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12 up board hindi ,bhasha aur aadhunikata,g.sunder reddy,भाषा और आधुनिकता ,जी.सुंदर रेड्डी

September 7, 2022
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12 up board hindi ,bhasha aur aadhunikata,g.sunder reddy,

भाषा और आधुनिकता ,जी.सुंदर रेड्डी

निर्देशःगद्य भाग में आपकों गद्य पाठों में से कोई दो गद्यांश दिये जाएगे, आपको अपनी सुविधा के अनुसार एक ही गद्यांश चुनना है, गद्यांश में दो-दो अंक के पाँच प्रश्न होगे, इनमें से एक प्रश्न में पाठ एवं लेखक का नाम पूछा जाएगा, एक प्रश्न में रेखांकित पंक्ति की व्याख्या करना है, शेष तीन प्रश्न गद्यांश से संबंधित होगे।

संकेत-1 किसी भी क्षेत्र में ………………………… ग्रहण कर चलने वाली है                                                   

                किसी भी क्षेत्र में रमणीयता लाने के लिए नित्य नूतनता की आवश्यकता होती है, इसी को दृष्टि में रखकर ही माघ ने कहा होगा:

                रमणीयता और नित्य नूतनता अन्योन्याश्रित हैं, रमणीयता के अभाव में कोई भी चीज मान्य नहीं होती। नित्य नूतनता किसी भी सर्जक की मौलिक उपलब्धि की प्रामाणिकता सूचित करती है और उसकी अनुपस्थिति में कोई भी चीज वस्तुतः जनता व समाज के द्वारा स्वीकार्य नहीं होती। सड़ी-गली मान्यताओं से जकड़ा हुआ समाज जैसे आगे बढ़ नहीं पाता, वैसे ही पुरानी रीतियों और शैलियों की परम्परागत लीक पर चलने वाली भाषा भी जन-चेतना को गति देने में प्रायः असमर्थ ही रह जाती है। भाषा समूची युग-चेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है और ऐसी सशक्तता तभी वह अर्जित कर सकती है जब वह अपने युगानुकूल सही मुहावरों को ग्रहण कर सके। भाषा सामाजिक भाव-प्रकटीकरण की सुबोधता के लिए ही उद्दिष्ट है, उसके अतिरिक्त उसकी जरूरत ही सोची नहीं जाती। इस उपयोगिता की सार्थकता समसामयिक सामाजिक चेतना में प्राप्त (द्रष्टव्य) अनेक प्रकारों की संश्लिष्टताओं की दुरूहता का परिहार करने में ही निहित है। कभी-कभी अन्य संस्कृतियों के प्रभाव से और अन्य जातियों के संसर्ग से भाषा में स्वीकार करने में किसी भी भाषा-भाषी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यही भाषा की आधुनिकता है। भाषा की सजीवता इस नवीनता को पूर्णतः आत्मसात् करने पर ही निर्भर करती है। भाषा ’म्यूजियम’ की वस्तु नहीं है, उसकी स्वतः सिद्ध एक सहज गति है, जो सदैव नित्य नूतनता को ग्रहण कर चलने वाली है।

प्रश्न-1     रमणीयता के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर     रमणीयता के लिए नित्य नूतनता की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न-2     रमणीयता और नूतनता को लेखक ने क्या माना है और क्यों?

उत्तर     रमणीयता और नूतनता को लेखक अन्योन्याश्रित मानते है, क्योंकि रमणीयता के अभाव में कोई भी चीज मान्य नहीं होती।

प्रश्न-3     कौनसी भाषा जन चेतना को गति देने में असमर्थ रहती है?

उत्तर     पुरानी रीतियों और शक्तियों की परम्परागत लीक पर चलने वाली भाषा जन चेतना को गति देने में असमर्थ रहती है

प्रश्न-4     भाषा किसका माध्यम है?

उत्तर     भाषा युग चेतना की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है

प्रश्न-5     भाषा का उद्दिष्ट क्या है?

उत्तर     भाषा सामाजिक भाव प्रकटीकरण और सुबोधता के लिए उद्दिष्ट है।

प्रश्न-6     विदेशी भाषा के शब्द प्रयोग के बारे में लेखक की क्या राय है?

अथवा

                भाषा की आधुनिकता क्या है?

उत्तर     ऐसे शब्द जो अपनी भाषा में प्राप्त न हो, उन्हें वैसे ही अपनी भाषा में स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। ऐसे नवीन शब्दों को स्वीकार करना अथवा व्यवृहृत बनाना भाषा की आधुनिकता है।

प्रश्न-7     ‘भाषा म्यूजियम की वस्तु नहीं,’ इस कथन से लेखक का क्या आशय है।

उत्तर     ‘भाषा म्यूजियम में रखी वस्तु नहीं है,’ कहने से लेखक का आशय यह है कि भाषा इतिहास की धरोहर अथवा सहेजने अथवा देखने भर की चीज नहीं, भाषा का संबंध दैनिक व्यवहार से है, जो समय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है।

प्रश्न-8     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-2 ;पद्ध भाषा स्वयं संस्कृति ………………………… अटूट अंग है।                                                                  

                भाषा स्वयं की संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति से निःसृत होने पर भी, परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव के कारण उद्भूत नयी सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नये प्रयोगों की, नयी भाव-योजनाओं को व्यक्त करने के लिए नये शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।

                ;पपद्ध अब प्रश्न यह है……………………………… अत्यन्त आवश्यकता है।                                        

                अब प्रश्न यह है कि भाषा में ये परिवर्तन कैसे संभव हैं? यत्नसाध्य अथवा सहजसिद्ध? यत्नसाध्य से हमारा तात्पर्य यह है कि भाषा को युगानुकूल बनाने के पीछे किसी व्यक्ति-विशेष अथवा व्यक्ति-समूह का प्रयत्न होना ही चाहिए। सहजसिद्ध से आशय इतना ही है कि भाषा की गति स्वाभाविक होने के कारण यह किसी प्रयत्न-विशेष की अपेक्षा नहीं रखती है। यदि उपलब्ध भाषा वैज्ञानिक आधारों का पर्याप्त अनुशीलन करें, तो पहली बात ही सत्य सिद्ध होगी। अठारहवीं शती में अंग्रेजी भाषा ने और बीसवीं शती में जापानी भाषा नें इस नवीनीकरण की पद्धति को अपनी कोशिशों से सम्पन्न बनाया। हर भाषा की अपनी खास प्रवृत्ति होती है, शब्द-निर्माण तथा अर्थग्रहण की दिशा में उसका अपना अलग रूख होता है। उस विशेष प्रवृत्ति के रूख को ध्यान में रखकर ही, बिना उस भाषा की मूल आत्मा को विकृत बनाये हम अन्य भाषागत शब्दों को स्वीकार कर सकते हैं, चंद रूपगत परिवर्तनों के साथ। यह काम एशिया और अफ्रीका जैसे वैज्ञानिक साहित्य-सृजन की दिशा में पिछड़े हुए देशों में और भी सत्वर होना चाहिए और इसकी अत्यन्त आवश्यकता है।

प्रश्न-1     भाषा और संस्कृति में क्या साम्य है?

उत्तर     भाषा भी परिवर्तन एवं गतिशील है और संस्कृति भी परिवर्तन एवं गतिशील है।

प्रश्न-2     नये शब्दों की खोज की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर     नित नवीन वैज्ञानिक आविष्कार हो रहे है किन्तु उन शब्दों को व्यक्त करने के लिए हमारे पास पर्याप्त शब्द नहीं है, इसलिए नए शब्दों की खोज की आवश्यकता है।

प्रश्न-3     भाषा में परिवर्तन के लिए यत्न साधन से क्या आशय है

उत्तर     सत्य साध्य से आशय है कि भाषा को युगानुकूल बनाने के पीछे किसी विशेष व्यक्ति या समूह का प्रयत्न होता है।

प्रश्न-4     भाषा में सहजसिद्ध परिवर्तन कैसे संभव है

उत्तर     सहज सिद्ध से आशय यह है कि भाषा कि अपनी स्वाभाविक गतिशीलता के होने के कारण किसी अन्य प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न-5     कौन-कौन सी भाषाएँ नवीनीकरण पद्धति अपना कर सम्पन्न हुई?

उत्तर     अंग्रेजी और जापानी भाषाएँ नवीनीकरण की पद्धति अपनाकर सम्पन्न हुई।

प्रश्न-6     लेखक ने किस बात की आवश्यकता बतलाई ?

उत्तर     अफ्रीका और एशिया के देशों को अपनी परम्परागत भाषा में नई तकनीक एवं वैज्ञानिक शब्दों को अपनाने की आवश्यकता बतलाई।

प्रश्न-7     पाठ और पाठ का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-3 और एक प्रश्न ………………………… काम सुचारू बना सकंेगे।

                भाषा की साधारण इकाई शब्द है, शब्द के अभाव में भाषा का अस्तित्त्व ही दुरूह है। यदि भाषा में विकसनशीलता शुरू होती है तो शब्दों के स्तर पर ही। दैनंदिन सामाजिक व्यवहारों में हम कई ऐसे नवीन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि विदेशी भाषाओं से उधार लिये गये हैं। वैसे ही नये शब्दों का गठन भी अनजाने में अनायास ही होता है। ये शब्द अर्थात् उन विदेशी भाषाओं से सीधे विकृत ढंग से उधार लिये गये शब्द, भले ही कामचलाऊ माध्यम से प्रयुक्त हों, साहित्यिक दायरे में कदापि ग्रहणीय नहीं। यदि ग्रहण करना पड़े तो उन्हें भाषा की मूल प्रकृति के अनुरूप साहित्यिक शुद्धता प्रदान करनी पड़ती है। यहाँ प्रयत्न की आवश्यकता प्रतीत होती है।

                और एक प्रश्न यह है कि कौन इस साहित्यिक शुद्धीकरण का जिम्मा अपने ऊपर ले सकते हैं? हिन्दी भाषा के नवीनीकरण (शुद्धीकरण) के लिए भारत सरकार ने अब तक काफी प्रयत्न किया है। इसके लिए सन् 1950 में शास्त्रीय एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की गयी, जो विज्ञान की हर शाखा के लिए योग्य शब्दावली का निर्माण कर रही है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन जैसी ऐच्छिक संस्थाओं ने भी इस दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण काम किया। राहुल सांकृत्यायन और डॉ. रघुवीर जैसे मूर्धन्य मनीषियों ने भी इस काम को पहले-पहल अपनी अभिरूचि के कारण अपने ऊपर लेकर, गतिशील दशा से गुजरकर आगे बढ़ नहीं सका। इसकी प्रगति के अवरोध में दो वर्ग बाधा डालते हैं। प्रथम वह वर्ग, जो अपनी शुद्ध साहित्यिक दृष्टि के कारण आम प्रचलित उन पराये शब्दों को यथावत् ग्रहण करने में संकोच करता है। दूसरा वह वर्ग, जो अपने विषय के पारंगत होने पर भी साहित्यिक व भाषा वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के अभाव मंे उन प्रयुक्त विदेशी शब्दों को मनमाने ढंग से विकृत कर अपनी मातृभाषा में थोपना चाहता है – आजकल कई प्रादेशिक सरकारों ने अपनी प्रांतीय भाषाओं में उच्च स्तरीय पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण के लिए कई आयोगों की स्थापना की है। हम आशा करते हैं कि वे आयोग उपर्युक्त उन बाधित तत्त्वों से हटकर अपना काम सुचारू बना सकेंगे।

प्रश्न-1     शब्द के अभाव में भाषा कैसी हो जाएगी।

उत्तर     शब्द के अभाव में भाषा का अस्तित्व दुरूह हो जाएगी।

प्रश्न-2     हिन्दी ने किन-किन भाषाओं के शब्द उधार लिए है।

उत्तर     अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि विदेशी भाषाओं से उधार लिए गए है।

प्रश्न-3     विदेशी शब्दों के इस्तेमाल करने पर क्या करना होगा।

उत्तर     विदेशी शब्दों इस्तेमाल करने पर भाषा की मूल प्रकृति के अनुरूप साहित्यिक शुद्धता प्रदान करनी पड़ती क्योंकि साहित्यिक दायरे में उसे ज्यों का त्यों ग्राह्य नहीं किया जा सकता।

प्रश्न-4     भाषा की शुद्धता के लिए सरकार ने क्या प्रयत्न किया।

उत्तर     भाषा की शुद्धता के लिए सरकार ने 1950 में शास्त्रीय एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की जो विज्ञान की हर शाखा के लिए योग्य शब्दावली का निर्माण कर रही है।

प्रश्न-5     दो साहित्यकारों के नाम बतलाइए जिनका हिन्दी के शुद्धीकरण में महत्वपूर्ण योगदान रहा ?

उत्तर     हिन्दी के शुद्धीकरण में राहुल सांकृत्यायन और डॉ. रघुवीर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

प्रश्न-6     लेखक ने भाषा शुद्धीकरण की प्रगति में कौनसी दो बाधाएँ बतलाई है?

उत्तर     भाषा की शुद्धीकरण की प्रगति में दो बाधाएँ है-

                ;1द्ध पराये शब्दों को यथावत ग्रहण करने में संकोच

                ;2द्ध विदेशी शब्दों को मनमाने ढंग से विकृत कर मातृभाषा में थोपना।

प्रश्न-7     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-4 ;।द्ध विज्ञान की प्रगति के कारण  ………………………… अंग्रेजी से रूसी ने।                                    

                विज्ञान की प्रगति के कारण नयी चीजों का निरंतर आविष्कार होता रहता है। जब कभी नया आविष्कार होता है, उसे एक नयी संज्ञा दी जाती है। जिस देश में उसकी सृष्टि की जाती है वह देश उस आविष्कार के नामकरण के लिए नया शब्द बनाता है। वही शब्द प्रायः अन्य देशों में बिना परिवर्तन के वैसे ही प्रयुक्त किया जाता है। यदि हर देश उस चीज के लिए अपना-अपना नाम देता रहेगा तो उस चीज को समझने में ही दिक्कत होगी। जैसे रेडियो, टेलीविजन, स्पूतनिक। प्रायः सभी भाषाओं में इनके लिए एक ही शब्द प्रयुक्त है। और एक उदाहरण देखिए: ’सीढ़ी लगाना’। ऊपर चढ़ने के लिए अनादि काल से भार में एक ही साधन मौजूद था – ’सीढ़ी’। औद्योगिक क्रांति आदि ने आवश्यकता के अनुसार और भी कई तरह की सीढ़ियों का निर्माण किया, जैसे – लिफ्ट, एलिवेटर, एस्कलेटर आदि। भारतीयों के लिए ये बिल्कुल नये शब्द हैं और इसलिए भारतीय भाषाओं में इसके लिए अलग-अलग नाम द्रष्टव्य नहीं होते। इस स्थिति में उन शब्दों को यथावत् ग्रहण करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। फ्रंेच और लैटिन भाषाओं से अंग्रेजी ने ऐसे ही कई शब्दों को आत्मसात् कर लिया और अंग्रेजी से रूसी ने।

                ;ठद्ध कभी-कभी एक ही भाव …………………………. शब्द बनकर सर्व प्रचलित होते है।

                कभी-कभी एक ही भाव के होते हुए भी उसके द्वारा ही उसके और अन्य पहलू अथवा स्तर साफ व्यक्त नहीं होते। उस स्थिति में अपनी भाषा में ही उपस्थित विभिन्न पर्यायवाची शब्दों का सूक्ष्म भेदों के साथ प्रयोग करना पड़ता है। जैसे उष्ण एक भाव है। जब किसी वस्तु की उष्णता के बारे में कहना हो तो हम ’ऊष्मा’ कहते हैं और परिणाम के सन्दर्भ में उसी को हम ’ताप’ कहते हैं वस्तुतः अपनी मूल भाषा में उष्ण, ऊष्मा, ताप-इनमें उतना अंतर नहीं, जितना अब समझा जाता है। पहले अभ्यास की कमी के कारण जो शब्द कुछ कटु या विपरीत से प्रतीत हो सकते हैं, वे ही कालांतर में मामूली शब्द बनकर सर्वप्रचलित होते हैं।

प्रश्न-1     तकनीक शब्दों को उसी रूप स्वीकारना क्यों आवश्यक है?

उत्तर     जब कभी कोई नया आविष्कार होता है, वह देश उसे एक नई संज्ञा देता है, यदि हर देश उसके लिए अपना नाम देगा तो उस चीज को समझने में दिक्कत होगी, इसलिए तकनीक शब्दों को उसी रूप में स्वीकारना होगा।

प्रश्न-2     लेखक ने तकनीकी शब्दों को उसी रूप में स्वीकारने का कौनसा उदाहरण प्रस्तुत किया ?

उत्तर     लेखक ने उदाहरण दिया कि फ्रेंच और लेटिन भाषाओं से अंग्रेजी ने ऐसे ही कई शब्दों को आत्मसात किया और अंग्रेजी से रूसी ने।

प्रश्न-3     किस स्थिति में अपनी भाषा में ही उपस्थित पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है?

उत्तर     कभी-कभी एक ही भाव के होते हुए उस शब्द द्वारा स्पष्ट नहीं हो पाता, उस स्थिति में अपनी भाषा में ही उपस्थित विभिन्न पर्यायवाची शब्दों का सूक्ष्म भेद के साथ प्रयोग करना पड़ता है।

प्रश्न-4     सूक्ष्म भेद का लेखक ने कौनसा उदाहरण प्रस्तुत किया है?

उत्तर     उष्ण, ऊष्मा और ताप में अन्तर नहीं है किन्तु अर्थ ग्रहण के उद्धेश्य में सूक्ष्म भेद के साथ तीनों के अलग-अलग अर्थ निकाले गए, और वही अर्थ प्राथमिक हो गया।

प्रश्न-5     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-5 नवीनीकरण कितना ही प्रशस्त  ………………………… एकदम बनावटी बनेगी।

                नवीनीकरण कितना ही प्रशस्त कार्य क्यों न हुआ हो उस प्रक्रिया में यह भूलना नहीं चाहिए कि भाषा का मुख्य कार्य सुस्पष्ट अभिव्यक्ति है। यदि सुस्पष्टता एवं निर्दिष्टता से कोई भी भाषा वंचित रहे तो वह भाषा चिरकाल तक जीवित नहीं रह सकेगी। नये शब्दों के निर्माण में भी यही बात सोचनी चाहिए। इस सन्दर्भ में यह भी याद रखना चाहिए कि हम पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उस शब्द की मूल आत्मा तथा सार्थकता पर उन्मुक्त विचार कर सकें। अंग्रेजी भाषा शासकों की भाषा रही और भाव-दासता की निशानी है – ऐसा सोचकर यदि हम नये शब्दों का निर्माण करने में लग जायें तो नुकसान हमारा ही होगा, अंग्रेजों का नहीं। उर्दू में प्रयुक्त अरबी और फारसी के शब्दों को जो इस्लाम धर्म को ज्ञापित करने वाले हैं, हिन्दी वाले त्यागना आरम्भ करें तो हिन्दी-भाषा सहज भाषा न रहकर एकदम बनावटी बनेगी।

प्रश्न-1     नवीनीकरण की प्रक्रिया में कौनसी बात नहीं भूलनी चाहिए?

उत्तर     नवीनीकरण की प्रक्रिया में यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मुख्य कार्य सुस्पष्ट अभिव्यक्ति ही है।

प्रश्न-2     किस स्थिति में कोई भाषा चिरकाल तक जीवित नही रह सकती?

उत्तर     यदि सुस्पष्टता एवं निर्दिष्टता से कोई भाषा वंचित रहे तो वह भाषा चिरकाल तक जीवित नहीं रह सकेगी।

प्रश्न-3     नवीनीकरण की प्रक्रिया में कौनसी बात याद रखनी चाहिए?

उत्तर     हमें यह भी याद रखना होगा कि हम पूर्वाग्रह से मुक्त होकर उस शब्द की मूल आत्मा तथा सार्थकता पर उन्मुक्त विचार कर सकें।

प्रश्न-4     शब्द निर्माण में कौनसा भाव नुकसान पहुँचा सकता है?

उत्तर     यदि हम अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से इस कारण परहेज करें कि यह तो अंग्रेजी शासकों की भाषा रही और भाव दासता की निशानी है, यह भाव शब्द निर्माण में नुकसान पहुँचा सकता है।

प्रश्न-5     किस स्थिति में भाषा सहज न रहकर बनावटी बन जाएगी।

उत्तर     उर्दू में प्रयुक्त अरबी और फारसी के शब्दों को जो इस्लाम धर्म को ज्ञापित करने वाले, हिन्दी वाले त्यागना आरम्भ करे तो हिन्दी भाषा सहज न होकर बनावटी हो जाएगी।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-6 यदि यह नवीनीकरण सिर्फ  ………………………… समाधान जुड़ा हुआ है।                         

                यदि यह नवीनीकरण सिर्फ कुछ पंडितों की व आचार्याें की दिमागी कसरत ही बनी रहे तो भाषा गतिशील नहीं होती। भाषा का सीधा संबंध प्रयोग से है और जनता से है। यदि नये शब्द अपने उद्गम स्थान में ही अड़े रहे और कहीं भी उनका प्रयोग किया नहीं जाय तो उसके पीछे के उद्देश्य पर ही कुठाराघात होगा। इसके लिए यूरोपीय देशों में प्रेषक के कई माध्यम हैं: श्रव्य-दृश्य विधान, वैज्ञानिक कथा-साहित्य आदि। हमारी भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक कथा-साहित्य प्रायः नहीं के बराबर है। किसी भी नये विधान की सफलता अंततः जनता की सम्मति व असम्मति के आधार पर निर्भर करती है और जनता में इस चेतना को उजागर करने का उत्तरदायित्व शिक्षित समुदाय एवं सरकार का होना चाहिए। भाषा में आधुनिकता लाने के लिए व्यावहारिक भाषा के स्वरूप का मानकीकरण करने के साथ-साथ लिपि संबंधी सुधार भी आवश्यक है। भाषा के प्रयोग और उपयोग के साथ इन समस्याओं का सामाधान जुड़ा हुआ है।

प्रश्न-1     लेखक के अनुसार किस स्थिति में भाषा गतिशील नहीं रह सकती ?

उत्तर     यदि नवीनीकरण कुछ पंडितों की या आचार्यो की दिमागी कसरत बनी रह गई तो भाषा गतिशील नहीं रह सकती ।

प्रश्न-2     नवीन शब्द निर्माण के पीछे किस स्थिति में कुठाराघात हो सकता है?

उत्तर     यदि नए शब्द अपने उद्गम स्थान पर ही अडे़ रहे और कहीं भी उनका प्रयोग नहीं किया जाए तो ऐसा करना नवीनीकरण के उद्धेश्य पर कुठाराघात होगा।

प्रश्न-3     नये विधान की सफलता किस पर निर्भर है?

उत्तर     नए विधान की सफलता जनता की सम्मति अथवा असम्मति पर निर्भर है।

प्रश्न-4     जनता में चेतना जाग्रत करने का दायित्व किसका है?

उत्तर     जनता में चेतना जाग्रत करने का उत्तरदायित्व शिक्षित समुदाय एवं सरकार का होना चाहिए।

प्रश्न-5     भाषा का मानकीकरण के साथ-साथ लेखक ने और क्या आवश्यक बतलाया है?

उत्तर     भाषा का मानकीकरण करने के साथ-साथ लिपि संबंधी सुधार भी आवश्यक है।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

संकेत-7 संक्षेप में, नए शब्द, नए मुहावरे  ………………………… अपने आप आधुनिकता आ जाएगी।

                संक्षेप में, नये शब्द, नये मुहावरे एवं नयी रीतियों के प्रयोगों से युक्त भाषा को व्यावहारिकता प्रदान करना ही भाषा में आधुनिकता लाना है। दूसरे शब्दों में केवल आधुनिक युगीन विचारधाराओं के अनुरूप नये शब्दों के गढ़ने मात्र से ही भाषा का विकास नहीं हो वरन् नये पारिभाषिक शब्दों को एवं नूतन शैली-प्रणालियों को व्यवहार में लाना ही भाषा को आधुनिकता प्रदान करना है। क्योंकि व्यावहारिकता ही भाषा का प्राण-तत्त्व है। नये शब्द और नये प्रयोगों का पाठ्य-पुस्तकों से लेकर साहित्यिक पुस्तकों तक एवं शिक्षित व्यक्तियों से लेकर अशिक्षित व्यक्तियों तक के सभी कार्यकलापों में प्रयुक्त होना आवश्यक है। इस तरह हम अपनी भाषा को अपने जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए जब प्रयुक्त कर सकेंगे तब भाषा में अपने-आप आधुनिकता आ जायेगी।            

प्रश्न-1     लेखक ने किस तरह के प्रयोग से भाषा को व्यावहारिकता प्रदान करने की अनुशंसा की है? ‘अथवा’ भाषा में आधुनिकता कैसे लाई जा सकती है?

उत्तर     भाषा में नए शब्द नए मुहावरे एवं नई रीतियों के प्रयोग से युक्त भाषा को व्यावहारिकता प्रदान करनी होगी, इस तरह भाषा में आधुनिकता लाई जा सकती है।

प्रश्न-2     आधुनिक युगीन विचारधाराओं के अनुरूप नए शब्दों के गढ़ने के साथ-साथ भाषा के विकास के लिए लेखक ने क्या सलाह दी है?

उत्तर     लेखक ने आधुनिक युगीन विचारधाराओं के अनुकूल नए शब्द गढ़ने के साथ ही नए पारिभाषिक शब्दों को एवं नूतन शैली प्रणाली को व्यवहार में लाने की सलाह दी है।

प्रश्न-3     भाषा का प्राण तत्व क्या है?

उत्तर     भाषा को आधुनिक बनाने के लिए किए गए प्रयोगों को व्यावहारिक बनाना ही भाषा का प्राण तत्व है।

प्रश्न-4     नए शब्द और नए प्रयोगों सम्बन्धी क्रिया कलापों को कहाँ-कहाँ प्रयुक्त करना होगा?

उत्तर     नए शब्द और नए प्रयोगों का पाठ्य पुस्तक से लेकर साहित्यिक पुस्तकों तक एवं शिक्षित व्यक्तियों से लेकर अशिक्षित व्यक्तियों तक के सभी कार्य कलापों में प्रयुक्त करना होगा।

प्रश्न-5     लेखक के अनुसार भाषा में अपने आप आधुनिकता कब आ सकती है?

उत्तर     जब हम अपनी भाषा को अपने जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए प्रयुक्त कर व्यावहारिक बनाएंगे, तो भाषा में अपने आप आधुनिकता आ जाएगी।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – भाषा और आधुनिकता और लेखक है – जी.एस. रेड्डी

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