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घनानंद के प्रथम कवित्त का प्रतिपाद्य
पाठ्यक्रम में संकलित घनानंद द्वारा रचित दो कवित्तों में से प्रथम कवित्त प्रेम-विरह की गहन अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। इस कवित्त में कवि अपनी प्रेयसी सुजान को संबोधित करते हुए अपने हृदय की तीव्र व्याकुलता प्रकट करता है। कवि का प्रेम अत्यंत गहरा और समर्पित है, जिसके कारण वह अपनी प्रेयसी के एक दर्शन के लिए अत्यंत आतुर है।
कवि का कहना है कि उसके प्राण उसी आशा में अटके हुए हैं कि प्रियतम एक बार उसे दर्शन दे। प्रेमिका के दर्शन उसके लिए जीवन का आधार बन गए हैं और उसी से उसे जीवन-शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार यह कवित्त प्रेम की तीव्रता, विरह की व्यथा और प्रिय-दर्शन की उत्कट आकांक्षा को भावपूर्ण और मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है।
घनानंद के कवित्त – सप्रसंग व्याख्या
1.
बहुत दिनान को अवधि आसपास परे,
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को।
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को ॥
झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास हूँ कै,
अब ना घिरत घन आनँद निदान को।
अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,
चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को ॥
प्रसंग :-प्रस्तुत कवित्त **रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि घनानंद** द्वारा रचित है। इस कवित्त में कवि ने अपनी प्रेयसी **सुजान** के दर्शन की तीव्र आकांक्षा को व्यक्त किया है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि उसके प्राण अब तक केवल इसी आशा में अटके हुए हैं कि उसे एक बार अपनी प्रेमिका के दर्शन हो जाएँ। यह कवित्त वियोग की चरम अवस्था, प्रेमजन्य व्याकुलता और करुण भाव की सघन अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है।
व्याख्या :इन पंक्तियों में कवि घनानंद अपनी अत्यंत दयनीय और मरणासन्न अवस्था का उल्लेख करते हुए अपनी प्रेयसी सुजान को संबोधित करता है। वह कहता है कि वह बहुत दिनों से अपनी प्रेमिका के दर्शन की आशा में जीवित है, किंतु अब प्रतीक्षा की वह अवधि समाप्त होने वाली है। उसके प्राण विचलित होकर शरीर छोड़ने को आतुर हो उठे हैं।
कवि कहता है कि उसकी इस करुण दशा का संदेश उसकी सुंदर और मनभावन प्रेमिका तक पहुँच चुका है। वह उन संदेशों को सम्मानपूर्वक स्वीकार तो करती है, किंतु दर्शन देने स्वयं नहीं आती। प्रेमिका की केवल आश्वासनभरी और टालने वाली बातों पर विश्वास करके कवि अब गहरे शोक और निराशा में डूब गया है।
कवि अनुभव करता है कि उसके प्रेम-रोग का अब कोई उपचार शेष नहीं रह गया है। यह विरह-व्यथा असाध्य हो चुकी है और अब उसके प्राण निकलने ही वाले हैं। अंत में कवि यह कामना करता है कि उसके प्राण-प्रस्थान का समाचार किसी प्रकार उसकी प्रेयसी सुजान तक अवश्य पहुँचा दिया जाए, ताकि वह उसकी अंतिम अवस्था को जान सके।इस प्रकार इस कवित्त में प्रेम की अतिशय तीव्रता, वियोग की असहनीय पीड़ा और करुण अनुभूति का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।
विशेष :-
* कवि की **वियोगजन्य प्रेम-व्यथा और मरणासन्न अवस्था** का करुण चित्रण हुआ है।
* **ब्रजभाषा** की कोमलकांत पदावली का सुंदर और भावपूर्ण प्रयोग किया गया है।
* **पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष और अनुप्रास** अलंकारों का सहज एवं प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
* **कवित्त छंद** के कारण रचना में गेयता और लयात्मकता विद्यमान है।
* काव्य में **वियोग-वर्णन और करुण रस** की प्रधानता है।
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(ii) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** प्रस्तुत कवित्त के रचयिता कौन हैं?
(क) बिहारी
(ख) देव
(ग) घनानंद
(घ) मतिराम
**सही उत्तर :** (ग) घनानंद
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**प्रश्न 2.** कवि किसके दर्शन की कामना करता है?
(क) किसी देवी के
(ख) मित्र के
(ग) गुरु के
(घ) अपनी प्रेयसी सुजान के
**सही उत्तर :** (घ) अपनी प्रेयसी सुजान के
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**प्रश्न 3.** कवि को ऐसा क्यों लगता है कि उसके प्राण निकलने वाले हैं?
(क) बीमारी के कारण
(ख) युद्ध के कारण
(ग) प्रेमिका के दर्शन न मिलने के कारण
(घ) वृद्धावस्था के कारण
**सही उत्तर :** (ग) प्रेमिका के दर्शन न मिलने के कारण
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**प्रश्न 4.** प्रेमिका सुजान कवि के संदेशों के साथ क्या व्यवहार करती है?
(क) उन्हें ठुकरा देती है
(ख) उन्हें नष्ट कर देती है
(ग) सम्मानपूर्वक रख लेती है
(घ) तुरंत दर्शन देने आ जाती है
**सही उत्तर :** (ग) सम्मानपूर्वक रख लेती है
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**प्रश्न 5.** इस कवित्त में प्रमुख रस कौन-सा है?
(क) शृंगार (संयोग)
(ख) वीर
(ग) करुण
(घ) शांत
**सही उत्तर :** (ग) करुण
घनानंद के द्वितीय कवित्त का प्रतिपाद्य-
इस कवित्त में कवि अपनी प्रेयसी से पुनः मिलने का विनम्र अनुरोध करता है। वह आशा व्यक्त करता है कि कभी न कभी उसकी करुण पुकार प्रेयसी तक अवश्य पहुँचेगी और वह अपनी आनाकानी त्यागकर उससे मिलने के लिए तैयार होगी। इस प्रकार यह कवित्त प्रेमी की आशा, प्रतीक्षा और विरहजन्य वेदना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
सप्रसंग व्याख्या –
2.
आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलाँ?
कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै ?
मौन हू सौं देखिहाँ कितेक पन पालिहौ जू,
कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।
जान घनआनँद यों मोहिं तुम्हें पैज परी,
जानियैगो टेक टरें कौन धौ मलोलिधै।
रुई दिए रहौगे कहाँ लौ बहरायबे की ?
कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै।
प्रसंग :-प्रस्तुत कवित्त **रीतिकाल के विख्यात कवि घनानंद** द्वारा रचित है। इस कवित्त में कवि ने अपनी प्रेयसी **सुजान** से मिलने की करुण प्रार्थना की है। कवि आशा करता है कि उसकी निरंतर पुकार एक न एक दिन प्रेमिका तक अवश्य पहुँचेगी और वह अपनी उपेक्षा तथा आनाकानी त्याग कर उससे मिलने आएगी। यह कवित्त प्रेम-वियोग की व्याकुलता, प्रतीक्षा और आशा के भाव को सशक्त रूप में व्यक्त करता है।
व्याख्या :-इन पंक्तियों में कवि घनानंद अपनी प्रियतमा सुजान से उसकी बेरुखी त्याग कर दर्शन देने का अनुरोध करता है। वह प्रश्नात्मक शैली में कहता है कि तुम कब तक मेरी पुकार को अनसुना करती रहोगी और स्वयं को अपनी अँगूठी में लगे दर्पण में निहारती रहोगी? क्या मेरी इस व्याकुल, पीड़ित और असहाय दशा को देखकर भी तुम्हारी दृष्टि तनिक भी विचलित नहीं होगी?
कवि आगे पूछता है कि तुम मौन रहकर और अपने संकल्पों पर अडिग रहकर कब तक इस उपेक्षा को निभाओगी? उसे पूर्ण विश्वास है कि उसकी मौन और करुण पुकार अंततः प्रेमिका के हृदय को अवश्य स्पर्श करेगी और वह बोल उठेगी। कवि कहता है कि उसकी और प्रेमिका की मानो एक होड़-सी लग गई है—वह जानना चाहता है कि प्रेमिका की यह कठोरता और उदासीनता आखिर कब तक चलेगी।
अंत में कवि अत्यंत मार्मिक ढंग से कहता है कि तुम अपने आप को बहरा बनाकर कब तक अपने कानों में रूई डाले रखोगी? किसी न किसी क्षण मेरी पुकार तुम्हारे कानों को खोल ही देगी। इस प्रकार कवि की विरह-वेदना, आशा और प्रेम में अडिग विश्वास इस कवित्त में प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त हुआ है।
विशेष :-
* कवि की **विरह-वेदना, प्रतीक्षा और आशा** का सजीव चित्रण है।
* **ब्रजभाषा** की कोमलकांत पदावली का सहज एवं भावपूर्ण प्रयोग किया गया है।
* **अनुप्रास और प्रश्न अलंकार** के प्रयोग से भावों में तीव्रता आई है।
* काव्य में **शृंगार रस के विरह पक्ष** का मार्मिक और प्रभावशाली वर्णन है।
* प्रश्नात्मक शैली ने कवित्त को संवादात्मक और भावोत्तेजक बना दिया है।
(ii) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
**प्रश्न 1.** प्रस्तुत कवित्त के रचयिता कौन हैं?
(क) बिहारी
(ख) देव
(ग) घनानंद
(घ) मतिराम
**सही उत्तर :** (ग) घनानंद
—
**प्रश्न 2.** कवि किससे मिलने का अनुरोध कर रहा है?
(क) मित्र से
(ख) गुरु से
(ग) अपनी प्रेयसी सुजान से
(घ) किसी देवी से
**सही उत्तर :** (ग) अपनी प्रेयसी सुजान से
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**प्रश्न 3.** कवि के अनुसार प्रेमिका कब तक अपने कानों में “रूई डाले” रहेगी?
(क) सदा के लिए
(ख) जब तक कवि जीवित है
(ग) कुछ समय तक ही, अंततः पुकार सुन लेगी
(घ) जब तक कोई और न बुलाए
**सही उत्तर :** (ग) कुछ समय तक ही, अंततः पुकार सुन लेगी
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**प्रश्न 4.** कवि को किस बात का दृढ़ विश्वास है?
(क) प्रेमिका कभी नहीं आएगी
(ख) उसकी पुकार व्यर्थ है
(ग) उसकी पुकार एक दिन प्रेमिका तक पहुँचेगी
(घ) प्रेम समाप्त हो चुका है
**सही उत्तर :** (ग) उसकी पुकार एक दिन प्रेमिका तक पहुँचेगी
—
**प्रश्न 5.** इस कवित्त में प्रधान रस कौन-सा है?
(क) वीर
(ख) करुण
(ग) शृंगार (विरह पक्ष)
(घ) शांत
**सही उत्तर :** (ग) शृंगार (विरह पक्ष)
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