12cbse-hindi-elective -antara/antaral

12cbse-antara-‘देवसेना का गीत’ -जयशंकर प्रसाद-

January 12, 2026
Spread the love

देवसेना का गीत’ जयशंकर प्रसाद-

(काव्य खंड – अ)**

देवसेना का गीत -सप्रसंग व्याख्या

1 .

 (i) व्याख्या

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गए करुण गीत **‘आह! वेदना मिली विदाई!’** से उद्धृत हैं। इस गीत के माध्यम से देवसेना अपने जीवन की समस्त साधना, प्रेम और आत्मिक समर्पण को अपने प्रिय के चरणों में अर्पित कर देती है। वह अपने भावी जीवन के सुख, आशा और आकांक्षाओं से विरक्ति लेते हुए विदा का यह गीत गाती है, जिसमें त्याग, पीड़ा और आत्मबलिदान की गहन अनुभूति निहित है।

व्याख्या -देवसेना अपने हृदय में संचित वेदना को स्वर देती हुई कहती है कि उसका दुर्भाग्य कितना गहन है कि विदाई की इस घड़ी में भी उसे केवल पीड़ा ही प्राप्त हुई है। जीवन भर जिन कोमल भावनाओं को उसने कठिन साधना और संयम के साथ अपने हृदय में सँजोकर रखा, आज उन्हें भी वह भिक्षा-भाव से लुटा रही है। इस करुण विदाई के क्षण में संध्या भी मानो दिनभर के श्रम का बहाना बनाकर अश्रु बहा रही है। जुदाई की पीड़ा इतनी गहन है कि प्रकृति भी मानवीय भाव ग्रहण कर शोक में डूबी प्रतीत होती है।

इस यात्रा के समय चारों ओर एक गहन निस्तब्धता व्याप्त है। वातावरण में ऐसी रहस्यमयी शांति है जिसका कोई ओर-छोर दिखाई नहीं देता। ऐसा प्रतीत होता है मानो मौन स्वयं सजीव होकर अंगड़ाइयाँ ले रहा हो। इस प्रकार देवसेना की आंतरिक पीड़ा केवल व्यक्तिगत दुःख न रहकर संपूर्ण प्रकृति और परिवेश में व्याप्त हो जाती है, जिससे उसका त्याग और विरह और भी मार्मिक रूप में उभरकर सामने आता है।

विशेष-

* देवसेना के हृदय की वेदना अत्यंत सजीव और करुण रूप में अभिव्यक्त हुई है।

* भाषा तत्सम प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* उपमा, अनुप्रास एवं मानवीकरण अलंकारों का प्रभावी प्रयोग हुआ है।

* छायावादी काव्य की **विरह, निराशा और आत्मिक पीड़ा** का सशक्त चित्रण मिलता है।

(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-

**प्रश्न 1.** देवसेना के गीत का मूल भाव क्या है?

(क) विजय और उत्सव

(ख) प्रेम-प्राप्ति की आकांक्षा

(ग) त्याग, वेदना और विदाई

(घ) संघर्ष और प्रतिशोध

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** देवसेना किन भावनाओं से विदा ले रही है?

(क) क्रोध और प्रतिहिंसा से

(ख) सुख, आशा और आकांक्षाओं से

(ग) साहस और पराक्रम से

(घ) वैभव और ऐश्वर्य से

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 3.** संध्या को अश्रु बहाती हुई दिखाना किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) मानवीकरण

(घ) अनुप्रास

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** वातावरण में व्याप्त ‘खामोशी’ किस भाव को अभिव्यक्त करती है?

(क) उल्लास

(ख) भय

(ग) गहन शांति और विरह

(घ) उत्सुकता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में किस काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं?

(क) वीरगाथा काल

(ख) रीतिकाल

(ग) छायावाद

(घ) आधुनिकतावाद

**सही उत्तर :** (ग)

काव्य भाग – “

 (i) व्याख्या –

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गए करुण गीत **‘आह! वेदना मिली विदाई!’** से ली गई हैं। इस गीत के माध्यम से देवसेना अपने जीवन की साधना का समस्त फल अपने प्रिय के चरणों में अर्पित कर देती है और भावी जीवन के सुख, आशा तथा आकांक्षाओं से विरक्ति ग्रहण करते हुए अपनी अंतःपीड़ा को स्वर देती है।

व्याख्या -देवसेना अपने हृदय की गहन और तीव्र वेदना को शब्दों में ढालते हुए कहती है कि जीवन के स्वप्न भले ही थककर चूर हो गए हों, किंतु मोह की मधुरता अभी भी समाप्त नहीं हुई है। उसकी आसक्ति अब तक शिथिल नहीं पड़ी है। विदाई की इस बेला में भी कहीं किसी अनजाने पथिक ने ऊँघती-सी, अलसाई हुई वाणी में घने वन-प्रदेश में वृक्षों की छाया तले मधुर विदाई-गीत गा दिया है, जो उसके हृदय को और अधिक व्याकुल कर देता है।

वह आगे कहती है कि उसकी साधना के जिस फल पर न जाने कितनी लालायित दृष्टियाँ टिकी हुई थीं, उसे वह लंबे समय से सबकी कुटिल इच्छाओं से बचाती चली आ रही थी। किंतु इतने संघर्ष और संयम के बावजूद उसकी आशा पूर्ण नहीं हो सकी। अंततः जीवन में जो कुछ उसने तप, त्याग और साधना से अर्जित किया था, वह सब उसके हाथों से छिन गया। इस प्रकार उसका संपूर्ण जीवन एक असफल साधना और अधूरी कामना का प्रतीक बनकर रह गया है।

विशेष –

* देवसेना अपने जीवन में अर्जित प्रत्येक मूल्य को खो चुकी नारी के रूप में चित्रित हुई है।

* अतीत की स्मृतियाँ भी उसके लिए सुखद न होकर पीड़ादायक बन गई हैं।

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* छायावादी काव्य की **निराशा, करुणा और आत्मिक पीड़ा** का मार्मिक चित्रण मिलता है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न**

**प्रश्न 1.** देवसेना के अनुसार स्वप्नों के थक जाने के बाद भी क्या शेष रह गया है?

(क) विरक्ति

(ख) मोह की मधुरता

(ग) क्रोध

(घ) उदासीनता

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 2.** घने वन-प्रदेश में गाया गया विदाई-गीत किस भाव को तीव्र करता है?

(क) उल्लास

(ख) आशा

(ग) करुणा और विरह

(घ) वीरता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** देवसेना अपनी साधना के फल को किससे बचाती रही?

(क) प्रकृति की बाधाओं से

(ख) शत्रुओं के आक्रमण से

(ग) लोगों की कुटिल इच्छाओं से

(घ) समय की गति से

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** ‘मैंने जीवन में जो कुछ भी कमाया था, वह सब खो दिया’ — इस कथन से कौन-सा भाव प्रकट होता है?

(क) संतोष

(ख) आत्मगौरव

(ग) पूर्ण निराशा

(घ) विद्रोह

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में प्रमुख रूप से किस काव्यधारा की विशेषता दिखाई देती है?

(क) रीतिकालीन शृंगार

(ख) वीरगाथात्मक चेतना

(ग) छायावादी दुखवाद

(घ) प्रगतिवादी यथार्थ

**सही उत्तर :** (ग)

**काव्य भाग – “ब”**

 (i) व्याख्या

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित **‘देवसेना का गीत’** से उद्धृत हैं। यह गीत कवि के ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाया गया है। इस गीत में देवसेना के हृदय में संचित समस्त वेदना, निराशा और आत्मसंघर्ष अत्यंत करुण रूप में अभिव्यक्त हो उठते हैं। यह गीत उसके टूटे हुए स्वप्नों और असफल साधना की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

**व्याख्या -देवसेना अपने अंतःकरण की गहन व्यथा को स्वर देते हुए कहती है कि अब उसके जीवन में विनाश के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रह गया है। उसका जीवन मानो प्रलय की छाया में आ गया है और जीवन-रूपी रथ के साथ प्रलय स्वयं सहयात्री बनकर चल रहा है। इसके बावजूद वह अपने दुर्बल और थके हुए चरणों से उसके साथ प्रतिस्पर्धा करती हुई आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है। यह उसके अदम्य आत्मबल और अंतःसंघर्ष का परिचायक है।

आगे वह इस निष्ठुर संसार को संबोधित करते हुए कहती है कि अब उसके हृदय से करुण रागिनी नहीं, बल्कि हाहाकार फूट पड़ा है। संसार ने उसे जो कुछ सौंपा था—सुख, आशा, विश्वास—उसे अब वह संभाल पाने में असमर्थ है। इसलिए वह संसार से निवेदन करती है कि अपनी वह अमानत उससे वापस ले ले। इन्हीं भारों के कारण वह अपने मन की लज्जा की रक्षा भी न कर सकी और सबके समक्ष उसे खो बैठी। इस प्रकार देवसेना का यह विलाप उसके जीवन की पूर्ण विफलता, आत्मग्लानि और गहन निराशा का प्रतीक बन जाता है।

विशेष –

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* रूपक, अनुप्रास एवं पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

* छायावादी काव्य की **निराशा, आत्मसंघर्ष और करुणा** का सजीव चित्रण मिलता है।

* गीत में गेयता और भावात्मक प्रवाह स्पष्ट रूप से विद्यमान है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न**

**प्रश्न 1.** देवसेना के अनुसार उसके जीवन में अब क्या शेष रह गया है?

(क) नवीन आशा

(ख) संघर्ष की विजय

(ग) प्रलय

(घ) संतोष

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** ‘जीवन-रूपी रथ पर प्रलय का साथ चलना’ किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) अतिशयोक्ति

(घ) विरोधाभास

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 3.** देवसेना अपने दुर्बल पैरों से भी आगे बढ़ने का प्रयास क्यों करती है?

(क) संसार को चुनौती देने के लिए

(ख) अपने आत्मबल के कारण

(ग) विजय की आशा में

(घ) भय के कारण

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** ‘हृदय की करुण रागिनी का हाहाकार करना’ किस भाव को प्रकट करता है?

(क) उल्लास

(ख) क्रोध

(ग) गहन वेदना और निराशा

(घ) वीरता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में प्रमुख रूप से किस काव्यधारा की विशेषताएँ दिखाई देती हैं?

(क) रीतिकाल

(ख) वीरगाथा काल

(ग) छायावादी दुखवाद

(घ) प्रगतिवाद

**सही उत्तर :** (ग)

No Comments

    Leave a Reply

    error: Content is protected !!
    error: Alert: Content is protected !!