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Todo Kavita Class 12 Question Answer | Raghuveer Sahay | CBSE Hindi Antra Chapter 5

January 15, 2026
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12 cbse board परीक्षा में hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board  द्वारा निर्धारित hindi book  (antara) का अध्ययन करनेवाले शिक्षार्थियों !

12 cbse/hindi/antara/ Chapter 5– Chapter 5- todo-raghuveer sahaay ( तोड़ो कविता रघुवीर सहाय ) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .

इस भाग में 12 cbse/hindi/antara/ Chapter 5- todo-raghuveer sahaay ( तोड़ो कविता रघुवीर सहाय ) के अंतर्गत कविता से परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए है .

रघुवीर सहाय रचित कविता -तोड़ो से परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों  को दो  भागों में बांटा गया है –(अ) (ब)

अ -भाग में रघुवीर सहाय रचित कविता -तोड़ो कविता के अंतर्गत पाठ्यपुस्तक antara में कविता के अंत में अभ्यास हेतु दिए गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए है .

ब -भाग में रघुवीर सहाय रचित कविता -तोड़ो कविता के अंतर्गत पाठ्यपुस्तक antara में कविता के अंत में अभ्यास हेतु दिए गए प्रश्नों के अतिरिक्त रघुवीर सहाय रचित कविता -तोड़ो कविता के अन्य परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए है .

यहाँ पर काव्य खंड के  12 cbse/hindi/antara/ Chapter 5- todo-raghuveer sahaay ( तोड़ो कविता रघुवीर सहाय ) के  Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) इस प्रकार से तैयार किये गए है जो परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं , दोनों  भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.

रघुवीर सहाय रचित कविता -तोड़ो का काव्य सारांश –

……………………

रघुवीर सहाय की कविता ‘तोड़ो’ हमें नई शुरुआत और सृजन की ताकतवर प्रेरणा देती है।तोड़ो कविता के  कवि रघुवीर सहाय का सीधा संदेश यही है कि जिंदगी के रास्ते में जो भी दीवारें खड़ी हों—चाहे कठोर पत्थर हों, भारी चट्टानें हों या दिमागी जकड़नें—उन सबको हिम्मत और जज्बे से चूर-चूर कर देना चाहिए। जड़ता, झूठे बंधन और पुरानी सोच ही इंसान की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं।

रघुवीर सहाय की कविता ‘तोड़ो’ हमें ये भी सिखाती है कि बेकार और सुस्त चीजों को छोड़कर अच्छे, काम आने वाले और सृजनशील मूल्यों को अपनाना चाहिए। नई चीजें गढ़ने के लिए जद्दोजहद, हौसला और मेहनत जरूरी है। रुकावटों से डरने की बजाय उनका डटकर मुकाबला कर आगे बढ़ना ही रघुवीर सहाय की कविता तोड़ो  का पैगाम है।

रघुवीर सहाय की कविता ‘तोड़ो’ नई शुरुआत और सृजन की जबरदस्त प्रेरणा जगाती है। है।तोड़ो कविता के  कवि रघुवीर सहाय का स्पष्ट संदेश है कि जीवन-पथ पर आने वाली हर बाधा—चाहे वो सख्त पत्थर हों, ऊँची चट्टानें हों या मन की पुरानी रूढ़ियाँ—इन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति से तोड़ फोड़ देना चाहिए। जड़ता, झूठे बंधन और रूढ़िगत सोच ही मानव-प्रगति की सबसे बड़ी रुकावटें हैं।

तोड़ो  कविता हमें प्रेरित करती है कि व्यर्थ, निष्क्रिय और बेकार तत्वों को तिलांजलि देकर श्रेष्ठ, उपयोगी और सृजनात्मक मूल्यों को अपनाएँ। नवनिर्माण के लिए संघर्ष, साहस और कठोर परिश्रम अनिवार्य हैं। बाधाओं से भयभीत होने के बजाय उनका साहसपूर्वक सामना कर आगे बढ़ना ही ‘तोड़ो’ का मूल भाव है।

प्रश्न 1.

वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली ?

उत्तर :

वसंत के आगमन की सूचना कवि को प्रकृति से नहीं, बल्कि कैलेंडर से प्राप्त होती है। कैलेंडर में यह अंकित था कि किस महीने के किस दिन वसंत-पंचमी पड़ेगी। उसी दिन उसके कार्यालय में अवकाश भी था। अवकाश और तिथि की इस औपचारिक जानकारी से ही कवि को यह ज्ञात होता है कि वसंत ऋतु आ चुकी है। इससे स्पष्ट होता है कि कवि का वसंत-बोध प्राकृतिक अनुभव के स्थान पर काग़ज़ी सूचना पर आधारित है। 

प्रश्न 2.

‘कोई छह बजे सुबह …….. फिरकी सी आई, चली गई’ पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि यह संकेत देता है कि वसंत ऋतु के आगमन पर प्रातःकालीन वायु अत्यंत स्वच्छ, शीतल और सुगंध से भरी होती है। उसके हल्के-हल्के झोंके मन को सुख और ताजगी से भर देते हैं। किंतु यह आनंददायक अनुभूति अधिक देर तक टिकती नहीं है। जैसे-जैसे सूर्य का तेज़ बढ़ता है, वैसे-वैसे हवा की शीतलता भी कम हो जाती है। इसी क्षणिक उपस्थिति के कारण कवि ने वसंत की इस प्रातःकालीन वायु की तुलना फिरकी से की है, जो घूमकर क्षणभर में चली जाती है।

 प्रश्न 3.

अलंकार बताइए –

(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते

उत्तर : पुनरुक्तिप्रकाश और अनुप्रास अलंकार।

(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो

 उत्तर : उत्प्रेक्षा और मानवीकरण अलंकार।

(ग ) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई

उत्तर : मानवीकरण और उपमा अलंकार।

(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

उत्तर : पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार।

 प्रश्न 4.

किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक साँदर्य की अनुभूति से वंचित है ?

उत्तर :

‘और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था

कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

आम और आवेंगे।’

 प्रश्न 5.

‘प्रकृति मनुष्य की सहचरी है’ इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :

आदिकाल से ही मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरा और आत्मीय संबंध रहा है। मनुष्य ने प्रकृति की गोद में जन्म लिया और उसी से अपने जीवन-निर्वाह की सामग्री प्राप्त की। प्रकृति ने उसे संरक्षण प्रदान किया—हिंसक पशुओं से बचने के लिए ऊँचे वृक्षों का सहारा दिया, भूख मिटाने के लिए मीठे और रसीले फल दिए तथा सूर्य की तीव्र तपन से बचाने के लिए शीतल छाया प्रदान की। आज भी वर्षा समस्त प्राणी-जगत में नवजीवन का संचार करती है और वसंत की मादकता जीवन को उल्लास से भर देती है। इस प्रकार प्रकृति सदा मनुष्य की सहचरी बनी रही है।

किन्तु आधुनिक भौतिकतावादी युग में मनुष्य ने औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ अपना संतुलन और सामंजस्य तोड़ दिया है। वनों की अंधाधुंध कटाई से ऋतु-चक्र में गंभीर परिवर्तन आ गया है। पेट्रोलियम पदार्थों के अत्यधिक उपयोग ने वातावरण को इतना प्रदूषित कर दिया है कि शुद्ध वायु में साँस लेना भी कठिन हो गया है। परिणामस्वरूप बाढ़, भूकंप, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ती जा रही हैं।

 प्रश्न 6.                                                            

‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता क्या है ?

उत्तर :

‘वसंत आया’ कविता में कवि की प्रमुख चिंता यह है कि आधुनिक मनुष्य का प्रकृति से जीवंत संबंध धीरे-धीरे टूटता जा रहा है। अब उसे ऋतु-परिवर्तन का ज्ञान प्रकृति के संकेतों से नहीं, बल्कि कैलेंडर देखकर होता है—कि किस तिथि और माह में कौन-सी ऋतु चल रही है। जबकि प्रकृति में आज भी परिवर्तन निरंतर घटित हो रहे हैं—वसंत के आगमन पर पत्तों का झड़ना, नई कोंपलों का फूटना, सुगंधित मंद समीर का बहना, ढाक के वनों का दहक उठना, कोयल की मधुर कूक और भँवरों की गुंजार। किंतु आधुनिक मनुष्य की दृष्टि इन प्राकृतिक संकेतों को पहचानने में असमर्थ हो गई है। वह कैलेंडर देखकर ही जान पाता है कि आज वसंत-पंचमी है। यही प्रकृति से बढ़ती दूरी कवि की गहरी पीड़ा और चिंता का मूल कारण है।

(ख) तोड़ो

प्रश्न 1.

‘पत्थर’ और ‘ चट्टान’ शब्द किसके प्रतीक हैं ?

उत्तर :

कवि ने ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्दों का प्रयोग उन अवरोधों और जड़ रूढ़ियों के प्रतीक के रूप में किया है, जो सुजन और नव-निर्माण के मार्ग में बाधा बन जाती हैं। जब तक इन कठोर तत्वों को तोड़ा और हटाया नहीं जाता, तब तक सृजन संभव नहीं हो सकता। जैसे खेत से पत्थर और कंकड़ निकाल देने पर ही वह उपजाऊ बनता है, वैसे ही साहित्यकार भी परंपरागत जड़ताओं और रूढ़ बंधनों से मुक्त होकर ही श्रेष्ठ और सार्थक साहित्य की रचना कर सकता है।

 प्रश्न 2.

भाव-साँदर्य स्पष्ट कीजिए –

मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को

हम इसको क्या कर डलें इस अपने मन की खीज को ?

गोड़ा गोड़ो गोड़े।

उत्तर :

कवि यह स्पष्ट करता है कि जिस प्रकार भूमि को अच्छी तरह जोतने से उसमें रसीलापन आ जाता है और वह बीज के अंकुरण के योग्य बनती है, उसी प्रकार मन को भी खीज, ऊब और नकारात्मक भावों से मुक्त करना आवश्यक है। जब मन की यह व्यर्थ ग्रंथियाँ नष्ट हो जाती हैं, तभी निर्मल और उर्वर मन में श्रेष्ठ सृजन संभव हो पाता है। अनावश्यक और बाधक तत्वों की काट-छाँट के बिना नव-निर्माण की प्रक्रिया आरंभ ही नहीं हो सकती।  

प्रश्न 3.

कविता का आरंभ ‘ तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ से हुआ है और अंत ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया।

उत्तर :

कवि ने कविता के आरंभ में ‘तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो’ शब्दों का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि उसका विश्वास है कि किसी भी नव-निर्माण से पहले पुराने, निरर्थक और बाधक तत्वों का विनाश आवश्यक होता है। हर सृजन के पूर्व विध्वंस अनिवार्य है। जब यह तोड़ने की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है, तब नव-निर्माण का कार्य आरंभ होता है। इसी सृजन को सशक्त और सार्थक बनाने के लिए कवि आगे ‘गोड़ो, गोड़ो, गोड़ो’ शब्दों का प्रयोग करता है, जो निर्माण की सकारात्मक प्रक्रिया का संकेत है।

 प्रश्न 4.

ये झूठे बंधन टूटें

तो धरती को हम जानें

यहाँ पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर :

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि यह भाव व्यक्त करता है कि जब तक धरती कंकड़, पत्थर और चट्टानों से आच्छादित रहती है, तब तक उसकी वास्तविक उर्वर शक्ति प्रकट नहीं हो पाती। इन कठोर आवरणों के टूटने और हटने पर ही परती भूमि उपजाऊ खेत में परिवर्तित होती है। तब उसकी मिट्टी का रसीलापन बीज को पोषण देकर अंकुरण में सहायता करता है। इसलिए धरती की आंतरिक शक्ति को पहचानने के लिए उसका बाहरी कठोर आवरण हटना आवश्यक है।

 प्रश्न 5.

‘आधे-आधे गाने’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है ?

उत्तर :

इस कथन के माध्यम से कवि यह संकेत करता है कि जब कवि का मन ऊब, खीज और निराशा से घिरा रहता है, तब वह सार्थक और सजीव साहित्य की रचना नहीं कर सकता। ऐसे समय उसके गीत अधूरे, निर्जीव और प्रभावहीन प्रतीत होते हैं। मन की ऊब और खीज को समाप्त कर, उसे निर्मल और उत्साहपूर्ण बनाकर ही कवि सशक्त, जीवन्त और अर्थपूर्ण रचनाओं का सृजन कर सकता है।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण  प्रश्न –

### **प्रश्न 1.**

‘और कविताएँ पढ़ते रहने से ……… आम बौर आ जाएँगे’—पंक्ति में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।

**उत्तर :**

इस पंक्ति के माध्यम से कवि आधुनिक जीवन-शैली पर तीखा व्यंग्य करता है। आज का मनुष्य इतना व्यस्त और कृत्रिम जीवन जीने लगा है कि उसे प्रकृति में होने वाले ऋतु-परिवर्तन और प्राकृतिक सौंदर्य को प्रत्यक्ष देखने का अवसर ही नहीं मिलता। उसे यह भी कविताएँ पढ़कर ही जानना पड़ता है कि वसंत ऋतु में ढाक के जंगल कैसे दहक उठते हैं और आम के पेड़ों पर बौर कैसे आते हैं।

कवि ऐसे लोगों पर व्यंग्य करता है जो प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध बनाए बिना केवल शब्दों और कल्पनाओं के सहारे उसका गुणगान करते रहते हैं। वे स्वयं प्रकृति के सान्निध्य में जाकर उसके परिवर्तन को महसूस नहीं करते, बल्कि साहित्यिक वर्णनों में ही संतोष कर लेते हैं।

### **प्रश्न 2.**

कवि मन में व्याप्त ऊब और खीझ को तोड़ने की आवश्यकता क्यों अनुभव करता है?

**उत्तर :**

कवि के अनुसार सृजनशीलता के लिए मन का मुक्त, प्रसन्न और एकाग्र होना आवश्यक है। ऊब और खीझ जैसी मानसिक स्थितियाँ रचनात्मकता की सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। इनके कारण मन अशांत रहता है और भावनाएँ एक दिशा में प्रवाहित नहीं हो पातीं।

जब मन ऊब और खीझ से ग्रस्त होता है, तब विचार भटकने लगते हैं और सृजन की क्षमता कुंठित हो जाती है। इसलिए कवि इन नकारात्मक भावनाओं को तोड़कर मन को नवीन ऊर्जा और उत्साह से भरना चाहता है, ताकि सृजन का मार्ग प्रशस्त हो सके।

### **प्रश्न 3.**

वसंत के आगमन से प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं?

**उत्तर :**

वसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति में चहुँ ओर नवजीवन का संचार हो जाता है। अशोक के वृक्षों पर पक्षियाँ मधुर स्वर में कुहुकने लगती हैं। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नवीन कोपलें फूटने लगती हैं। वातावरण की हवा स्वच्छ, शुद्ध और सुगंधित हो जाती है।

ढाक के जंगल लालिमा से दहक उठते हैं और आम के वृक्षों पर बौर आने लगता है। इंद्रलोक के नंदन वन की भाँति पृथ्वी भी रंग-बिरंगे फूलों की गंध और रस से महक उठती है। भँवरे फूलों पर मँडराते हुए गुँजार करने लगते हैं और कोयल मधुर कूक से वातावरण को संगीतमय बना देती है।

### **प्रश्न 4.**

वसंत ऋतु वातावरण को मदमस्त कैसे बना देती है?

**उत्तर :**

वसंत के आगमन से संपूर्ण प्रकृति उल्लास और सौंदर्य से भर जाती है। चारों ओर फूल खिल उठते हैं और आम के वृक्षों पर बौर छा जाता है। मंद-मंद सुगंधित पवन बहने लगती है, जिससे वातावरण में एक मोहक सुगंध फैल जाती है।

भँवरे फूलों का रसपान करते हुए मदमस्त होकर गुँजार करने लगते हैं और कोयल अपनी मधुर कूक से मन को आनंदित कर देती है। इन सभी प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण वसंत ऋतु संपूर्ण वातावरण को आनंद, उल्लास और मादकता से भर देती है।

### **प्रश्न 5.**

कवि के मतानुसार दूब किस कारण उगती है?

**उत्तर :**

कवि के अनुसार मिट्टी में एक विशेष प्रकार का जीवनदायी रस निहित होता है। उसी अंतर्निहित रस और उर्वरता के कारण भूमि में दूब जैसी कोमल और हरित घास उग आती है। यह रस मिट्टी की सृजनात्मक शक्ति और जीवन-प्रदायिनी क्षमता का प्रतीक है।

### **प्रश्न 6.**

‘तोड़ो’ कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?

**उत्तर :**

‘तोड़ो’ कविता हमें नवनिर्माण और सृजन की सशक्त प्रेरणा देती है। कवि का संदेश है कि जीवन और सृजन के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं—चाहे वे पत्थर, चट्टानें हों या मानसिक रूढ़ियाँ—को दृढ़ संकल्प के साथ तोड़ देना चाहिए। जड़ता, झूठे बंधन और परंपरागत सोच मनुष्य की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट होती हैं।

कविता हमें यह भी प्रेरणा देती है कि व्यर्थ, निष्क्रिय और अनुपयोगी तत्वों को त्यागकर श्रेष्ठ, उपयोगी और सृजनात्मक मूल्यों को अपनाया जाए। नवनिर्माण के लिए संघर्ष, साहस और श्रम आवश्यक हैं। बाधाओं से घबराने के बजाय उनका सामना कर आगे बढ़ना ही इस कविता का मूल संदेश है।

### **प्रश्न 7.**

कवि को धरती और मन की भूमि में कौन-कौन सी समानताएँ दिखाई देती हैं?

**उत्तर :**

कवि धरती और मन की भूमि के बीच गहरा साम्य स्थापित करता है। जैसे धरती को उपजाऊ बनाने के लिए उसमें फैली चट्टानों, पत्थरों, ऊसर और बंजर भागों को तोड़कर समतल करना आवश्यक होता है, तभी वह खेती योग्य बन पाती है। इसके बाद ही मिट्टी रस-युक्त होकर बीज के अंकुरण में सहायक सिद्ध होती है।

उसी प्रकार मन भी ऊब, खीज, जड़ता और निराशा से ग्रस्त होने पर सृजन के योग्य नहीं रह जाता। जब तक इन नकारात्मक तत्वों को नष्ट नहीं किया जाता, तब तक मन सृजनशील नहीं बन सकता। इन बाधाओं को हटाने पर ही मन रस-सिक्त होकर रचनात्मक कार्यों में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार धरती और मन—दोनों को उर्वर बनाने के लिए परिश्रम और तोड़-फोड़ आवश्यक है।

### **प्रश्न 8.**

‘तोड़ो’ कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

**उत्तर :**

‘तोड़ो’ कविता का प्रतिपाद्य नवनिर्माण, कर्मशीलता और सृजन की चेतना से जुड़ा हुआ है। कवि आह्वान करता है कि अनुपजाऊ, बंजर, ऊसर और परती पड़ी धरती को खोदकर खेती योग्य बनाया जाए। जब धरती की कठोर परतें टूटेंगी, तब उसकी रस-युक्त मिट्टी बीज को पोषण दे सकेगी और फसलें लहलहा उठेंगी।

इसी प्रकार कवि मानव-मन की ओर संकेत करते हुए कहता है कि मन में व्याप्त ऊब, खीज और जड़ता को तोड़कर उसे सृजनात्मक दिशा में मोड़ा जाए। रूढ़ियों, निष्क्रियता और व्यर्थता को नष्ट किए बिना न तो श्रेष्ठ साहित्य की रचना संभव है और न ही नवनिर्माण। इस प्रकार कविता श्रम, संघर्ष और रचनात्मक परिवर्तन की प्रेरणा देती है।

### **प्रश्न 9.**

वसंत-पंचमी के अमुक दिन होने का प्रमाण कवि ने क्या बताया और क्यों?

*(वसंत कविता के आधार पर उत्तर दीजिए।)*

**उत्तर :**

वसंत-पंचमी के अमुक दिन होने का प्रमाण कवि ने दफ़्तर में उस दिन की छुट्टी को बताया है। दफ़्तर में वसंत-पंचमी के अवसर पर अवकाश घोषित किया गया था, जिससे कवि को यह विश्वास हुआ कि वसंत का आगमन हो चुका है। इसके अतिरिक्त कवि के कैलेंडर में भी उस दिन वसंत-पंचमी अंकित थी।

वास्तव में कवि प्रकृति में आए परिवर्तनों को स्वयं अनुभव करने के बजाय कार्यालयीन अवकाश और कैलेंडर जैसी औपचारिक बातों को ही वसंत के आगमन का प्रमाण मान लेता है। इसके माध्यम से कवि आधुनिक जीवन की उस विडंबना पर व्यंग्य करता है, जहाँ मनुष्य प्रकृति से कटकर केवल तिथियों और काग़ज़ी प्रमाणों पर निर्भर हो गया है।

 

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