12 cbse-hindi-antara- Chapter 3 – Yah Deep Akela- Maine Dekha- Ek Boond –Vyakhya-ये दीप अकेला -मैंने देखा ,एक बूँद –अज्ञेय- कविता का मूल भाव ,व्याख्या तथा काव्यांश से बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)
12 cbse board परीक्षा में hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board द्वारा निर्धारित hindi book (antara) का अध्ययन करनेवाले शिक्षार्थियों !
12 cbse/hindi/antara/ Chapter 3 – Yah Deep Akela, Maine Dekha, Ek Boond –Vyakhya/ये दीप अकेला ,मैंने देखा ,एक बूँद -अज्ञेय) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन ( कविता का मूल ,काव्यांश का भावार्थ ,काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न -(MCQ )आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .
इस भाग में 12 cbse/hindi/antara/ Chapter 3 – Yah Deep Akela, Maine Dekha, Ek Boond –Vyakhya/ये दीप अकेला ,मैंने देखा ,एक बूँद -अज्ञेय) केअंतर्गत कविता का मूल भाव ,व्याख्या तथा काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है .
काव्यांश को तीन भागों में बांटा गया है –(अ)(ब)(स),
अ -भाग में कविता का मूल भाव दिया गया है
ब -भाग में काव्यांश का भावार्थ -व्याख्या दी गई है .
स-भाग में काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है
यहाँ पर काव्य खंड के Chapter 3 – Yah Deep Akela, Maine Dekha, Ek Boond –Vyakhya/ये दीप अकेला ,मैंने देखा ,एक बूँद -अज्ञेय) के Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) इस प्रकार से तैयार किये गए है जो परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं , तीनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.
Chapter 3-ये दीपअकेला ,मैंने देखा ,एक बूँद – अज्ञेय –कविता का प्रतिपाद्य
‘यह दीप अकेला’ अज्ञेय की काव्य–कृति *बावरा अहेरी* से ली गई एक प्रतीकात्मक और विचारप्रधान कविता है। इस कविता में कवि ने स्वयं को दीपक के रूपक के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए समाज से जुड़ने की अपनी गहरी आकांक्षा व्यक्त की है। कवि मानता है कि उसका दीपक-रूपी मन अकेले जल रहा है, किंतु उसमें स्नेह रूपी तेल भरा हुआ है, जो दूसरों के लिए प्रेम, संवेदना और करुणा से परिपूर्ण है। वह अकेला होते हुए भी आत्मगौरव, स्वाभिमान और सृजनात्मक मस्ती से युक्त है।
कवि का कहना है कि यदि इस अकेले दीपक को अन्य दीपकों की पंक्ति में स्थान दे दिया जाए, तो उसका एकाकीपन समाप्त हो जाएगा और उसकी उपयोगिता तथा महत्त्व भी समाज के सामने स्पष्ट हो जाएगा। कवि यह विश्वास व्यक्त करता है कि यदि समाज-कल्याण के लिए गीत रचने वाला कवि समाज से अलग-थलग रखा जाएगा, तो उसे उचित पहचान और स्थान नहीं मिल पाएगा। कवि स्वयं को एक कर्मशील गोताखोर मानता है, जो समाज रूपी सागर में गहराई तक उतरकर सत्य, सौंदर्य और मूल्यों के मोती निकाल सकता है और अपने गीतों के माध्यम से समाज को समृद्ध कर सकता है।
कवि प्रश्न करता है कि यदि कवि को समाज में उचित स्थान न दिया गया, तो समिधाओं को सुलगाकर समाज में चेतना जगाने वाला वह हठीला और जागरूक व्यक्ति कौन होगा। इसलिए समाज को चाहिए कि वह कवि की प्रतिभा को पहचाने और उसका सही उपयोग करे। कवि मानता है कि उसका हृदय शहद के समान मधुर है, जिसे समय रूपी मधुमक्खी ने संसार के विविध सद्विचारों से संचित किया है। इसमें समाज के जीवन रूपी कामधेनु का अमृततुल्य दूध भरा हुआ है।
उसके मन में भावनाओं के अंकुर उसी प्रकार फूटते हैं, जैसे साधारण बीज अंकुरित होकर सूर्य की ओर उन्मुख हो जाते हैं। जिस प्रकार अंकुर स्वयं उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार कवि की कविताएँ भी स्वाभाविक रूप से उसके हृदय से जन्म लेती हैं। कवि समाज से विनम्र प्रार्थना करता है कि वह उसकी सृजनात्मक शक्ति को स्वीकार करे और उसे बल प्रदान करे, ताकि वह अपनी कविताओं के माध्यम से समाज का कल्याण कर सके।
कवि चाहता है कि समाज उसके गर्व, मस्ती या आत्मविश्वास को न देखकर उसके एकाकी संघर्ष और सृजनशीलता को समझे। उसे अपनी कविता के उद्देश्य पर इतना दृढ़ विश्वास है कि वह आलोचकों की निंदा से कभी भयभीत नहीं होता। उसकी कविता की पीड़ा उसके हृदय की गहराइयों से उपजी है, जिसमें उसने सामाजिक समस्याओं को समझा और व्यक्त किया है। उसने अनेक आघात सहे, अपमान भी झेला, किंतु उसके उत्साह और रचनात्मक ऊर्जा में कभी कमी नहीं आई। वह निरंतर संवेदनशील और कल्याणकारी कविताएँ रचता रहा है।
इस प्रकार ‘यह दीप अकेला’ कविता कवि और समाज के संबंध, कवि की सामाजिक भूमिका तथा उसकी उपेक्षित प्रतिभा का प्रभावशाली चित्रण करती है। कवि समाज से आग्रह करता है कि उसे भी अन्य कवियों की भाँति उचित स्थान दिया जाए, ताकि वह अपने सृजन के माध्यम से समाज के लिए अधिक प्रभावी और कल्याणकारी योगदान दे सके।
यह दीप अकेला – सप्रसंग व्याख्या
काव्यांश -1.
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह ज्ञन है-गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा ?
पनडुख्या-ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लाएगा ?
यह समिधा-ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा।
यह अद्ववितीय-यह मेरा-यह में स्वयं विसर्जित-
यह दीप, अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मद्माता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्रसंग :
**प्रस्तुत पंक्तियाँ सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता *‘यह दीप अकेला’* से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने ‘दीप’ को प्रतीक बनाकर अपने दृढ़ आत्मविश्वास, आत्मगौरव, हठधर्मिता तथा अपनी विशिष्ट अस्मिता को अभिव्यक्त किया है। यह कविता आधुनिक कवि की स्वतंत्र चेतना और आत्मसम्मान की सशक्त अभिव्यक्ति है।
व्याख्या –इन पंक्तियों में कवि कहता है कि उसका हृदय एक दीपक के समान है, जो अकेला होते हुए भी प्रेम रूपी तेल से पूर्ण भरा हुआ है। यद्यपि यह दीप अकेला है, फिर भी उसे अपने अस्तित्व पर गर्व है, क्योंकि वह अंधकार के बीच प्रकाश फैलाने की क्षमता रखता है। कवि स्वीकार करता है कि यह दीप कुछ गर्वीला और आत्ममग्न प्रतीत होता है, किंतु इस पक्ष को अनदेखा कर इसे अन्य दीपों के साथ पंक्ति में सजा देना चाहिए, ताकि इसका प्रकाश समाज को निरंतर मिलता रहे।
इसी भाव को कवि अपने जीवन और काव्य-व्यक्तित्व से जोड़ते हुए कहता है कि वह भी अपने रचना-लोक में मग्न रहता है। वह चाहता है कि उसे भी उन कवियों की श्रेणी में स्थान दिया जाए, जिन्होंने काव्य और समाज को अपनी अनुभूतियों के अमूल्य मोती प्रदान किए हैं। यदि उसके इस कवि-हृदय को, जो जन-जागरण और लोक-कल्याण के गीत गाता है, कवि-समाज में स्थान नहीं दिया गया, तो फिर ऐसे गीत कौन गाएगा?
कवि आगे प्रश्न करता है कि यदि यह कवि-हृदय भावनाओं के सागर में गोताखोर की भाँति उतरकर उत्कृष्ट काव्य-रत्न खोजकर नहीं लाएगा, तो फिर यह कार्य कौन करेगा? यदि इस नूतन काव्य-यज्ञ में सुलगी हुई अग्नि में समिधाएँ अर्पित करने वाला यह कवि ही अस्वीकृत कर दिया गया, तो फिर उस यज्ञ को जीवित कौन रखेगा?
कवि स्पष्ट करता है कि उसका यह हृदय अनुपम भावनाओं से ओत-प्रोत है और उसी के माध्यम से वह स्वयं को अभिव्यक्त करता है। उसकी कविताओं में उसका हठीला, गर्वीला और स्वतंत्र व्यक्तित्व मुखर होता है। यह हृदय-रूपी दीप कुछ मदोन्मत्त अवश्य है, किंतु पूर्णतः एकांकी नहीं है—यह प्रेम और समर्पण से भरा हुआ है। अतः कवि निवेदन करता है कि उसके इस गर्वीले स्वभाव को छोड़कर उसे कवियों की पंक्ति में उचित स्थान प्रदान किया जाए।
विशेष –
* कवि की दृष्टि में सृजनशील प्रतिभा व्यक्ति को सामान्य जन से अलग पहचान प्रदान करती है।
* कविता मुक्त छंद में रचित है; इसमें भाव-लय का सुंदर निर्वाह हुआ है।
* भाषा तत्सम शब्दावली प्रधान, ओजस्वी और प्रभावपूर्ण है।
* अनुप्रास के साथ-साथ मानवीकरण, रूपक, श्लेष और अतिशयोक्ति अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
* कविता आधुनिक चेतना, आत्मसम्मान और स्वतंत्र व्यक्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।
(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न
**प्रश्न 1.** ‘यह दीप अकेला’ कविता में ‘दीप’ किसका प्रतीक है?
(क) समाज का
(ख) परंपरा का
(ग) कवि के आत्मविश्वासी व्यक्तित्व का
(घ) प्रकृति का
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 2.** कवि के अनुसार दीप को अन्य दीपों के साथ क्यों सजाया जाना चाहिए?
(क) उसकी शोभा बढ़ाने के लिए
(ख) उसका गर्व मिटाने के लिए
(ग) ताकि समाज को उसका प्रकाश मिलता रहे
(घ) उसकी एकाकी स्थिति समाप्त करने के लिए
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 3.** ‘भावनाओं के सागर में गोताखोर’ से कवि का क्या आशय है?
(क) साहसी व्यक्ति
(ख) साधारण रचनाकार
(ग) गहन अनुभूतियों से श्रेष्ठ काव्य खोजने वाला कवि
(घ) समाज सुधारक
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 4.** ‘नूतन काव्य-यज्ञ की अग्नि’ किसका प्रतीक है?
(क) धार्मिक आस्था
(ख) परंपरागत काव्य
(ग) नवीन काव्य-चेतना और सृजन
(घ) सामाजिक संघर्ष
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 5.** इस काव्यांश का मूल भाव क्या है?
(क) विनम्रता
(ख) आत्मदैन्य
(ग) आत्मगौरव और अस्मिता की स्वीकृति
(घ) सामाजिक विद्रोह
**सही उत्तर :** (ग)
*‘यह दीप अकेला’*-अज्ञेय’ –व्याख्या –
काव्यांश-2.
यह मधु है – स्वय काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस-जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर-फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, एहूम, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो।
यह दीप, अकेला, सेह भरा है गर्व भरा
मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
—
**प्रसंग :**
प्रस्तुत पंक्तियाँ सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित कविता *‘यह दीप अकेला’* से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने ‘दीप’ को प्रतीक बनाकर अपने दृढ़ आत्मविश्वास, सृजनशील चेतना तथा ऊँचा उठने की आकांक्षा को अभिव्यक्ति दी है। दीप यहाँ कवि के आत्मसम्मान और स्वतंत्र व्यक्तित्व का द्योतक है।
व्याख्या –
इन पंक्तियों में कवि कहता है कि उसका कवि-हृदय दीपक के समान है, जो अत्यंत मधुर और शांत स्वरूप वाला है। उसमें समकालीन युग की शांति और संतुलन का भाव संचित है। यह हृदय जीवन-रूपी कामधेनु के अमृततुल्य, पवित्र दुग्ध से परिपूर्ण है, अर्थात् उसमें जीवनदायिनी और कल्याणकारी सृजन-शक्ति विद्यमान है।
कवि आगे कहता है कि उसके हृदय में काव्य-भावनाओं के अंकुर स्वाभाविक रूप से उसी प्रकार फूट पड़ते हैं, जैसे बीज धरती को भेदकर अंकुरित होते हैं और निडर होकर सूर्य की ओर दृष्टि उठाते हैं। उसके लिए काव्य-सृजन कोई कृत्रिम प्रयास नहीं, बल्कि एक सहज और प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह सृजन ब्रह्म के समान है, जो सृष्टि की रचना कर स्वयं उससे पृथक रहता है। उसी प्रकार कवि का हृदय कविताओं की रचना करके भी उनसे अलिप्त बना रहता है।
अतः कवि समाज से यह आग्रह करता है कि उसके इस सृजनशील हृदय को भी शक्ति और स्वीकृति प्रदान की जाए। यद्यपि उसका हृदय-रूपी दीप गर्वीला और कुछ मतवाला प्रतीत होता है, फिर भी उसमें अपार रचनात्मक ऊर्जा और जीवन-दर्शन निहित है। इसलिए उसे कवियों की पंक्ति में स्थान दिया जाना चाहिए, ताकि उसकी सृजन-ज्योति समाज को आलोकित कर सके।
विशेष –
* कविता में कवि की सृजनशील प्रतिभा और आत्मसम्मान का प्रभावी चित्रण हुआ है।
* भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण तथा प्रवाहमयी है।
* मुक्त छंद में रचित यह कविता भाव-लय का सुंदर निर्वाह करती है।
* अनुप्रास, रूपक, स्वाभावोक्ति, उल्लेख तथा अतिशयोक्ति अलंकारों का सशक्त प्रयोग हुआ है।
* कविता आधुनिक चेतना, आत्मस्वीकृति और रचनात्मक स्वतंत्रता की सशक्त अभिव्यक्ति है।
(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ
**प्रश्न 1.** कविता में ‘दीप’ किसका प्रतीक है?
(क) समाज का
(ख) परंपरा का
(ग) कवि के आत्मविश्वासी और सृजनशील व्यक्तित्व का
(घ) प्रकृति का
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 2.** कवि के हृदय में काव्य-भावनाओं की उत्पत्ति कैसी मानी गई है?
(क) अभ्यास से
(ख) संघर्ष से
(ग) स्वाभाविक और सहज प्रक्रिया के रूप में
(घ) सामाजिक दबाव से
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 3.** ‘जीवन-रूपी कामधेनु का अमृत समान दूध’ से क्या अभिप्राय है?
(क) सांसारिक सुख
(ख) धार्मिक आस्था
(ग) जीवनदायिनी और कल्याणकारी सृजन-शक्ति
(घ) भौतिक समृद्धि
**सही उत्तर :** (ग)
—
**प्रश्न 4.** कवि अपने सृजन को ब्रह्म के समान क्यों मानता है?
(क) क्योंकि वह धार्मिक है
(ख) क्योंकि वह सृष्टि रचकर उससे अलिप्त रहता है
(ग) क्योंकि वह ईश्वर की भक्ति करता है
(घ) क्योंकि वह परंपरा का पालन करता है
**सही उत्तर :** (ख)
—
**प्रश्न 5.** कवि समाज से क्या अपेक्षा करता है?
(क) प्रशंसा
(ख) धन
(ग) कवि-समाज में स्वीकृति और स्थान
(घ) प्रसिद्धि
**सही उत्तर :** (ग)
‘यह दीप अकेला-अज्ञेय-व्याख्या –
काव्यांश -3.
यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लयुता में भी काँपा,
बह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधआते कडुवे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लंब-खाहु, यह चिर-अखंड अपनापा।
जिज्ञासु, प्रयुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को देदो –
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा।
है गर्व भरा मद्माता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
—
**प्रसंग :**
प्रस्तुत पद्यावतरण हिंदी के सुप्रसिद्ध आधुनिक कवि एवं प्रयोगवाद के प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित कविता *‘यह दीप अकेला’* से उद्धृत है। इस कविता में कवि व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और स्वतंत्र अस्मिता को स्वीकार करते हुए उसे समाज के व्यापक हित में समर्पित करने का आग्रह करता है। यहाँ ‘दीप’ सर्जनशील प्रतिभा, आत्मविश्वासी कलाकार और स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है।
**व्याख्या –
इन पंक्तियों में कवि दीपक को अपनी अस्मिता का प्रतीक बनाकर कहता है कि उसका आत्मविश्वास अपने लघुत्व के कारण कभी हीनभावना से ग्रस्त नहीं हुआ। आलोचनाओं और प्रतिकूल परिस्थितियों की तीव्र वायु ने उसे बुझाने के अनेक प्रयास किए, किंतु कवि ने उन्हें धैर्य और साहस के साथ सहन किया। उसने पीड़ाओं की गहराई को स्वयं अनुभव किया, कष्टों को झेला, निंदाओं और अपमान के कटु घूँट पिए तथा उपेक्षा के घने अंधकार की घुटन भी सही।
इसके बावजूद कवि के उत्साह में किसी प्रकार की शिथिलता नहीं आई। उसकी अस्मिता सदैव द्रवित और सजग बनी रही। अनुराग की लाली उसकी आँखों में सजी रही और वह भावनाओं के आलिंगन के लिए बाहें फैलाए निरंतर सजग, अखंड और निडर बना रहा। उसे हतोत्साहित करने के उद्देश्य से उसकी कविताओं पर कटु आक्षेप किए गए, निंदा और उपेक्षा का सामना करना पड़ा, किंतु इन सबका उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा।
कवि का सहज, प्रवणशील हृदय अपनी समकालीन परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील और अनुरागपूर्ण बना रहा। कटु आलोचनाओं के बीच भी वह अडिग और अविचल रहा। उसकी जिज्ञासा, सजगता और श्रद्धा निरंतर बनी रही। अतः कवि आग्रह करता है कि उसके इस अस्मिता-रूपी दीपक को, जो अकेला होते हुए भी गर्व और मस्ती के साथ निष्कंप भाव से जलता रहा है, कवियों की श्रेणी में स्थान दिया जाए। उसकी काव्य-साधना निरंतर गतिमान है और समाज के लिए प्रकाश देने में सक्षम है।
विशेष –
* अंधकार में निरंतर जलते दीपक का सजीव और प्रभावशाली दृश्य-बिंब प्रस्तुत हुआ है।
* सर्जक कलाकार के संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास का यथार्थ चित्रण मिलता है।
* भाषा तत्सम-प्रधान, ओजस्वी और भावगर्भित है।
* मुक्त-छंद का सुंदर प्रयोग किया गया है।
* रूपक, उल्लेख, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकारों की प्रभावशाली छटा दृष्टिगोचर होती है।
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(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ
**प्रश्न 1.** कविता *‘यह दीप अकेला’* में ‘दीप’ किसका प्रतीक है?
(क) सामाजिक परंपरा
(ख) सामान्य मनुष्य
(ग) सर्जनशील कलाकार की अस्मिता
(घ) प्रकृति की शक्ति
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 2.** कवि के आत्मविश्वास पर आलोचनाओं का क्या प्रभाव पड़ा?
(क) वह निराश हो गया
(ख) उसका उत्साह क्षीण हो गया
(ग) वह और अधिक दृढ़ हो गया
(घ) उसने लेखन छोड़ दिया
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 3.** ‘उपेक्षा के कसैले अंधकार’ से क्या तात्पर्य है?
(क) सामाजिक वैभव
(ख) प्रकृति का अंधकार
(ग) समाज द्वारा की गई निंदा और अनदेखी
(घ) अज्ञान की स्थिति
**सही उत्तर :** (ग)
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**प्रश्न 4.** कवि की अस्मिता किन गुणों से युक्त बताई गई है?
(क) भयभीत और अस्थिर
(ख) द्रवित, सजग और निडर
(ग) कठोर और अहंकारी
(घ) निष्क्रिय और उदास
**सही उत्तर :** (ख)
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**प्रश्न 5.** कवि समाज से क्या अपेक्षा करता है?
(क) आर्थिक सहायता
(ख) केवल प्रशंसा
(ग) कवि-समाज में स्वीकृति और स्थान
(घ) सत्ता का संरक्षण
**सही उत्तर :** (ग)
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