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12 cbse/hindi/antra/Chapter 2 –  saroj smriti-soorya kant Tripathi nirala/ Question Answer /सरोज स्मृति -सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

January 15, 2026
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12 cbse/hindi/antra/Chapter 2 –  saroj smriti-soorya kant Tripathi nirala/ Question Answer /सरोज स्मृति -सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

प्रिय शिक्षार्थियों ,

12 cbse board परीक्षा में  hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board  द्वारा निर्धारित hindi book  (antara) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .

प्रश्न -उत्तर को दो भागों में बांटा गया है .पहले भाग में पाठ  के अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए है तथा दूसरे भाग में परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दिए गए है .,यहाँ पर काव्य खंड के Chapter 2 –  saroj smriti-soorya kant Tripathi nirala/ Question Answer (सरोज स्मृति -सूर्य कांत त्रिपाठी निराला) दिए गए . दोनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.

सरोज स्मृति -सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

:प्रश्न -उत्तर

प्रश्न 1.सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर :नव-वधू के रूप में सरोज पर सबसे पहले कलश का पवित्र जल छिड़का गया। वह मंद-मंद मुस्कान बिखेरते हुए अपने पिता की ओर निहार रही थी। उसके कोमल और उज्ज्वल मुख पर भावी दांपत्य जीवन की सुखद कल्पनाएँ सजीव हो उठी थीं। वह मानो अभी-अभी खिली हुई कली की भाँति मनोहर और आकर्षक लग रही थी। उसके अंग-प्रत्यंग से उल्लास और प्रसन्नता झलक रही थी। लज्जा से झुके हुए नेत्र और थरथराते अधर उसके अंतर्मन की भावुकता को प्रकट कर रहे थे। समग्र रूप में वह शृंगार की सजीव प्रतिमा प्रतीत हो रही थी। 

प्रश्न 2.कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद क्यों आई ?

उत्तर :

जब कवि ने अपनी पुत्री सरोज को दुल्हन के रूप में सुसज्जित देखा, तो उसके मन में अपने यौवनकाल की स्मृतियाँ उमड़ पड़ीं। उसे उसमें वही शृंगार दिखाई देने लगा, जो कभी उसकी काव्य-रसधारा का मूल स्रोत रहा था। उस क्षण उसे वही मधुर संगीत सुनाई देने लगा, जिसे उसने अपने जीवन के स्वर्णिम दिनों में अपनी स्वर्गीय पत्नी के साथ गाया था। संपूर्ण वातावरण दांपत्य भावनाओं से परिपूर्ण हो उठा और इसी भावात्मक तादात्म्य के कारण कवि का मन अपनी पत्नी की स्मृति से भर आया।

प्रश्न 3.‘आकाश बदलकर बना मही’ में ‘आकाश’ और ‘मही’ किनकी ओर संकेत करते हैं?

उत्तर :

इस पंक्ति में कवि ने ‘आकाश’ को नायक और ‘मही’ को नायिका के रूप में कल्पित किया है। उसे ऐसा अनुभव होता है मानो चारों ओर दांपत्य भाव का विस्तार हो गया हो। इसी भावावेश में आकाश अपने ऊँचे अस्तित्व का भाव त्यागकर धरती रूपी अपनी प्रियतमा से मिलने नीचे उतर आता है और उसके साथ एकात्म हो जाता है। यह दृश्य प्रकृति में व्याप्त प्रेम और सामंजस्य का प्रतीक बन जाता है।

प्रश्न 4.सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था ?

उत्तर :

सरोज का विवाह सामान्य सामाजिक रूढ़ियों से सर्वथा भिन्न था। इस विवाह में उसके पिता ने न तो कोई दान-दहेज दिया और न ही परंपरागत आडंबरों का सहारा लिया। न कोई निकट संबंधी आमंत्रित किया गया और न ही किसी को निमंत्रण-पत्र भेजा गया। विवाह के अवसर पर प्रचलित गीत, रात्रि-जागरण और अन्य औपचारिकताएँ भी नहीं हुईं। इसमें कुछ सामान्य जन और साहित्य-संसार से जुड़े व्यक्तियों की ही उपस्थिति रही। विदाई के समय कन्या को दी जाने वाली जीवनोपयोगी शिक्षा भी कवि ने स्वयं अपनी पुत्री को दी। यह विवाह सादगी, आत्मीयता और वैचारिक गरिमा का उदाहरण बन गया।

प्रश्न 5.‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है ?

उत्तर :

इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह संकेत करता है कि सरोज की माता उसी परिवार से संबंधित थी, जो सरोज का ननिहाल था—वही स्थान जहाँ वह ससुराल में कुछ समय बिताने के बाद गई थी। सरोज उसी लता रूपी माता में कली के रूप में विकसित हुई थी। यहाँ ‘लता’ सरोज की माता का और ‘कली’ स्वयं सरोज का प्रतीक है। दोनों को ही कवि के ससुराल पक्ष से भरपूर स्नेह और अपनापन प्राप्त हुआ। सरोज की माता के लिए वह स्थान मायका था और माता की मृत्यु के बाद सरोज को भी वहीं से वात्सल्य, संरक्षण और संस्कार मिले। उसी परिवेश में उसका पालन-पोषण हुआ, जिसने उसके व्यक्तित्व को संवारा।–

6″मुझ भाग्यहीन की तू संबल ” निराला की यह पंक्ति क्या “बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ “जैसे कार्यक्रम की मांग करती  है ?

उत्तर –

निराला की पंक्ति ‘मुझ भाग्यहीन की तू संबल’ वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है और ‘बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों की अनिवार्यता को रेखांकित करती है। परंपरागत रूप से बेटे को ही बुढ़ापे का सहारा माना जाता रहा है, किंतु आज के समय में बार-बार ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जहाँ बेटे अपने वृद्ध माता-पिता को उपेक्षित कर घर से निकाल देते हैं या वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। ऐसी घटनाएँ इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करती हैं कि बेटा ही बुढ़ापे का एकमात्र संबल है। इसके विपरीत, अनेक प्रसंग ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहाँ बेटियाँ अपने वृद्ध माता-पिता का सहारा बनकर उनकी सेवा और संरक्षण करती हैं। इस दृष्टि से निराला की उक्त पंक्ति केवल व्यक्तिगत भावना नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक चेतना का स्वर बन जाती है, जो बेटी के महत्व, सम्मान और सशक्तिकरण की आवश्यकता को गहराई से अनुभव कराती है।

 प्रश्न 7.निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए –

(क) नत नयनों से आलोक उतर

उत्तर :

विवाह के अवसर पर सजी-धजी सरोज इतनी मनोहारी और आकर्षक लग रही थी कि उसके लज्जा से झुके हुए नेत्रों से भी मानो कोई दिव्य प्रकाश फूट रहा हो। भावी दांपत्य जीवन की सुखद कल्पनाओं से उसके नेत्र उल्लास और प्रसन्नता से जगमगा रहे थे, जिससे उसका संपूर्ण व्यक्तित्व सौंदर्य और आनंद से दीप्त प्रतीत हो रहा था। 

(ख) शृंगार रहा जो निराकार

उत्तर :

अपनी पुत्री को दुल्हन के रूप में देखकर कवि के मन में उसके यौवनकाल की स्मृतियाँ पुनः जाग उठती हैं। सरोज के इस श्रृंगार में उसे वही शृंगार दृष्टिगोचर होता है, जो साकार रूप न होते हुए भी उसके काव्य में रस की अविरल धारा के रूप में प्रवाहित होता रहा है। इस दृश्य से कवि का हृदय भावनाओं से भर उठता है।

(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला

उत्तर :

विदाई के समय कवि अपनी पुत्री सरोज को शिक्षा देते हुए यह अनुभव करता है कि वह उसे वैसे ही उपदेश दे रहा है जैसे कण्व ऋषि ने शकुंतला को दिया था। किंतु तभी उसे यह भी बोध होता है कि सरोज की स्थिति शकुंतला से भिन्न है। इसलिए वह उसे पारंपरिक शिक्षा न देकर उसकी परिस्थितियों के अनुरूप, भिन्न और यथार्थपरक शिक्षा प्रदान करता है। इससे कवि की विवेकशीलता और युगबोध स्पष्ट होता है।

(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ।

उत्तर :

कवि स्वयं अपनी पुत्री का तर्पण करता है और इस दायित्व को निभाने के लिए वह हर प्रकार के कष्ट सहने को तैयार है। वह कहता है कि चाहे उसका धर्म संकट में पड़ जाए या उसके समस्त कर्मों पर विपत्ति रूपी वज्र ही क्यों न गिर पड़े, वह सब कुछ झुके हुए सिर से स्वीकार करेगा। अपनी पुत्री के प्रति उसका यह कर्तव्यबोध और आत्मिक साहस उसके गहरे वात्सल्य और नैतिक दृढ़ता को प्रकट करता है।

प्रश्न 1.

सिद्ध कीजिए कि *‘सरोज स्मृति’* एक शोकगीत है।

**उत्तर :**

शोकगीत वह काव्य-रचना होती है, जो किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से उत्पन्न गहन दुःख, पीड़ा और मानसिक संताप की अभिव्यक्ति करती है। ऐसे गीतों में शोक, निराशा, वेदना, आत्मग्लानि और करुणा के भाव प्रधान रूप से विद्यमान रहते हैं।

*‘सरोज स्मृति’* कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा अपनी प्रिय पुत्री सरोज की असमय, उन्नीस वर्ष की अल्पायु में हुई मृत्यु के पश्चात रचित कविता है। पुत्री के निधन से कवि का हृदय असहनीय पीड़ा से भर उठता है। वह इस बात की गहरी आत्मग्लानि अनुभव करता है कि जीवन-संघर्षों के कारण वह अपनी पुत्री को आवश्यक सुख-सुविधाएँ तक प्रदान नहीं कर सका।

इस कविता में कवि ने अपने दुःख, पछतावे और करुण भावों को अत्यंत मार्मिक एवं सजीव रूप में व्यक्त किया है। उसकी वेदना इतनी तीव्र है कि पाठक भी भावुक हुए बिना नहीं रह पाता और उसकी सहानुभूति स्वतः ही कवि तथा सरोज के प्रति जागृत हो जाती है। भावों की सच्चाई, सहजता और आत्मीयता के कारण *‘सरोज स्मृति’* एक प्रभावशाली और सफल शोकगीत सिद्ध होती है।

प्रश्न 2

‘दुःख ही जीवन की कथा रही’—इस पंक्ति में निहित कवि ‘निराला’ की वेदना को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

*‘सरोज स्मृति’* कविता में कवि निराला ने अपने जीवन की निरंतर पीड़ा और संघर्ष को अत्यंत संक्षिप्त किंतु गहन शब्दों में व्यक्त किया है। ‘दुःख ही जीवन की कथा रही’ पंक्ति कवि के संपूर्ण जीवनानुभव का सार प्रस्तुत करती है। निराला का जीवन आरंभ से ही आर्थिक अभावों, सामाजिक उपेक्षा और पारिवारिक कष्टों से भरा रहा।

पुत्री सरोज की आकस्मिक मृत्यु ने उसके जीवन में दुःख की पराकाष्ठा ला दी। इस अपार शोक के कारण कवि इतना व्यथित हो जाता है कि वह अपनी पीड़ा का विस्तार से वर्णन करने में भी असमर्थ हो जाता है। वह मानो स्वीकार कर लेता है कि उसका सम्पूर्ण जीवन ही दुःखों की एक अविराम श्रृंखला रहा है। इस वेदना में वह अपने जीवन के सत्कार्यों और उपलब्धियों का भी कोई महत्व नहीं समझता। यह पंक्ति कवि के जीवन-संघर्ष और मानसिक संताप की सशक्त अभिव्यक्ति है।

प्रश्न 3

कवि ने *‘सरोज स्मृति’* गीत किसकी स्मृति में लिखा है और यह गीत किसे समर्पित है?

उत्तर :

कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने *‘सरोज स्मृति’* गीत अपनी इकलौती पुत्री सरोज की स्मृति में लिखा है, जिसकी अल्पायु में आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। पुत्री के निधन के पश्चात कवि पूर्णतः एकाकी और शोकग्रस्त हो गया था।

यह संपूर्ण गीत कवि की हृदयविदारक पीड़ा, प्रेम और स्मृतियों का दस्तावेज़ है, जिसे उसने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज को ही समर्पित किया है। इस प्रकार *‘सरोज स्मृति’* एक पिता के अटूट स्नेह और अमिट दुःख का करुण काव्य-प्रतिरूप है।

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