12 cbse /hindi/Antra / Chapter -8 / baarah masa/ malik mohammad jayasi/ बारहमासा/ मालिक मोहम्मद जायसी
बारहमासा-जायसी ,प्रश्न – उत्तर
प्रश्न 1.
अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी ( नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर :
1-अगहन के महीने में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं। मौसम ठंडा हो जाता है। इस मास में विरहिणी नागमती की विरह-व्यथा और भी अधिक बढ़ गई है। वह अपने पति के असहनीय वियोग को सहन नहीं कर पा रही है। उसे पति की जुदाई में लंबी रातें काटना कठिन प्रतीत हो रहा है। ठंड से वह काँपती रहती है और सरदी के वस्त्र भी नहीं बनवाती है क्योंकि उसका साज-शृंगार देखने वाला पति तो उससे दूर है। शीत आग बनकर उसे जलाता रहता है। उसे लगता है कि पति के वियोग में उसका यौवन और जीवन इसी प्रकार से विरहाग्नि में जलकर राख हो जाएगा।
प्रश्न 2.
‘जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर :
नागमती अपने पति के वियोग में इतनी अधिक व्याकुल हो चुकी है कि संसार की कोई वस्तु उसे सुख नहीं देती। उसका शरीर दिन-प्रतिदिन दुर्बल होता जा रहा है। पूस महीने की कठोर ठंड उसे प्राणघातक प्रतीत होती है, क्योंकि पति की निकटता ही उसे इस ठंड से बचा सकती थी। उसे लगता है कि विरह रूपी बाज़ उसके चारों ओर मँडरा रहा है, जैसे वह किसी निरीह पक्षी को अपना शिकार बनाना चाहता हो। यह विरह न उसे जीवित रहने देगा और न ही मरते समय उसे प्रियतम के वियोग से मुक्त करेगा। इसी पीड़ा के कारण उसका शरीर रक्तहीन-सा हो गया है, अंग शिथिल पड़ गए हैं, हड्डियाँ सूख गई हैं और वह मानो निष्प्राण-सी बन गई है।
प्रश्न 3.
माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?
उत्तर :
माघ महीने में ठंड अपने चरम पर पहुँच जाती है। प्रियतम के वियोग में विरहिणी नायिका के लिए दिन काटना भी कठिन हो जाता है। उसकी आँखों से माघ की वर्षा के समान निरंतर आँसू बहते रहते हैं। इन आँसुओं से भीगे वस्त्र उसके शरीर को बाण की तरह चुभते हैं। तेज़ शीतल हवाएँ और ओलों की वर्षा उसके कष्ट को और बढ़ा देती हैं। यद्यपि माघ मास में वनस्पतियों में रस का संचार होता है, पर प्रियतम के वियोग में उसका जीवन पूर्णतः रसहीन हो गया है। वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है। उसका शरीर तिनके के समान हल्का हो गया है और तेज़ हवाएँ उसे हिलाती रहती हैं। उसे प्रतीत होता है कि वह विरहाग्नि में जलकर राख बनकर उड़ जाने को तत्पर है।
प्रश्न 4.
वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से बाँखें किस माह में गिरते हैं ? इससे विरहिणी का क्या संबंध है ?
उत्तर :
फागुन के महीने में वृक्षों की पत्तियाँ पीली पड़कर झड़ने लगती हैं और वनों की ढाँखें भी गिर जाती हैं। इस प्राकृतिक परिवर्तन का गहरा संबंध विरहिणी की अवस्था से है। जैसे फागुन में वृक्षों के पत्ते झड़ जाते हैं, वैसे ही प्रियतम के वियोग में विरहिणी की देह भी दिन-प्रतिदिन क्षीण होकर पीली पड़ गई है। इस मास में ठंड का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है तथा तीव्र शीतल हवाएँ चलने लगती हैं। विरहिणी को भय है कि वह इन ठंडी हवाओं के झोंकों को सहन नहीं कर पाएगी। उसे लगता है कि उसकी पीली पड़ चुकी देह भी उसी प्रकार नष्ट हो जाएगी, जैसे तेज़ हवा से वृक्षों के सूखे पत्ते झड़ जाते हैं। इस कारण उसे अपने प्राणांत की आशंका सताने लगती है।
प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए –
(क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुइई तेहिक धुआँ हम लाग।
(ख) रकत बरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।
(ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल।
तेहि पर विरह जराई कै, चह उड़ावा झोल।
(घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग होइ परीं, कंत धरं जहाँ पाउ।
उत्तर :
व्याख्या के लिए इस पाठ का सप्रसंग व्याख्या भाग देखिए।
प्रश्न 6.
प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सँददर्य पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
कवि ने इन पदों में अनुप्रास, उपमा, विरोधाभास, उत्प्रेक्षा, स्वरमैत्री तथा यमक अलंकारों का अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग किया है, जिससे काव्य सौंदर्य में वृद्धि हुई है। ‘जरै बिरह ज्यों दीपक बाती’ में नायिका को विरह की ज्वाला में उसी प्रकार जलते हुए दिखाया गया है, जैसे दीपक की बत्ती जलती है। ‘घर-घर’ शब्द के प्रयोग से सर्वत्र व्याप्त ठंड का बोध होता है। ‘अबहूँ फिरै फिरै रंग सोई’ में यमक अलंकार है—पहला ‘फिरै’ राजा रत्नसेन के लौटने की कामना को और दूसरा ‘फिर’ नायिका के सौंदर्य के पुनः लौटने की इच्छा को प्रकट करता है। ‘सियरी अग्नि’ में विरोधाभास अलंकार है, क्योंकि प्रेम की ज्वाला भीतर-ही-भीतर जलाती है, जो बाहर दिखाई नहीं देती, किंतु प्रेमी को पूर्णतः जला डालती है।
दूसरे छंद में कवि ने उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकारों का सशक्त प्रयोग किया है। अनुप्रास ने वर्ण-सौंदर्य को निखारा है। ‘घर-घर’ और ‘कँपि-कँपि’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार द्वारा शीत की भीषणता को प्रभावी रूप में व्यक्त किया गया है। ‘सौर सुपती आवे जूड़ी’ में विरोधाभास है—जहाँ सामान्यतः रजाई गरमी देती है, वहीं विरहिणी के लिए वही ठंड का कारण बन जाती है। ‘पँखी’ शब्द में श्लेष अलंकार है, जो पक्षी और प्रवासी पति—दोनों का बोध कराता है। ‘विरह सैचान’ में रूपक अलंकार है, जिसमें वियोग को बाज़ के समान निर्दयी और पीड़ा बढ़ाने वाला बताया गया है।
परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न –बारह मासा,मालिक मोहम्मद जायसी
#प्रश्न 1.
नागमती के विरह-वर्णन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मालिक मुहम्मद जायसी कृत *‘पद्मावत’* में नागमती का विरह-वर्णन अत्यंत मार्मिक, स्वाभाविक और भावप्रवण है। इसमें प्रेम की गहन पीड़ा और नारी-हृदय की व्याकुलता का सजीव चित्रण हुआ है। नागमती अपने प्रिय रत्नसेन के वियोग में निरंतर संतप्त रहती है और उसकी मानसिक अवस्था उन्मादिनी-सी हो जाती है।
वह एक सामान्य नारी के समान दयनीय स्थिति में पहुँच जाती है, जहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण पीड़ादायक बन जाता है। सावन, फागुन, अगहन और पूस जैसे मास उसके विरह-ताप को और भी तीव्र कर देते हैं। संयोगकाल की सुखद वस्तुएँ अब उसे दुखद प्रतीत होने लगती हैं। उसका विरह इतना गहन है कि वह प्रिय के वियोग में आत्म-बलिदान तक को तत्पर दिखाई देती है। यही इस विरह-वर्णन की सबसे बड़ी विशेषता है।
—
#प्रश्न 2.
‘बारहमासा’ का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘बारहमासा’ मालिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य *‘पद्मावत’* के नागमती-वियोग खंड से संकलित है। इसका मूल भाव रानी नागमती की विरह-वेदना का मार्मिक और क्रमबद्ध चित्रण है। कवि ने बारह महीनों के माध्यम से यह दिखाया है कि समय और ऋतु-परिवर्तन नायिका की पीड़ा को कैसे प्रभावित करते हैं।
अगहन, पूस, माघ, फागुन आदि महीनों में नागमती की मानसिक दशा और विरह-व्यथा और अधिक तीव्र हो जाती है। प्रकृति की कठोरता और प्रिय के अभाव का संयोग उसके दुःख को असहनीय बना देता है। इस प्रकार *‘बारहमासा’* का मूल भाव प्रेम-वियोग की गहराई, नारी-हृदय की संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ मानवीय भावों का सामंजस्य है।
—
#प्रश्न 3.
अगहन मास का नागमती के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
अगहन मास में शीत की तीव्रता बढ़ जाती है, जिससे नागमती की विरह-वेदना और अधिक गहरी हो जाती है। इस मास में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं। लंबी रातें नागमती के लिए अत्यंत कष्टदायक सिद्ध होती हैं, क्योंकि प्रिय के अभाव में उसका एक-एक क्षण पीड़ा से भर जाता है।
शीतलता उसके तन के साथ-साथ मन को भी कंपा देती है। इस मास में उसका अकेलापन और अधिक उभरकर सामने आता है, जिससे उसका हृदय विरह-ताप से भर उठता है।
—
#प्रश्न 4.
पूस मास प्रियतमा को किस प्रकार व्यथित कर देता है?
उत्तर :
पूस मास में शीत अपने चरम पर पहुँच जाती है। सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण ठंड अत्यधिक बढ़ जाती है, जो वियोगावस्था में नागमती को भीतर तक कंपा देती है। इस भीषण शीत में प्रिय का साथ न होना उसकी पीड़ा को असहनीय बना देता है।
शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक वेदना भी तीव्र हो जाती है। प्रियतम की अनुपस्थिति में यह ठंड उसे मरणासन्न-सी अवस्था में पहुँचा देती है, जिससे उसका विरह और अधिक मार्मिक रूप ले लेता है।
—
#प्रश्न 5.
माघ मास नायिका को किस प्रकार व्यथित करता है?
उत्तर :
माघ मास में पाला पड़ने लगता है तथा कभी-कभी वर्षा और ओले भी गिरते हैं। प्रकृति की यह कठोरता नागमती की विरह-वेदना को और अधिक बढ़ा देती है। इस समय उसका शरीर दुर्बल हो जाता है और मन अत्यंत व्याकुल हो उठता है।
वह प्रियतम के वियोग में रोती-बिलखती रहती है और उसे ऐसा प्रतीत होता है कि विरह रूपी अग्नि अब उसे पूर्णतः भस्म कर देगी। माघ मास उसकी शारीरिक और मानसिक दुर्बलता को और गहरा कर देता है, जिससे उसका दुःख चरम पर पहुँच जाता है।
#प्रश्न 6.
फागुन मास में नागमती की क्या दशा हो जाती है?
उत्तर :
फागुन मास में शीत के साथ-साथ तीव्र और वेगवान हवाएँ चलने लगती हैं, जिससे ठंड का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। इन ठंडी हवाओं के झोंकों से नागमती की विरह-वेदना असहनीय हो उठती है। उसके शरीर की कांति क्षीण हो जाती है और काया पीली पड़ने लगती है।
प्रियतम के दीर्घ वियोग के कारण वह शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत दुर्बल हो जाती है। उसे यह आशंका सताने लगती है कि जैसे वृक्षों के सूखे पत्ते झड़कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वह भी विरह की मार से नष्ट हो जाएगी। इस प्रकार फागुन मास नागमती के लिए पीड़ा और क्षय का प्रतीक बन जाता है।
—
#प्रश्न 7.
विरह-व्यथित नागमती अंततः क्या कामना करती है?
उत्तर :
प्रियतम राजा रत्नसेन के वियोग में नागमती की पीड़ा जब असह्य हो जाती है, तब वह जीवन से भी विरक्त-सी हो जाती है। वह निरंतर उनकी प्रतीक्षा करती रहती है, किंतु जब उसे यह आभास होने लगता है कि शायद वे अब लौटकर नहीं आएँगे, तो उसका दुःख चरम पर पहुँच जाता है।
अंततः वह यह कामना करती है कि विरह की अग्नि उसे जलाकर भस्म कर दे और पवन उसकी राख को उड़ाकर उसके प्रिय पति के चरणों में पहुँचा दे। यह कामना नागमती के प्रेम की पराकाष्ठा और उसके आत्म-समर्पण को प्रकट करती है।
—
#प्रश्न 8.
नागमती के सुहावने दिवस कैसे लौट सकते हैं?
उत्तर :
नागमती के सुहावने दिवस केवल तभी लौट सकते हैं, जब उसके पति राजा रत्नसेन पुनः उसके पास लौट आएँ। पति के वियोग में उसका जीवन नीरस, सूना और दुःखमय हो गया है। उसे संसार की कोई वस्तु सुखद प्रतीत नहीं होती।
प्रियतम की उपस्थिति ही उसके जीवन का आधार है। उनके आगमन से ही उसका जीवन पुनः आनंद, प्रेम और उल्लास से भर सकता है। अतः रत्नसेन का लौट आना ही नागमती के सुखद दिनों की वापसी का एकमात्र कारण है।
—
#प्रश्न 9.
चकई और कोयल के जीवन में क्या अंतर है?
उत्तर :
चकई और कोयल—दोनों पक्षी प्रेम-वियोग के प्रतीक हैं, किंतु उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण अंतर है। चकई रात्रि में अपने प्रिय से बिछुड़ जाती है, परंतु प्रातःकाल होते ही वह पुनः उससे मिल जाती है। इस कारण उसे सौभाग्यशाली माना गया है।
इसके विपरीत कोयल दिन-रात अपने प्रिय के वियोग में तड़पती रहती है। उसका वियोग निरंतर बना रहता है और उसे मिलन का सुख प्राप्त नहीं होता। इसी कारण कोयल को अभागिनी कहा गया है।
—
#प्रश्न 10.
वसंत ऋतु में प्रियतमा की दशा करुण क्यों हो जाती है?
उत्तर :
वसंत ऋतु के आगमन से प्रकृति में चारों ओर उल्लास और सौंदर्य फैल जाता है। पुराने पत्ते और फल झर जाते हैं, नई-नई कोपलें फूट पड़ती हैं। लताएँ वसंत से मिलकर मानो उल्लास का उत्सव मनाने लगती हैं। संपूर्ण वातावरण सुगंधित, मधुर और मदमस्त हो उठता है।
ऐसे आनंदमय वातावरण में भी प्रियतमा का प्रिय उसके पास नहीं होता। चारों ओर का सुख और उल्लास उसके विरह को और अधिक तीव्र कर देता है। दूसरों का मिलन और प्रकृति का सौंदर्य उसकी पीड़ा को बढ़ा देता है, इसी कारण वसंत ऋतु में उसकी दशा और अधिक करुण हो जाती है।
—


No Comments