्र हो उठती है। वह यह समझ पाने में असमर्थ है कि अपने प्रिय पति के वियोग से उत्पन्न असह्य दुःख को किस प्रकार शांत करे। लंबी-लंबी रातें उसके लिए असहनीय हो जाती हैं।वियोग की तीव्रता के कारण अब उसे दिन भी रात के समान कष्टदायक प्रतीत होते हैं। वह दीपक की बत्ती की भाँति तिल-तिल जलती हुई अपने जीवन को क्षीण होते हुए अनुभव करती है। शीत ऋतु के प्रभाव से उसका हृदय काँपने लगता है, किंतु यह कंपकँपी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा का भी प्रतीक है। नागमती को विश्वास है कि यह पीड़ा तभी शांत होगी, जब उसका प्रियतम उसके समीप होगा।
कवि आगे बताता है कि जहाँ अन्य घरों की स्त्रियाँ शरद ऋतु के अनुरूप नए-नए वस्त्र बनवा रही हैं, वहीं नागमती इस ओर ध्यान नहीं दे पा रही है। उसका मानना है कि उसके रूप और रंग को तो उसके पति अपने साथ ही ले गए हैं। वह बार-बार यही सोचती है कि उसके पति किसी अशुभ घड़ी में गए थे, तभी एक बार जाने के बाद लौटकर नहीं आए। उसे आशा है कि यदि वे लौट आएँ, तो उसके जीवन में पुनः सुख और सौंदर्य के दिन लौट आएँगे।विरह की अवस्था में शीत ऋतु आग के समान बनकर नागमती के अंतर्मन को निरंतर जलाती रहती है। वह विरहाग्नि में सुलग-सुलगकर मानो राख हो चुकी है। उसके मन में यह टीस गहरी होती जा रही है कि उसका प्रियतम उसकी इस पीड़ा से सर्वथा अनभिज्ञ है और इसी अज्ञानता के कारण उसका यौवन और जीवन दोनों नष्ट होते जा रहे हैं।
अंततः नागमती भँवरों और कौओं को संबोधित करते हुए उनसे करुण निवेदन करती है कि वे उसके प्रियतम के पास जाकर यह संदेश पहुँचा दें कि उनकी प्रियतमा वियोग की अग्नि में जल-जलकर मर चुकी है और उसी अग्नि के धुएँ के कारण उनके शरीर काले पड़ गए हैं। इस प्रकार कवि ने नागमती की विरह-वेदना को अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी रूप में प्रस्तुत किया है।
विशेष :-
* इस काव्यांश में **विरह-वेदना और करुण भाव** की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।
* भाषा **अवधी** है, जिसका प्रयोग स्वाभाविक, प्रवाहपूर्ण और भावानुकूल है।
* **विरोधाभास, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश** अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
* **स्वरमैत्री** के कारण काव्य में लयात्मकता और संगीतात्मकता उत्पन्न हुई है।
* ‘दीपक की बत्ती’, ‘शीत का आग बन जाना’ जैसे बिंब विरह की तीव्रता को प्रभावशाली बनाते हैं।
काव्यांश से बहु-विकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** यह काव्यांश किस कृति के ‘बारहमासा’ प्रसंग से लिया गया है?
(क) रामचरितमानस
(ख) पद्मावत
(ग) गीतावली
(घ) कवितावली
**सही उत्तर :** (ख) पद्मावत
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**प्रश्न 2.** अगहन मास में नागमती की पीड़ा बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
(क) वर्षा ऋतु का आगमन
(ख) उत्सवों की अधिकता
(ग) दिन छोटे और रातें लंबी होना
(घ) समाज का उपेक्षाभाव
**सही उत्तर :** (ग) दिन छोटे और रातें लंबी होना
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**प्रश्न 3.** नागमती स्वयं को ‘दीपक की बत्ती’ के समान क्यों मानती है?
(क) प्रकाश फैलाने के कारण
(ख) धीरे-धीरे तिल-तिल जलने के कारण
(ग) अंधकार दूर करने के कारण
(घ) शीत से बचने के कारण
**सही उत्तर :** (ख) धीरे-धीरे तिल-तिल जलने के कारण
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**प्रश्न 4.** नागमती नए वस्त्र क्यों नहीं बनवाती है?
(क) निर्धनता के कारण
(ख) ऋतु से अरुचि के कारण
(ग) क्योंकि उसका रूप-रंग प्रियतम के साथ चला गया है
(घ) सामाजिक निषेध के कारण
**सही उत्तर :** (ग) क्योंकि उसका रूप-रंग प्रियतम के साथ चला गया है
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**प्रश्न 5.** नागमती भँवरों और कौओं से क्या संदेश भिजवाना चाहती है?
(क) प्रियतम को शीघ्र लौट आने का
(ख) अपने सौंदर्य के क्षय का
(ग) अपने विरहाग्नि में जलकर मर जाने का
(घ) ऋतु परिवर्तन की सूचना का
**सही उत्तर :** (ग) अपने विरहाग्नि में जलकर मर जाने का
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व्याख्या –
2.
पूस जाड़ थरथर तन काँपा। सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा॥
बिरह बाढ़ि भा दारुन सीऊ। कँपि कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरें। पंथ अपार सूझ नहिं नियरें।
सौर सुपे ती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी॥
चकई निसि बिद्धुं दिन मिला। हाँ निसि बासर बिरह कोकिला।
रेनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसें जिआं बिछोही पँखी॥
बिरह सैचान भैवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा॥
रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥
प्रसंग :-प्रस्तुत पंक्तियाँ सूफ़ी काव्यधारा के महत्त्वपूर्ण कवि **मलिक मुहम्मद जायसी** द्वारा रचित महाकाव्य *‘पद्मावत’* के *‘बारहमासा’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में कवि ने राजा **रत्नसेन** के वियोग में संतप्त उनकी पत्नी **रानी नागमती** की मासानुसार बदलती हुई मानसिक अवस्था का करुण चित्रण किया है। प्रस्तुत काव्यांश में विशेष रूप से **पूस मास** में नागमती की तीव्र विरह-वेदना का वर्णन है।
व्याख्या :-इन पंक्तियों में कवि पूस के महीने में नागमती की विरह-संतप्त दशा का अत्यंत मार्मिक वर्णन करता है। पूस मास में शीत इतना बढ़ गया है कि समस्त नर-नारी थर-थर काँपने लगे हैं। यहाँ तक कि सूर्य भी मानो ठंड से पीड़ित होकर उत्तर दिशा को छोड़कर दक्षिण की ओर तापने चला गया है। इस तीव्र शीत के साथ-साथ नागमती की विरह-व्यथा और अधिक बढ़ जाती है और उसे यह ठंड प्राणघातक प्रतीत होने लगती है।
प्रियतम के स्मरण में डूबी नागमती सोचती है कि उनके अभाव में वह काँप-काँपकर मरती जा रही है और यह जाड़ा तभी शांत होगा, जब उसका जीवन ही समाप्त हो जाएगा। वह व्याकुल होकर कह उठती है—हे प्रियतम! आप कहाँ हैं? यदि आप यहाँ होते, तो मैं आपके गले लगकर इस मारक शीत से मुक्ति पा लेती। किंतु प्रियतम से उसकी दूरी इतनी अधिक है कि उसे यह भी समझ में नहीं आता कि वह उन्हें कहाँ जाकर ढूँढ़े।
नागमती को अनुभव होता है कि चाहे वह कितनी ही रजाइयाँ ओढ़ ले, फिर भी ठंड कम नहीं होती। उसकी शैया उसे इतनी शीतल प्रतीत होती है, मानो उसे बर्फ में डुबो दिया गया हो। वह स्वयं की तुलना चकई पक्षी से करते हुए कहती है कि चकई तो सौभाग्यशाली है, जो रात्रि में बिछुड़कर भी प्रातःकाल अपने प्रिय से मिल जाती है, जबकि वह दिन-रात प्रियतम के वियोग में कोयल की भाँति तड़पती रहती है।
रात्रि में वह पूर्णतः अकेली रह जाती है; उसके पास कोई सखी तक नहीं होती। ऐसी स्थिति में वह स्वयं को एक असहाय वियोगिनी पक्षी मानती है। उसे प्रतीत होता है कि विरह-रूपी भयंकर बाज उसके चारों ओर मंडरा रहा है, जो उसे जीवित ही निगल लेना चाहता है और मृत्यु के बाद भी उसे नहीं छोड़ेगा।
अंत में नागमती सारस-सारसी के अटूट प्रेम का स्मरण करते हुए प्रियतम से विनती करती है कि हे प्राणनाथ! मेरे शरीर का सारा रक्त सूख चुका है, मांस गल गया है और मेरी हड्डियाँ शंख के समान निष्प्राण हो गई हैं। मैं आपकी पत्नी सारसी की भाँति आपका नाम जपते-जपते मर रही हूँ। आप पर इतना अनुग्रह अवश्य हो कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे पंखों को समेट लीजिएगा। इस प्रकार पूस मास में नागमती की करुण विरह-वेदना अपने चरम पर पहुँच जाती है।
विशेष :-
* पूस मास में **नागमती की विरह-वेदना और करुणा** का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
* भाषा **अवधी** है, जो सहज, स्वाभाविक और भावानुकूल है।
* **उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश** अलंकारों का प्रभावी प्रयोग हुआ है।
* करुण रस की प्रधानता है।
* **स्वरमैत्री** के कारण काव्य में लयात्मकता और संगीतात्मकता उत्पन्न हुई है।
* पक्षी-बिंब (चकई, कोयल, सारस-सारसी) विरह की तीव्रता को गहराई प्रदान करते हैं।
काव्यांश से बहु-विकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** यह काव्यांश *पद्मावत* के किस प्रसंग से लिया गया है?
(क) नागमती-वर्णन
(ख) युद्ध-प्रसंग
(ग) बारहमासा
(घ) पद्मिनी-विवाह
**सही उत्तर :** (ग) बारहमासा
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**प्रश्न 2.** प्रस्तुत काव्यांश में किस मास की विरह-दशा का वर्णन है?
(क) अगहन
(ख) पूस
(ग) माघ
(घ) फाल्गुन
**सही उत्तर :** (ख) पूस
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**प्रश्न 3.** पूस मास में नागमती को शीत क्यों अधिक भयानक प्रतीत होता है?
(क) क्योंकि वह बीमार है
(ख) क्योंकि वह अकेली है
(ग) क्योंकि वह प्रियतम के वियोग में है
(घ) क्योंकि उसके पास वस्त्र नहीं हैं
**सही उत्तर :** (ग) क्योंकि वह प्रियतम के वियोग में है
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**प्रश्न 4.** नागमती स्वयं की तुलना किन पक्षियों से करती है?
(क) हंस और कबूतर
(ख) चकई, कोयल और सारसी
(ग) मोर और तोता
(घ) कौआ और भँवरा
**सही उत्तर :** (ख) चकई, कोयल और सारसी
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**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में प्रधान रस कौन-सा है?
(क) श्रृंगार रस
(ख) वीर रस
(ग) करुण रस
(घ) शांत रस
**सही उत्तर :** (ग) करुण रस
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व्याख्या –
3.
लागेड माँह पर अब पाला। बिरहा काल भएड जड़काला।
पहल पहल तन रुई जो झाँपे। हहलि हहलि अधिकौ हिय काँपे।।
आई सूर होड तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूट्ट माहाँ।।
एहि मास उपजै रस मूलू। तूँ सो थैवर मोर जोबन फूलू॥
नैन चुखहिं जस माँहुट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू।।
टूटरिं बुंद पराही जस ओला। बिरह पवन होड मारं झोला।।
केहिक सिंगार को पहिर पटोरा। गिर्यं नहीं हार रही होइ डोरा।।
तुम्ह बिनु कंता धनि हरकई, तन तिनुवर भा छोल।
तेहि पर धिरह जराइ कै, चहै उडाबा झोल।।
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प्रसंग :-प्रस्तुत पंक्तियाँ सूफ़ी काव्य परंपरा के महान कवि **मलिक मुहम्मद जायसी** द्वारा रचित महाकाव्य *‘पद्मावत’* के *‘बारहमासा’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में कवि ने राजा **रत्नसेन** के वियोग में संतप्त उनकी पत्नी **रानी नागमती** की मासानुसार बदलती हुई मानसिक और भावनात्मक अवस्था का मार्मिक चित्रण किया है। प्रस्तुत काव्यांश में विशेष रूप से **माघ मास** में नागमती की तीव्र विरह-वेदना का वर्णन है।
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व्याख्या :-इन पंक्तियों में कवि माघ मास के आगमन के साथ विरहिणी नागमती की दारुण स्थिति का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। माघ का महीना लगते ही पाला पड़ने लगता है और शीत अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। विरहावस्था में यह शीत काल के समान प्राणघातक प्रतीत होती है। नागमती अपने शरीर को रूई के वस्त्रों से ढकने का प्रयास करती है, किंतु फिर भी उसका हृदय थर-थर काँपता रहता है। माघ की ठंड इतनी तीव्र है कि रूई के वस्त्र स्वयं ठंडे होकर शरीर को और अधिक कंपा देते हैं।
नागमती व्याकुल होकर अपने प्रियतम को संबोधित करते हुए कहती है—हे स्वामी! यदि आप मेरे समीप आ जाएँ और सूर्य की भाँति मुझे तपाएँ, तो यह शीत सुखद बन जाएगी। तुम्हारे अभाव में यह माघ मास की ठंड दूर नहीं हो सकती। कवि बताता है कि इसी महीने में वनस्पतियों की जड़ों में रस का संचार प्रारंभ होता है, किंतु नागमती के जीवन में यह रस नहीं, बल्कि विरह-रूपी पवन का प्रहार है, जो उसे निरंतर झकझोर रहा है।
उसकी आँखों से माघ मास की वर्षा के समान निरंतर अश्रुधारा बहती रहती है। प्रियतम के वियोग में आँसू रुकने का नाम नहीं लेते। नागमती कहती है कि वह अपनी गरदन में हार भी नहीं डाल सकती, क्योंकि विरह के कारण उसकी गर्दन सूखकर डोरी के समान क्षीण हो गई है। उसे माघ मास की ओस और वर्षा की बूँदें ओलों की भाँति पीड़ादायक प्रतीत होती हैं। उनसे भीगे हुए वस्त्र उसे बाणों की तरह चुभते हैं।
वह प्रश्न करती है कि अब वह किसके लिए श्रृंगार करे और किसके लिए रेशमी वस्त्र धारण करे, क्योंकि उसके यौवन-रूपी पुष्प का उपभोग करने वाला भ्रमर तो केवल उसका प्रियतम ही है। अंत में नागमती कहती है कि प्रिय के वियोग में वह अत्यंत दुर्बल हो गई है; उसका शरीर तिनकों के समान काँपता रहता है। विरह की आग उसे जलाकर राख बना देना चाहती है। इस प्रकार माघ मास में नागमती की विरह-वेदना अपने चरम रूप में व्यक्त होती है।
विशेष :-
* माघ मास में **नागमती की विरह-वेदना, दुर्बलता और आत्मदैन्य** का अत्यंत करुण चित्रण हुआ है।
* भाषा **अवधी** है, जो सहज, स्वाभाविक और भावानुकूल है।
* **उपमा, रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश और अनुप्रास** अलंकारों का प्रभावी प्रयोग हुआ है।
* तत्सम एवं तद्भव शब्दावली का संतुलित और स्वाभाविक समन्वय है।
* **स्वरमैत्री** के कारण काव्य में लयात्मकता और संगीतात्मकता उत्पन्न हुई है।
* सूर्य, भ्रमर, पुष्प, तिनका आदि बिंब विरह की तीव्रता को गहराई प्रदान करते हैं।
काव्यांश से बहु-विकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** यह काव्यांश *पद्मावत* के किस प्रसंग से लिया गया है?
(क) युद्ध-प्रसंग
(ख) नागमती-वर्णन
(ग) बारहमासा
(घ) विवाह-प्रसंग
**सही उत्तर :** (ग) बारहमासा
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**प्रश्न 2.** प्रस्तुत काव्यांश में किस मास की विरह-दशा का वर्णन किया गया है?
(क) अगहन
(ख) पूस
(ग) माघ
(घ) फाल्गुन
**सही उत्तर :** (ग) माघ
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**प्रश्न 3.** माघ मास में नागमती को ठंड अधिक कष्टदायक क्यों लगती है?
(क) क्योंकि वह बीमार है
(ख) क्योंकि वह निर्धन है
(ग) क्योंकि वह प्रियतम के वियोग में है
(घ) क्योंकि उसके पास वस्त्र नहीं हैं
**सही उत्तर :** (ग) क्योंकि वह प्रियतम के वियोग में है
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**प्रश्न 4.** नागमती प्रियतम को ‘सूर्य’ के समान क्यों मानती है?
(क) उनके तेज के कारण
(ख) उनके राज्य के कारण
(ग) क्योंकि वे शीत दूर कर सकते हैं
(घ) क्योंकि वे प्रकाश फैलाते हैं
**सही उत्तर :** (ग) क्योंकि वे शीत दूर कर सकते हैं
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**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में नागमती का यौवन किस प्रतीक से व्यक्त हुआ है?
(क) तिनका
(ख) हार
(ग) यौवन-रूपी पुष्प
(घ) शैया
**सही उत्तर :** (ग) यौवन-रूपी पुष्प
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व्याख्या –
4.
फागुन पवन झंकोर बहा। चौगुन सीड जाइ किमि सहा।।
तन जस धियर पात भा मोरा। बिरह न रह पयन होड झोरा।
तरिवर झरै झर बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कह भा जग दून उदासू॥
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहिंजिय लाइ दीन्छिजसि होरी।।
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा ॥
रातिद्दु देवस इहै मन मोरें। लागौ कंत धार जेऊँ तोरें।।
यह तन जारौं छार कै, कहां कि पवन उडाड।
मकु तेहि मारग होड परौं, कंत धर जहँ पाड॥
प्रसंग :-प्रस्तुत पंक्तियाँ सूफ़ी काव्य परंपरा के प्रमुख कवि **मलिक मुहम्मद जायसी** द्वारा रचित महाकाव्य *‘पद्मावत’* के *‘बारहमासा’* प्रसंग से ली गई हैं। इस प्रसंग में कवि ने राजा **रत्नसेन** के वियोग में संतप्त उनकी पत्नी **रानी नागमती** की मासानुसार बदलती हुई विरह-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। प्रस्तुत काव्यांश में विशेष रूप से **फागुन मास** में नागमती की तीव्र विरह-व्याकुलता व्यक्त हुई है।
व्याख्या :-इन पंक्तियों में कवि फागुन के महीने में विरह से व्यथित नागमती की दयनीय स्थिति का हृदयस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करता है। नागमती अपने प्रियतम को संबोधित करते हुए कहती है कि फागुन के महीने में चलने वाली तीव्र हवाएँ उसे झकझोर रही हैं, जिससे शीत का प्रभाव और भी बढ़ गया है। इस असह्य ठंड को वह अकेली और विरहिणी होकर कैसे सहन करे—यह सोचकर उसका मन व्याकुल हो उठता है।
विरह के कारण उसके शरीर की कांति पीले पत्ते के समान क्षीण हो गई है। वह आशंका व्यक्त करती है कि विरह के झकझोरों से यह दुर्बल शरीर भी अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह पाएगा और उसके प्राणांत की संभावना बढ़ती जा रही है। कवि प्रकृति के परिवर्तन का उल्लेख करते हुए कहता है कि अब वृक्षों और ढाकों के पत्ते झड़ने लगे हैं, लताएँ भी पत्तों, फूलों और फलों से रहित हो गई हैं। वहीं दूसरी ओर वनस्पतियों में नई-नई कोंपलें फूटने लगी हैं, जो उनके नवजीवन और उल्लास का संकेत देती हैं।
नागमती इस प्राकृतिक उल्लास की तुलना अपने जीवन से करती है। एक ओर लताएँ अपने प्रिय वसंत से मिलकर आनंदित हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर वह स्वयं अपने प्रियतम के न लौटने के कारण और भी अधिक उदास और व्याकुल होती जा रही है। उसकी सखियाँ अपने-अपने प्रियतमों के साथ चाँचरि जोड़कर फाग मना रही हैं। सखियों को प्रेम-रंग में डूबा देखकर नागमती के हृदय में विरह की आग और अधिक भड़क उठती है, मानो उसमें होली जला दी गई हो।
वह अत्यंत करुण स्वर में कहती है कि यदि उसके इस प्रकार विरह की अग्नि में जलने से प्रियतम को सुख मिलता है, तो वह बिना किसी शिकायत के जलते-जलते मर जाने को भी तैयार है। नागमती की अभिलाषा है कि वह अपने प्रियतम के विशाल हृदय से लग जाए और इस असह्य पीड़ा से मुक्ति पा ले।
अंत में उसका प्रेम अपने चरम पर पहुँच जाता है। वह कहती है कि वह अपने शरीर को वियोगाग्नि में जलाकर राख बन जाना चाहती है और पवन से प्रार्थना करती है कि वह उसकी राख को उड़ा ले जाए। यदि उसकी राख उस मार्ग पर गिर जाए जहाँ उसके प्रियतम अपने चरण रखते हैं, तो वह राख बनकर भी उनके चरणों का स्पर्श कर सकेगी। इस प्रकार फागुन मास में नागमती का विरह-प्रेम पूर्णतः आत्मविलय और आत्मोत्सर्ग का रूप धारण कर लेता है।
विशेष :-
* फागुन मास में **नागमती की विरह-व्याकुलता और आत्मसमर्पण** का मार्मिक चित्रण हुआ है।
* भाषा **अवधी** है, जो सहज, स्वाभाविक और भावानुकूल है।
* **उपमा, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश तथा उत्प्रेक्षा** अलंकारों का प्रभावी प्रयोग हुआ है।
* अभिधात्मकता के कारण कथन सरल, सरस और भावप्रवण बन पड़ा है।
* प्रकृति-चित्रण और मानवीय भावों का सुंदर सामंजस्य दिखाई देता है।
काव्यांश से बहु-विकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** यह काव्यांश *पद्मावत* के किस प्रसंग से लिया गया है?
(क) युद्ध-प्रसंग
(ख) नागमती-विरह
(ग) बारहमासा
(घ) पद्मिनी-विवाह
**सही उत्तर :** (ग) बारहमासा
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**प्रश्न 2.** प्रस्तुत काव्यांश में किस मास की विरह-दशा का वर्णन है?
(क) माघ
(ख) फाल्गुन
(ग) चैत्र
(घ) अगहन
**सही उत्तर :** (ख) फाल्गुन
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**प्रश्न 3.** फागुन में नागमती के शरीर की कांति कैसी हो गई है?
(क) पुष्प के समान
(ख) स्वर्ण के समान
(ग) पीले पत्ते के समान
(घ) अग्नि के समान
**सही उत्तर :** (ग) पीले पत्ते के समान
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**प्रश्न 4.** सखियों को फाग मनाते देखकर नागमती के मन में क्या भाव उत्पन्न होता है?
(क) हर्ष
(ख) ईर्ष्या
(ग) विरह की आग और तीव्र हो जाना
(घ) शांति
**सही उत्तर :** (ग) विरह की आग और तीव्र हो जाना
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**प्रश्न 5.** नागमती की अंतिम अभिलाषा क्या है?
(क) प्रियतम को संदेश भेजना
(ख) सखियों के साथ फाग मनाना
(ग) राख बनकर प्रियतम के चरण-मार्ग में पड़ना
(घ) वसंत का स्वागत करना
**सही उत्तर :** (ग) राख बनकर प्रियतम के चरण-मार्ग में पड़ना
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