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12 cbse/hindi/Antra / Chapter 4 /banaras,disha /answer-question/बनारस, दिशा-केदार नाथ सिंह /प्रश्न-उत्तर

January 15, 2026
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(अ ) बनारस ,प्रश्न -उत्तर

प्रिय शिक्षार्थियों ,

12 cbse board परीक्षा में  hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board  द्वारा निर्धारित hindi book  (antara) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .

प्रश्न -उत्तर को दो भागों में बांटा गया है .पहले भाग में पाठ  के अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए है तथा दूसरे भाग में परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दिए गए है .,यहाँ पर काव्य खंड के Chapter 4 /banaras,disha /answer-question(बनारस, दिशा-केदार नाथ सिंह /प्रश्न-उत्तर) दिए गए . दोनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.

प्रश्न 1.

बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है?

उत्तर :

1.

बनारस में वसंत का आगमन अचानक-सा होता है। सामान्यतः वसंत के आने से उल्लास और प्रसन्नता का वातावरण बनता है, किंतु बनारस में इसका अनुभव कुछ भिन्न रूप में होता है। वसंत के आते ही लहरतारा और मडुवाडीह जैसे इलाकों की ओर से धूलभरी आँधियाँ उठने लगती हैं, जो जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। लोग धूल से परेशान हो उठते हैं और चारों ओर ऐसा दृश्य बन जाता है मानो वसंत नहीं, बल्कि पतझड़ का मौसम छा गया हो। 

प्रश्न 2.

‘खाली कटोरों में वसंत का उतरना’ से क्या आशय है ?

उत्तर :

इस कथन के माध्यम से कवि यह संकेत करता है कि वसंत के आगमन पर जहाँ पूरा बनारस धूलभरी हवाओं की चपेट में आ जाता है, वहीं खाली कटोरे लेकर बैठे भिखारियों के मन में नई आशा जाग उठती है। उन्हें विश्वास होता है कि वसंत के साथ अनेक तीज-त्योहार आएँगे और दान-दक्षिणा के अवसर बढ़ेंगे, जिससे उनके अब तक खाली पड़े कटोरे दाताओं की कृपा से भर जाएँगे। इस प्रकार वसंत उनके लिए उम्मीद और संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है। 

प्रश्न 3.

बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है ?

उत्तर :

बनारस में गंगा-तट पर प्रायः किसी-न-किसी पर्व या धार्मिक अवसर पर भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ स्नान, दान और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं तथा काशी विश्वनाथ के दर्शन करते हैं। इस कारण यह नगर सदैव जन-समूह से भरा हुआ प्रतीत होता है। किंतु कवि ने बनारस की तथाकथित रिक्तता को एक भिन्न दृष्टि से चित्रित किया है—प्रतिदिन गंगा-घाटों की ओर अंतिम संस्कार के लिए ले जाई जाती अर्थियों के माध्यम से। यह दृश्य नगर के जीवन और मृत्यु के निरंतर चक्र को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। 

प्रश्न 4.

बनारस में धीरे-धीर क्या-क्या होता है ?’धीरे-धीर’ से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है?

उत्तर :

बनारस की विशेषता उसकी धीमी और सहज गति में निहित है। यहाँ धूल भी धीरे-धीरे उड़ती है, लोग भी आराम से चलते हैं, मंदिरों के घंटे मंद स्वर में बजते हैं और शाम भी मानो धीरे-धीरे उतरती है। इस नगर में जीवन की गति कहीं भी तेज या हड़बड़ी से भरी हुई नहीं है। लोग हर कार्य सहजता और धैर्य के साथ करते हैं। कवि के अनुसार इसी कारण बनारस को ऐसा नगर कहा जा सकता है, जहाँ जीवन अपनी एक विशिष्ट ‘रौ’ या लय में प्रवाहित होता है। 

प्रश्न 5.

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में क्या-क्या बँधा है?

उत्तर :

कवि के मत में बनारस में सभी क्रियाएँ एक सामूहिक और संतुलित लय में घटित होती हैं, जिससे पूरा नगर एक दृढ़ सूत्र में बँधा हुआ प्रतीत होता है। यहाँ प्रत्येक वस्तु अपने निश्चित स्थान और रूप में स्थिर दिखाई देती है। गंगा अपने निर्धारित पथ पर निरंतर प्रवाहित होती रहती है, घाटों पर नावें अपने स्थान पर बँधी रहती हैं और तुलसीदास की खड़ाऊँ भी वर्षों से उसी स्थान पर पड़ी हुई हैं। इस स्थिरता और निरंतरता में ही बनारस की आत्मा और उसकी विशिष्ट पहचान निहित है।

प्रश्न 6.

‘सई-साँझ’ में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है ?

उत्तर :

संध्या के समय जब बनारस में प्रवेश किया जाता है, तब घाटों पर गंगा जी की आरती का दिव्य दृश्य दिखाई देता है। उस क्षण यह नगर अत्यंत विलक्षण और मोहक प्रतीत होता है। मंदिरों और घाटों पर प्रज्वलित दीपों की पंक्तियों से पूरा शहर प्रकाशमान हो उठता है। गंगा के शांत जल में घाटों और दीपों की परछाइयाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो आधा बनारस जल में समाया हो और आधा जल के बाहर स्थित हो। कहीं पूजा-पाठ और हवन-मंत्रों का गुंजार सुनाई देता है तो कहीं चिताओं से उठता धुआँ जीवन और मृत्यु की सच्चाई का बोध कराता है। इस समय बनारस में श्रद्धा, आस्था, विरक्ति, विश्वास और भक्ति—सभी भाव एक साथ साकार होते हुए दिखाई देते हैं। 

प्रश्न 7.

बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएँ इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

इस कविता में बनारस नगर को मानवीय क्रियाओं के माध्यम से सजीव रूप प्रदान किया गया है—

(i) भिखारियों के कटोरों का निच्चाट खालीपन –

भिखारियों के कटोरे पूरी तरह खाली हैं और वे दान की प्रतीक्षा में मौन भाव से बैठे हैं। यह स्थिति उनकी आशा और प्रतीक्षा की मनःस्थिति को प्रकट करती है।

(ii) धीरे-धीरे चलते हैं लोग –

बनारस के निवासियों का जीवन अत्यंत सहज और शांत गति से चलता है। वे बिना किसी हड़बड़ी के अपने दैनिक कार्यों को स्वाभाविक ढंग से संपन्न करते हैं।

(iii) जो है वह खड़ा है, बिना किसी स्तंभ के –

यह पंक्ति संकेत देती है कि बनारस का जीवन बाहरी सहारों पर नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आस्था जैसे आंतरिक आधारों पर टिका हुआ है।

(iv) आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ –

गंगा आरती के समय जब लोग अपने हाथ उठाते हैं, तो जल में उनकी परछाइयाँ स्तंभ के समान प्रतीत होती हैं। यह दृश्य मानव की आस्था को ही नगर का आधार स्तंभ बना देता है।

प्रश्न 8.

शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –

(क) ‘यह धीरे-धीरे होना ………… समूचे शहर को’

इन पंक्तियों में कवि ने तत्सम, तद्भव तथा देशज शब्दों का संतुलित प्रयोग किया है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार के माध्यम से भावों में दृढ़ता आई है। रचना मुक्त छंद में है। कवि ने बनारस की उस विशिष्ट विशेषता को रेखांकित किया है कि यहाँ जीवन की सभी गतिविधियाँ अत्यंत सहज रूप से और अपनी एक अलग ‘रौ’ या लय में संचालित होती हैं।

(ख) ‘अगर ध्यान से देखो और आधा नहीं है’

इन पंक्तियों में कवि ने गंगा आरती के समय बनारस की अनुपम शोभा का चित्रण करते हुए गंगा-जल में पड़ती छाया को संपूर्ण बनारस का प्रतिबिंब माना है। भाषा सरल, सहज और व्यावहारिक है। रचना मुक्त छंद में है तथा लाक्षणिक अभिव्यक्ति के माध्यम से दृश्य को और अधिक प्रभावशाली बनाया गया है।

(ग) ‘अपनी एक टाँग पर ……….. बेखबर’

कवि बनारस की विशेषताओं का वर्णन करते हुए इसे ऐसा नगर बताता है जो अपनी आस्था, विश्वास, श्रद्धा और भक्ति में पूर्णतः लीन है। यह शहर अपने धार्मिक और आध्यात्मिक संसार में मग्न होकर बाहरी चिंताओं से लगभग निरपेक्ष दिखाई देता है। अनुप्रास अलंकार काव्य-सौंदर्य को बढ़ाता है। भाषा में विदेशी शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। रचना मुक्त छंद में है तथा लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

(ख) दिशा -प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.

बच्चे का उधर-उधर कहना क्या प्रकट करता है ?

उत्तर :

बच्चे का बार-बार “उधर–उधर” कहना इस बात को प्रकट करता है कि उसके लिए हिमालय की दिशा वही है, जिधर उसकी पतंग ऊँची उड़ती चली जा रही है। उसकी बाल-सुलभ कल्पना में पतंग की ऊँचाई ही हिमालय की ऊँचाई बन जाती है। उसे ऐसा लगता है कि जितनी ऊँचाई तक उसकी पतंग पहुँचेगी, उतना ही ऊँचा हिमालय होगा। पतंग उड़ाते समय उसका पूरा ध्यान उसी में डूबा रहता है; उसके लिए उस क्षण पतंग के अतिरिक्त कोई और वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं होती। इसी सरल और निष्कपट भाव से वह सहज रूप में कह देता है कि हिमालय उसी ओर है, जिधर उसकी पतंग उड़ रही है।

 प्रश्न 2.

‘मैं स्वीकार करूँ मैंने पहली बार जाना हिमालय किधर है’- प्रस्तुत पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

2.

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि यह अभिव्यक्त करना चाहता है कि जब बालक पूरे विश्वास और सहजता से यह कहता है कि जिधर उसकी पतंग उड़ रही है, उधर ही हिमालय है, तो कवि उस कथन को सहज भाव से स्वीकार कर लेता है। बालक का बिना किसी झिझक या संकोच के प्रश्न का उत्तर देना कवि को गहराई से प्रभावित करता है। बालक यथार्थ को अपने ही ढंग से देखता है और उसी सरलता के साथ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। उसकी यह निष्कपट दृष्टि और स्वाभाविक अभिव्यक्ति कवि को आकर्षित करती है और उसे यह प्रेरणा देती है कि जीवन को कभी-कभी बाल-सुलभ दृष्टि से भी देखना चाहिए, जहाँ कल्पना, विश्वास और सहजता का विशेष महत्व होता है। 

**भाग – “स” : परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न**

### **प्रश्न 1.**

‘बनारस’ कविता के माध्यम से कवि ने बनारस की किन विशिष्टताओं को उजागर किया है?

**उत्तर :**

‘बनारस’ कविता में कवि केदारनाथ सिंह ने बनारस के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है। बनारस शिव की पावन नगरी है, जहाँ के गंगा-घाट श्रद्धा, आस्था और भक्ति के प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ का जन-जीवन अपनी विशिष्ट मस्ती और धीमी गति में प्रवाहित होता है।

कवि बताता है कि बनारस में वसंत अचानक आता है और धूलभरी आँधियों के साथ पूरे नगर को आंदोलित कर देता है। इस नगर में वर्ष भर कोई-न-कोई उत्सव या पर्व चलता रहता है। लोग गंगा-स्नान, विश्वनाथ मंदिर के दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए दूर-दूर से आते हैं। संध्या के समय होने वाली गंगा-आरती के दौरान दीपमालाओं से सजे घाट अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। गंगा में प्रतिबिंबित होता हुआ आधा बनारस अत्यंत मनोहारी लगता है।

घाटों पर एक ओर पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन होता है, तो दूसरी ओर चिताओं का धुआँ उठता दिखाई देता है। इस प्रकार बनारस जीवन और मृत्यु, भक्ति और विरक्ति, उत्सव और शोक—सबका अद्भुत संगम है।

### **प्रश्न 2.**

‘बनारस’ कविता का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।

**उत्तर :**

‘बनारस’ कविता का मूल भाव बनारस के सांस्कृतिक और दार्शनिक स्वरूप को उजागर करना है। कवि ने इस कविता में आस्था, श्रद्धा, विश्वास, भक्ति, विरक्ति और रहस्यात्मकता का समन्वय प्रस्तुत किया है। बनारस को एक ऐसा नगर बताया गया है जहाँ प्राचीनता और आधुनिकता साथ-साथ चलती हैं।

यह कविता बनारस के आध्यात्मिक वातावरण, उसकी ऐतिहासिक गहराई और जीवन-दर्शन को सामने लाती है। बनारस केवल एक शहर नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के सत्य को समझने का दार्शनिक स्थल है। इस प्रकार कविता बनारस की आत्मा और उसके रहस्यमय सौंदर्य का उद्घाटन करती है।

### **प्रश्न 3.**

बनारस में वसंत का आगमन कैसे और किस दिशा से होता है?

**उत्तर :**

बनारस में वसंत का आगमन अचानक होता है। यह धीरे-धीरे नहीं, बल्कि एक साथ पूरे शहर को अपने प्रभाव में ले लेता है। कवि के अनुसार वसंत लहरतारा अथवा मडुवाडीह की दिशा से आता है और धूलभरी आँधियों के साथ नगर के वातावरण को बदल देता है।

### **प्रश्न 4.**

किस लय ने समूचे बनारस शहर को दृढ़ता से बाँध रखा है?

**उत्तर :**

बनारस शहर की विशेषता उसकी धीमी और संतुलित गति है। यहाँ धूल भी धीरे-धीरे उड़ती है, लोग भी मंथर चाल से चलते हैं और मंदिरों के घंटे भी धीरे-धीरे बजते हैं। यहाँ संध्या का उतरना भी क्रमशः और शांत भाव से होता है। यही ‘धीरे-धीरे’ की सामूहिक लय पूरे शहर को एक सूत्र में बाँधकर रखती है।

### **प्रश्न 5.**

बनारस शहर की बनावट को कवि ने अद्भुत और अनूठा क्यों कहा है?

**उत्तर :**

कवि के अनुसार बनारस शहर की बनावट विलक्षण और अद्वितीय है। यह शहर आधा जल में स्थित प्रतीत होता है, आधा मंत्रों और फूलों में डूबा हुआ है। यह आधा शव-संस्कार की चिताओं में है और आधा गहन निद्रा में। कहीं शंखनाद गूँजता है, तो कहीं मौन छाया रहता है।

पावन गंगा नदी के तट पर बसा यह नगर जीवन और मृत्यु, भौतिकता और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है। इसी कारण बनारस की बनावट सामान्य नगरों से भिन्न और अनोखी प्रतीत होती है।

### **प्रश्न 6.**

बनारस की अनूठी पहचान क्या है? स्पष्ट कीजिए।

**उत्तर :**

बनारस की अनूठी पहचान उसका जीवन और मृत्यु का अद्भुत सहअस्तित्व है। यह नगर पावन गंगा नदी के तट पर बसा है, जहाँ घाटों पर नावें बँधी रहती हैं और मंदिरों में निरंतर दीप प्रज्वलित होते रहते हैं। एक ओर गंगा-तट पर चिताएँ जलती रहती हैं, तो दूसरी ओर हवन, पूजा और आरती से उठता हुआ धुआँ वातावरण को आध्यात्मिक बना देता है।

यहाँ मृत्यु का शोक और जीवन की आस्था साथ-साथ दिखाई देती है। यही द्वंद्वात्मक लेकिन संतुलित स्वरूप बनारस को अन्य नगरों से भिन्न बनाता है और इसकी विशिष्ट पहचान स्थापित करता है।

### **प्रश्न 7.**

बनारस में किन-किन तत्वों का संगम दिखाई देता है?

**उत्तर :**

बनारस अनेक विरोधी प्रतीत होने वाले तत्वों का अद्भुत संगम है। यहाँ आस्था और श्रद्धा के साथ-साथ विरक्ति और आश्चर्य का भी समन्वय दिखाई देता है। यह नगर विश्वास और भक्ति का केंद्र है, जहाँ लोग मोक्ष की कामना से आते हैं।

साथ ही बनारस में प्राचीनता और आधुनिकता का सुंदर मेल है। एक ओर सहस्रों वर्षों की आध्यात्मिक परंपराएँ जीवित हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक जीवन-शैली भी विद्यमान है। इसी प्रकार यहाँ आध्यात्मिकता और भव्यता का भी अनुपम समन्वय देखने को मिलता है।

### **प्रश्न 8.**

‘और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन।’

—इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

**उत्तर :**

इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने बनारस के सामाजिक यथार्थ को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही तीज-त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के कारण मंदिरों और घाटों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

श्रद्धालुओं के आगमन से भिखारियों के मन में दान मिलने की आशा जाग उठती है। इसी आशा के कारण उनके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक आ जाती है। केवल उनके चेहरे ही नहीं, बल्कि लंबे समय से खाली पड़े उनके कटोरे भी मानो उम्मीद की चमक से भर उठते हैं। यह पंक्ति आशा और अभाव के सूक्ष्म भाव को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है।

### **प्रश्न 9.**

‘दिशा’ कविता का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।

**उत्तर :**

‘दिशा’ कविता केदारनाथ सिंह द्वारा रचित एक बाल-मनोविज्ञान पर आधारित कविता है। इसमें कवि ने बच्चों की सहज, कल्पनाशील और स्वतंत्र दृष्टि को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि जब पतंग उड़ाते हुए बच्चे से पूछता है कि हिमालय किस दिशा में है, तो बच्चा बाल-सुलभ सरलता से उत्तर देता है कि हिमालय उसी दिशा में है, जिधर उसकी पतंग उड़ रही है।

इस कविता के माध्यम से कवि यह संकेत देता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना यथार्थ और दृष्टिकोण होता है। जहाँ वयस्क यथार्थ को तर्क और ज्ञान के आधार पर देखते हैं, वहीं बच्चा उसे अपनी कल्पना और भावनाओं के माध्यम से समझता है। यही कविता का मूल भाव है।

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