12 cbse-hindi-antara- Chapter 3 – Yah Deep Akela- Maine Dekha- Ek Boond –Vyakhya-ये दीप अकेला -मैंने देखा ,एक बूँद –अज्ञेय- कविता का मूल भाव ,व्याख्या -बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)
‘मैंने देखा, एक बूँद’ -कविता का प्रतिपाद्य
‘मैंने देखा, एक बूँद’ कविता अज्ञेय के काव्य-संग्रह *अरी ओ करुणा प्रभामय* से ली गई एक दार्शनिक और भावप्रधान रचना है। इस कविता में कवि ने अत्यंत सूक्ष्म प्रतीक के माध्यम से मानव-जीवन के क्षणिक सौंदर्य और उसकी सार्थकता को अभिव्यक्त किया है। कवि को ऐसा अनुभव होता है मानो सागर की प्रचंड लहरों की उथल-पुथल से सहसा जल की एक छोटी-सी बूँद उछलकर ऊपर आती है और संध्याकालीन सूर्य की स्वर्णिम आभा से आलोकित होकर क्षणभर के लिए अत्यंत मनोहर और आकर्षक प्रतीत होती है।
इसी प्राकृतिक दृश्य के आधार पर कवि मानव-जीवन का दार्शनिक अर्थ स्पष्ट करता है। जैसे वह बूँद अल्पकालिक होते हुए भी सूर्य के प्रकाश से चमक उठती है, वैसे ही मानव-जीवन में भी कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो व्यक्ति को सुखानुभूति से भर देते हैं और उसके संपूर्ण जीवन को अर्थपूर्ण तथा आकर्षक बना देते हैं।
इस कविता में सागर और बूँद क्रमशः समष्टि और व्यष्टि के प्रतीक हैं। सागर विराट चेतना और सामूहिक अस्तित्व का बोध कराता है, जबकि बूँद व्यक्तिगत जीवन और सीमित अस्तित्व का संकेत है। कविता में प्रयुक्त ‘सूरज की आग’ का प्रतीक विराट, सार्वभौमिक चेतना की उस ऊर्जा का द्योतक है, जो प्रत्येक चेतन प्राणी को जीवन और अर्थ प्रदान करती है।
कवि का मत है कि जो व्यक्ति समष्टि-धारा से अलग होकर केवल अपने सीमित अस्तित्व में सिमट जाता है, उसका जीवन महत्वहीन हो सकता है। किंतु यदि वही व्यक्ति अपने अखंड व्यक्तित्व को विराट चेतना के आलोक से अनुप्राणित कर ले, तो उसका अस्तित्व उस बूँद की भाँति क्षणिक होते हुए भी अमर हो जाता है। इस प्रकार यह कविता व्यक्तिगत जीवन को सार्वभौमिक चेतना से जोड़कर उसे सार्थक और शाश्वत बनाने का दार्शनिक संदेश देती है।
‘मैंने देखा, एक बूँद’ –व्याख्या
काव्यांश 1.
मैने देखा
एक बूँद सहसा
उछली सागर के झाग से;
रंग गई क्षणभर
बलते सूरज की आग से।
मुझको दीख गया-
सूने बिराट के सम्मुखु
हर आलोक-छुआ अपनापन
है उन्मोचन
नश्वरता के दाग से!
***
(i) व्याख्या -*‘मैंने देखा एक बूँद’
प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हिंदी के सुप्रसिद्ध आधुनिक कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित कविता *‘मैंने देखा एक बूँद’* से उद्धृत हैं। यह कविता कवि की दार्शनिक चेतना और रहस्यवादी दृष्टि की सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि यह प्रतिपादित करता है कि यदि व्यक्ति समाज और विराट चेतना से कट जाता है तो उसका अस्तित्व क्षणिक और उपेक्षित हो जाता है; किंतु यदि वही व्यक्ति अपने अखंड व्यक्तित्व को विराट सत्ता के आलोक से जोड़ ले, तो वह नश्वर होते हुए भी अमरत्व को प्राप्त कर सकता है।
व्याख्या -इन पंक्तियों में कवि सांध्यकालीन दृश्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उसने सागर की लहरों से उठे झाग से सहसा एक जल-बूँद को उछलते हुए देखा। जैसे ही वह बूँद सागर से अलग होती है, संध्या के सूर्य की स्वर्णिम किरणें उसे रंग देती हैं और वह स्वर्ण के समान दमकने लगती है। यद्यपि वह बूँद क्षणभर बाद पुनः उसी झाग में विलीन हो जाती है, फिर भी उसके उस अल्पकालिक स्वर्णिम अस्तित्व को कवि उसके जीवन की परम सार्थकता मानता है।
संध्याकालीन सूर्य की किरणों का स्वर्णिम होना स्वाभाविक है, इसलिए बूँद का स्वर्णमय दिखाई देना भी प्राकृतिक प्रक्रिया है; किंतु कवि इसी साधारण घटना में अलौकिक सौंदर्य और गहन अर्थ की अनुभूति करता है और आनंद से भर उठता है। इस दृश्य से प्रेरित होकर कवि आत्मबोध की स्थिति में पहुँच जाता है।
कवि विचार करता है कि विराट सत्ता या परम तत्त्व स्वयं में निराकार और शून्य-सा प्रतीत होता है, किंतु जब मानव अपने जीवन के किसी क्षण में स्वयं को उस विराट के प्रति समर्पित कर देता है, तब वही विराट चेतना उसे अपने आलोक से रंग देती है। उस क्षण मानव-जीवन बूँद की भाँति स्वर्णिम हो उठता है और नश्वरता की सीमा लाँघकर अमरत्व को स्पर्श कर लेता है। इस प्रकार कवि निष्कर्ष निकालता है कि मानव-जीवन के वही क्षण वास्तव में सार्थक होते हैं, जो विराट चेतना के प्रकाश से आलोकित हो जाते हैं।
विशेष –
* कविता में क्षण के महत्व और उसके दार्शनिक मूल्य को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया गया है।
* तत्सम-प्रधान शब्दावली में दृश्य-बिंब अत्यंत सजीव और सौंदर्यपूर्ण बन पड़ा है।
* तद्गुण अलंकार की छटा दर्शनीय है।
* कवि ने आत्मबोध के माध्यम से खंड में भी सत्य के दर्शन की संभावना व्यक्त की है।
* कविता में रहस्यवादी चेतना स्पष्ट है; कवि पर पश्चिमी अस्तित्ववाद का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
* बूँद और विराट के माध्यम से प्रतीकात्मकता का अत्यंत सार्थक प्रयोग हुआ है।
(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ
**प्रश्न 1.** कविता *‘मैंने देखा एक बूँद’* में बूँद किसका प्रतीक है?
(क) प्रकृति का
(ख) समाज का
(ग) मानव-जीवन के क्षणिक अस्तित्व का
(घ) भौतिक संपत्ति का
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 2.** बूँद का स्वर्णिम दिखाई देना किस कारण से हुआ?
(क) उसके आकार के कारण
(ख) संध्या-सूर्य की स्वर्णिम किरणों के कारण
(ग) सागर की लहरों के कारण
(घ) कवि की कल्पना के कारण
**सही उत्तर :** (ख)
—
**प्रश्न 3.** कवि बूँद के क्षणिक स्वर्णिम अस्तित्व को क्या मानता है?
(क) व्यर्थ घटना
(ख) जीवन की असफलता
(ग) जीवन की परम सार्थकता
(घ) संयोग मात्र
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 4.** कविता के अनुसार मानव-जीवन कब अमर हो जाता है?
(क) जब वह समाज से कट जाता है
(ख) जब वह केवल स्वयं में लीन रहता है
(ग) जब वह स्वयं को विराट चेतना के प्रति समर्पित कर देता है
(घ) जब उसे भौतिक सफलता मिलती है
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 5.** इस कविता में प्रमुख रूप से कौन-सी भावना व्यक्त हुई है?
(क) राष्ट्रवादी
(ख) रहस्यवादी और दार्शनिक
(ग) वीर रसात्मक
(घ) सामाजिक यथार्थ
**सही उत्तर :** (ख)
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