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12 cbse/hindi/Antra/ Chapter-7/bharat -ram ka prem/tulasi /questin-answer/ भरत-राम का प्रेम, तुलसीदास के पद

January 15, 2026
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भरत-राम का प्रेम – प्रश्न- उत्तर

प्रश्न 1.

‘हारेंहु  खेल जितावहिं मोही’ भरत के इस कथन का क्या आशय है?

उत्तर :

इस कथन के माध्यम से भरत यह व्यक्त करते हैं कि श्रीराम का उनके प्रति बचपन से ही अत्यंत स्नेह रहा है। खेलते समय जब भी वे हारने लगते थे, राम स्वयं जान-बूझकर हार स्वीकार कर उन्हें विजयी बना देते थे। राम का स्वभाव ऐसा था कि वे अपने बड़प्पन का कभी प्रदर्शन नहीं करते थे, बल्कि अपने छोटे भाइयों का उत्साह बढ़ाने के लिए स्वयं को पीछे रखते थे। भाइयों की प्रसन्नता उनके लिए अपनी विजय से अधिक महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए वे हँसते-हँसते स्वयं हार जाते थे और उन्हें जीत का आनंद देते थे। 

प्रश्न 2.

‘मैं जानउँ निज नाथ सुभाउ’ में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर :

इस कथन में श्रीराम के करुणामय और उदार स्वभाव का सजीव चित्रण हुआ है। उनके हृदय में सभी के प्रति प्रेम, दया, ममता और करुणा का भाव भरा हुआ है। वे अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते और किसी को दुख पहुँचाना तो उनके स्वभाव के सर्वथा विपरीत है। छोटे भाइयों के प्रति उनका विशेष स्नेह था—वे स्वयं हारकर उन्हें जीत का सुख देते थे। राम कभी किसी के मन को ठेस नहीं पहुँचाते और न ही ऐसा कोई कार्य करते हैं जिससे किसी को पीड़ा हो। खेल में भी वे सदैव सहज, प्रसन्न और सौम्य रहते थे। 

प्रश्न 3.

राम के प्रति अपने श्रद्धा भाव अथवा प्रेम को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

भरत श्रीराम को अपना स्वामी और आराध्य मानते हैं। बचपन से ही राम की विशेष कृपा उन पर रही है। उनके मन में श्रीराम के प्रति इतना आदर और प्रेम है कि वे उनके सम्मुख कभी मुख खोलने का साहस नहीं कर पाते। भरत के इस अनन्य प्रेम को अंतर्यामी श्रीराम ही भली-भाँति जानते हैं। वे अपने हृदय में श्रीराम की कृपा को गहराई से अनुभव करते हैं। भरत की इच्छा है कि वे निरंतर श्रीराम के दर्शन करते रहें, क्योंकि उनके दर्शन से उनके नेत्र कभी तृप्त नहीं होते। वे सदा श्रीराम के चरणों की सेवा में ही अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं। 

प्रश्न 4.

‘महीं सकल अनरथ कर मूला’ पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।

इस पंक्ति से भरत के हृदय में उठने वाली गहन पीड़ा और आत्मग्लानि का बोध होता है। वे श्रीराम से अनन्य प्रेम करते हैं, इसलिए उन्हें उनका वनवास जाना असहनीय लगता है। राम के वनवास का कारण वे अपनी माता के अंधे प्रेम को मानते हैं और आवेश में आकर उन्हें कटु वचन भी कह देते हैं। किंतु शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव होता है कि इस घटना में माता का भी कोई दोष नहीं है। वे इसे अपना ही दुर्भाग्य मानते हैं कि उनके कारण श्रीराम को वनवास भोगना पड़ा। यह सब उन्हें अपने ही पापों का परिणाम प्रतीत होता है। अपनी इस भूल का कोई प्रायश्चित उन्हें दिखाई नहीं देता। अंततः उन्हें केवल अपने स्वामी श्रीराम पर ही पूर्ण विश्वास रह जाता है कि वही उनका उद्धार करेंगे। 

प्रश्न 5.

‘फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।’ पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह भाव स्पष्ट करता है कि जैसे कोदों से धान की उत्तम फसल की आशा नहीं की जा सकती और काली घोंघी से मोती उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार कुविचारी स्त्री की संतान भी श्रेष्ठ नहीं हो सकती। भरत इसी भाव से स्वयं को कैकेयी की ‘कुपुत्र’ संतान मानकर गहन आत्म-परिताप करते हैं। यह उनके चरित्र की विनम्रता, आत्मग्लानि और उच्च नैतिक चेतना को प्रकट करता है। भाषा अवधी है और छंद चौपाई है।

पद तुलसी, प्रश्नउत्तर

प्रश्न 1.

राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देख कर माँ कौशल्या कैसा अनुभव करती हैं ? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर :

राम के वनगमन के पश्चात राजा दशरथ का देहावसान हो जाता है। इस दोहरे वियोग से माता कौशल्या अत्यंत व्याकुल और शोकग्रस्त हो उठती हैं। घर के किसी भी कोने में राम के बाल्यकाल से जुड़ी वस्तु दिखते ही उनका हृदय द्रवित हो जाता है। बालक राम के खेलते समय प्रयुक्त धनुष-बाण को देखकर वे उसे उठा लेती हैं और बार-बार राम का स्मरण करते हुए उसे अपने हृदय से लगा लेती हैं। इसी प्रकार नन्हे राम के कोमल पैरों की सुंदर जूतियाँ देखकर भी उनका अंतःकरण उमड़ पड़ता है और वे उन्हें भी अपने हृदय और नेत्रों से लगाकर वात्सल्य में डूब जाती हैं। 

प्रश्न 2.

‘रहि चकि चित्रलिखी सी’ पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

राम के वनगमन से संतप्त माता कौशल्या उनके बचपन की वस्तुओं को देखकर और अधिक विचलित हो जाती हैं। कभी वे राम को जगाने की बात करने लगती हैं, तो कभी उनके पिता और भाइयों के साथ प्रिय भोजन करने का स्मरण करती हैं। तभी सहसा उन्हें ध्यान आता है कि राम तो वन चले गए हैं। यह बोध होते ही वे स्तब्ध रह जाती हैं और यह समझ नहीं पातीं कि वे किससे बातें कर रही थीं। वे चित्र में अंकित आकृति-सी निश्चल हो जाती हैं। राम के यहाँ न होते हुए भी उनसे संवाद करती हुई वे उन्मादिनी-सी प्रतीत होने लगती हैं—यह उनके गहरे मातृ-विरह का सजीव प्रमाण है। 

प्रश्न 3.

गीतावली से संकलित पद ‘राघौ एक बार फिरि आवौ’ में निहित करुणा और संदेश को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

प्रस्तुत पद में कवि ने राम-वियोग से पीड़ित माता कौशल्या की करुण दशा का परोक्ष चित्रण किया है। माता अपने विरह की व्यथा सीधे राम को न सुनाकर एक पथिक के माध्यम से यह संदेश भिजवाती हैं कि उनके द्वारा पाले गए प्रिय घोड़े दिन-प्रतिदिन दुर्बल होते जा रहे हैं। वे राम से आग्रह करती हैं कि एक बार अयोध्या लौटकर अपने घोड़ों को देख जाएँ और फिर चाहें तो लौट जाएँ। इस बहाने यदि राम अयोध्या आ जाएँ, तो माता कौशल्या को भी अपने प्रिय पुत्र के दर्शन हो सकेंगे—यही उनके मन की मूक कामना है। 

प्रश्न 4.

(क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण छाँटिए।

(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है ? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

(क) उपमा अलंकार –

(i) कबहूँ समुझि वन-गमन राम को चकि चित्रलिखी-सी।

(ii) तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी-सी।

(ख) ‘तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे, मनहु कमन हिम-मारे’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है, क्योंकि यहाँ घोड़ों के दुर्बल होने में कमल पर पाला गिरने की संभावना की गई है।

प्रश्न 5.

पठित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था।

उत्तर :

तुलसीदास अपने युग में अवधी और ब्रजभाषा के प्रख्यात विद्वान थे तथा उन्हें संस्कृत का भी गहन ज्ञान था। इसी कारण उनकी भाषा सदैव उनके भावों का सहज अनुसरण करती है। पाठ्यक्रम में निर्धारित दोनों पदों में कवि का भाषा पर पूर्ण अधिकार स्पष्ट दिखाई देता है। पुत्र-वियोग में संतप्त माता जब बाल्यकाल की वस्तुओं को देखती हैं, तो उनकी वात्सल्य-धारा स्वतः प्रवाहित होने लगती है। यदि कवि ‘धनुहियाँ’ के स्थान पर ‘धनुष’ जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द का प्रयोग करते, तो वह भावात्मक चमत्कार उत्पन्न न हो पाता जो यहाँ साकार हुआ है।

इसी प्रकार राम के वनगमन का स्मरण आते ही माता कौशल्या की मानसिक अवस्था को कवि ने जिस विलक्षण शब्द-चित्र में बाँधा है—‘कबहूँ समुझि वन-गमन राम को, रहि चकि चित्रलिखी-सी’—वह अत्यंत अनूठा और प्रभावशाली है। इससे स्पष्ट होता है कि तुलसीदास भाषा के स्वामी थे और भावों के अनुरूप शब्द-चयन करने में अद्वितीय निपुणता रखते थे।इस प्रकार स्पष्ट है कि तुलसीदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। वे अपनी भावनाओं के अनुरूप शब्द-चयन करने में निपुण थे।

भाग – “स” : परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

 प्रश्न 1.

‘भरत–राम का प्रेम’ प्रसंग के आधार पर भरत की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

जब श्रीराम को वनवास प्राप्त हुआ, उस समय भरत अपने ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने पर उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उनकी माता कैकेयी के वरदान के कारण ही राम को वन जाना पड़ा और उन्हें राज्य सौंपा जा रहा है। यह सुनकर भरत का हृदय गहन शोक, आत्मग्लानि और पश्चात्ताप से भर उठता है। वे स्वयं को इस अनर्थ का कारण मानते हुए अत्यंत दुःखी हो जाते हैं।

भरत स्वयं को निरपराध होते हुए भी राम के वनवास का दोषी मानते हैं और अपनी माता के कृत्य की कठोर निंदा करते हैं। उन्हें प्रतीत होता है कि उनके और राम के निष्कलंक प्रेम को विधाता भी सहन नहीं कर सका और उसी ने माता के माध्यम से यह भेद उत्पन्न कर दिया। भरत अपने को अत्यंत अभागा, पापों का पुंज और दीन-हीन मानकर स्वयं को कोसते हैं। उनकी यह मनोदशा उनके निष्कपट प्रेम, विनम्रता और त्यागशील स्वभाव को प्रकट करती है।

 प्रश्न 2.

‘गीतावली’ के पदों में अभिव्यक्त माता कौशल्या की भावनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर :

‘गीतावली’ के पदों में माता कौशल्या की करुण और हृदयविदारक मनःस्थिति का मार्मिक चित्रण हुआ है। राम के वन-गमन और उसके पश्चात पति दशरथ की मृत्यु से वे अत्यंत व्यथित हो गई हैं। पुत्र-वियोग ने उन्हें उन्मादिनी-सी अवस्था में पहुँचा दिया है।

राम के बाल्यकाल से जुड़ी वस्तुओं को देखकर उनका हृदय भावनाओं से उमड़ पड़ता है। वे उन्हें नेत्रों से लगाती हैं और ऐसा अनुभव करती हैं मानो राम उनके समक्ष ही उपस्थित हों। कभी वे उन्हें जगाने जाती हैं, तो कभी पिता और भाइयों के साथ भोजन करने के लिए पुकारती हैं। किंतु जैसे ही उन्हें स्मरण आता है कि राम तो वन में हैं, वे स्तब्ध और निःशब्द हो जाती हैं।

राम को स्वयं बुला न सकने की विवशता में वे पथिकों से विनती करती हैं कि राम से कहें—उनके वियोग में पाले हुए अश्व दुर्बल हो गए हैं, वे एक बार आकर उन्हें देख जाएँ। इस प्रकार कौशल्या की भावनाएँ वात्सल्य, करुणा और गहन विरह से परिपूर्ण हैं।

 प्रश्न 3.

“भरत राम के प्रति अत्यधिक श्रद्धावान हैं”—इस कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तर :

भरत श्रीराम के प्रति अत्यंत श्रद्धा और भक्ति-भाव से परिपूर्ण हैं। वे राम के समक्ष कभी भी मुखर होकर नहीं बोलते और विनम्र भाव से उनका सान्निध्य ग्रहण करते हैं। राम को देखकर वे कभी तृप्त नहीं होते और निरंतर उनके दर्शन करते रहने की कामना करते हैं।

भरत का विश्वास है कि जिन प्राणियों को राम ने पाला-पोसा है अथवा जो राम के प्रिय हैं, वे राम से वियोग सहन नहीं कर सकते। यदि राम उनसे दूर चले जाएँ, तो उनका जीवन ही व्यर्थ हो जाएगा। भरत के अनुसार जिन्हें राम भुला देते हैं, वे जीवित रह ही नहीं सकते। यह सब उनके हृदय में बसे राम के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम का प्रमाण है।

 प्रश्न 4.

भरत स्वयं को अभागा क्यों मानते हैं?

उत्तर :

भरत स्वयं को अभागा इसलिए मानते हैं क्योंकि वे राम के वनवास के लिए अपने ही पापों को उत्तरदायी समझते हैं। क्रोध और पीड़ा की अवस्था में उन्होंने अपनी माता कैकेयी को कटु और व्यंग्यात्मक वचन कहे थे। बाद में उन्हें यह बोध होता है कि ऐसा करके उन्होंने व्यर्थ ही अपनी माता के हृदय को दुःख पहुँचाया।

भरत को यह प्रतीत होता है कि राम का वनवास उनकी माता के कारण नहीं, बल्कि उनके स्वयं के पूर्वजन्म के पापों का फल है। इसी आत्मग्लानि और पश्चात्ताप के कारण वे अपने को अत्यंत अभागा मानते हैं।

 प्रश्न 5.

राम, लक्ष्मण और सीता से शत्रुता रखने वाले के विषय में भरत का क्या मत है?

उत्तर :

भरत का दृढ़ मत है कि जो कोई भी—चाहे वह उसकी अपनी माता ही क्यों न हो—राम, लक्ष्मण और सीता से शत्रुता रखेगा, उसे विधाता असहनीय दुःख प्रदान करेगा। ऐसे व्यक्ति का जीवन कष्टों और संताप से भर जाएगा।

भरत के अनुसार श्रीराम से वैर रखने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। राम के प्रति शत्रुता करना स्वयं दुःख को आमंत्रित करना है। यह कथन भरत की राम-भक्ति, धार्मिक आस्था और नैतिक दृष्टि को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।

 प्रश्न 6.

सभा में भरत का शरीर रोमांचित क्यों हो उठा?

उत्तर :

चित्रकूट में आयोजित सभा के दौरान जब श्रीराम ने भरत के त्याग, निष्ठा और निष्कपट प्रेम की मुक्त कंठ से प्रशंसा की, तब भरत का हृदय भावनाओं से भर उठा। इसके पश्चात मुनि वशिष्ठ ने भी भरत से अपने मनोभाव स्पष्ट रूप से व्यक्त करने का अनुरोध किया। गुरु और भ्राता—दोनों के स्नेहपूर्ण वचनों को सुनकर भरत अत्यंत अभिभूत हो गए। इसी भावावेग और आत्मिक स्पर्श के कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा।

 प्रश्न 7.

राम और भरत के बीच अनूठी अनन्यता कैसे विद्यमान थी?

उत्तर :

राम और भरत केवल सगे भाई ही नहीं थे, बल्कि हृदय से भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। भरत श्रीराम के प्रति अपार श्रद्धा और आदर भाव रखते थे, वहीं राम भरत पर विशेष स्नेह और कृपा रखते थे। दोनों का पालन-पोषण साथ हुआ था और बचपन से ही उनके बीच आत्मीय संबंध विकसित हो गया था।

राम कभी भी भरत की इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करते थे। खेल-कूद में भी वे भरत को कभी पराजित अनुभव नहीं होने देते थे और उनका मन सदा प्रसन्न रखते थे। राम ने कभी भी भरत के भावों को ठेस नहीं पहुँचाई। इसी आपसी प्रेम, विश्वास और आत्मीयता के कारण दोनों के बीच एक अनूठी अनन्यता विद्यमान थी।

 प्रश्न 8.

राम और भरत का अटूट स्नेह किसने और कैसे तोड़ा?

उत्तर :

राम और भरत के अटूट स्नेह को भरत की माता कैकेयी ने अपने वरदानों की पूर्ति के माध्यम से तोड़ दिया। कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदानों के बदले श्रीराम को चौदह वर्षों के लिए वनवास और भरत के लिए अयोध्या का राज्य माँग लिया। इसी निर्णय के परिणामस्वरूप राम को वन जाना पड़ा और भरत को अनिच्छा से राज्य से जोड़ा गया, जिससे दोनों भाइयों का साथ भौतिक रूप से टूट गया।

 प्रश्न 9.

भरत को किस प्रकार के भाव हृदय में लाना करोड़ों दुराचार के समान प्रतीत होता है?

उत्तर :

भरत का मानना है कि राम और उनके बीच उत्पन्न दूरी के लिए उनकी माता कैकेयी ही कारण बनीं। किंतु वे यह भी स्वीकार करते हैं कि स्वयं को पूर्णतः सदाचारी और अपनी माता को दुराचारी या नीच समझना अत्यंत पापपूर्ण भावना है।

भरत के अनुसार, इस प्रकार के विचार—जहाँ पुत्र अपनी माता की निंदा करे और स्वयं को श्रेष्ठ माने—हृदय में धारण करना करोड़ों दुराचारों के समान है। इसलिए वे ऐसे भावों को अपने मन में स्थान देना भी अनुचित और अधार्मिक मानते हैं। यह भरत की उच्च नैतिकता और संवेदनशीलता को दर्शाता है।

 प्रश्न 10.

भरत को अपनी भलाई का एकमात्र मार्ग कहाँ दिखाई देता है?

उत्तर :

भरत को अपनी भलाई और मुक्ति का एकमात्र मार्ग श्रीराम के चरणों में ही दिखाई देता है। वे मानते हैं कि प्रभु राम ही उनके स्वामी हैं और गुरु मुनि वशिष्ठ सर्वसमर्थ तथा सर्वज्ञ हैं। भरत को पूर्ण विश्वास है कि श्रीराम और मुनि वशिष्ठ भली-भाँति जानते हैं कि उनके हृदय का प्रेम निष्कपट है या छल-कपट से युक्त।

इसी विश्वास के आधार पर भरत अपने जीवन का संपूर्ण भार प्रभु राम के चरणों में समर्पित कर देते हैं और वहीं से अपने कल्याण का पथ प्रशस्त होता हुआ देखते हैं।

 प्रश्न 11.

राम के वियोग में अयोध्या तथा वहाँ के लोगों की विरह-व्यथा का चित्रण कीजिए।

उत्तर :

श्रीराम के वन-गमन के पश्चात संपूर्ण अयोध्या शोक और विरह में डूब गई। ऐसा प्रतीत होता है मानो नगर का समस्त उल्लास लुप्त हो गया हो। राम-वियोग की पीड़ा सहन न कर पाने के कारण महाराज दशरथ प्राण त्यागकर स्वर्ग सिधार गए। माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—तीनों ही गहन शोक में डूबी हुई हैं। उनका दुःख असहनीय हो गया है और वे करुण अवस्था में जीवन व्यतीत कर रही हैं।

केवल राजपरिवार ही नहीं, अपितु अयोध्या की संपूर्ण प्रजा श्रीराम के वियोग में व्यथित है। नर-नारी, वृद्ध-बाल सभी राम के बिना सूनेपन का अनुभव कर रहे हैं। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी मानो इस विरह-ताप से प्रभावित दिखाई देते हैं। इस प्रकार राम के वियोग ने अयोध्या को शोक-नगरी में परिवर्तित कर दिया है।

 प्रश्न 12.

राम के वन-गमन के पश्चात माता कौशल्या की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

राम के वन-गमन के पश्चात माता कौशल्या की दशा अत्यंत करुण और हृदयविदारक हो गई। पुत्र-वियोग में वे निरंतर तड़पती रहती हैं। कभी वे श्रीराम के धनुष को निहारती हैं, तो कभी उनकी नन्हीं और सुंदर जूतियों को देखकर भावविह्वल हो उठती हैं और उन्हें हृदय से लगा लेती हैं।

अनेक बार वे पूर्ववत सवेरे राम के शयन-कक्ष में जाकर उन्हें स्नेहपूर्वक जगाने का प्रयास करती हैं। कभी वे स्तब्ध होकर चित्रलिखित-सी बन जाती हैं और कभी राम द्वारा पाले गए घोड़ों को देखकर उन्हें पुकारने लगती हैं। इस प्रकार कौशल्या की मनोदशा पुत्र-वियोग की तीव्रता और मातृ-स्नेह की गहराई को मार्मिक रूप में प्रकट करती है।

 प्रश्न 13.

राम का संक्षिप्त चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर :

श्रीराम आदर्श पुरुष और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे उदार, दयालु, सत्यनिष्ठ और उच्च आदर्शों का पालन करने वाले हैं। उनका स्वभाव विनम्र, सहृदय और परोपकारी है। वे छोटों के प्रति स्नेह और बड़ों के प्रति सम्मान रखते हैं।

राम आज्ञाकारी, साहसी और बलशाली होने के साथ-साथ विनोदप्रिय भी हैं। वे अपने आचरण से आदर्श स्थापित करते हैं और प्रत्येक परिस्थिति में धर्म एवं सत्य का पालन करते हैं। उनका चरित्र मानव-मूल्यों का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है।

 प्रश्न 14.

वियोगावस्था में सुखद वस्तुएँ भी दुःखद क्यों प्रतीत होने लगती हैं?

‘गीतावली’ के पदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

सुखकाल में जो वस्तुएँ आनंद प्रदान करती हैं, वही वियोगावस्था में दुःख का कारण बन जाती हैं। इसका कारण यह है कि उन वस्तुओं को देखकर उनसे जुड़ी प्रिय स्मृतियाँ जागृत हो जाती हैं, जो विरह की पीड़ा को और तीव्र कर देती हैं।

‘गीतावली’ के पदों में माता कौशल्या का यही भाव प्रकट होता है। वे राम से संबंधित वस्तुओं—जैसे धनुष, जूते और अन्य स्मृतिचिह्नों—को देखकर भावविह्वल हो जाती हैं। इन वस्तुओं से उन्हें राम की स्मृति सताने लगती है और उनका दुःख और बढ़ जाता है। इस प्रकार वियोग में सुखद वस्तुएँ भी पीड़ा का कारण बन जाती हैं।

 प्रश्न 15.

भरत की मनोदशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर :

इस प्रसंग में तुलसीदास ने भरत की मनोदशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। जब मुनि वशिष्ठ के आग्रह पर भरत सभा में श्रीराम के समक्ष अपने मन की बात कहने के लिए खड़े होते हैं, तो भावावेग के कारण उनका शरीर पुलकित हो उठता है। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है और कंठ अवरुद्ध हो जाता है।

वे कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, किंतु भावों की अधिकता के कारण उनके लिए बोलना कठिन हो जाता है। अंततः वे इतना ही कह पाते हैं कि वे इससे अधिक कुछ कहने में समर्थ नहीं हैं। यह दृश्य भरत की गहन भावुकता, निष्कपट प्रेम और आत्मसमर्पण को प्रकट करता है।

 प्रश्न 16.

भरत का आत्म-परिताप उनके चरित्र के किस उज्ज्वल पक्ष की ओर संकेत करता है?

उत्तर :

भरत का आत्म-परिताप उनके चरित्र के अत्यंत उज्ज्वल और महान पक्ष को उजागर करता है। वे पूर्णतः निष्कलंक और सत्यनिष्ठ हैं। श्रीराम को वनवास दिलाने में उनका कोई भी हाथ नहीं था; उस समय वे अपने ननिहाल में थे और उन्हें इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी।

अयोध्या लौटते ही जब उन्हें राम के वनवास का पता चलता है, तो वे उन्हें वापस लाने के लिए तुरंत चित्रकूट जाते हैं। वे स्वयं को अभागा मानते हैं और इस दुःख का कारण अपने पापों को समझते हैं। भरत राम को अपना स्वामी और स्वयं को उनका सेवक मानते हैं। उनका यह आत्म-परिताप उनके सत्य, त्याग, भ्रातृ-प्रेम और आदर्श चरित्र का श्रेष्ठ प्रमाण है।

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