12 cbse/hindi/antara /Chapter 3 – yah deep akela / maine dekha-ek boond/ ageya (अ ) यह दीप अकेला (ब ) मैंने देखा एक बूँद -अज्ञेय
Question -Answer
(अ ) यह दीप अकेला-प्रश्न -उत्तर
प्रश्न 1.
‘दीप अकेला’ के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि उसे कवि ने स्नेहभरा, गर्वभरा एवं मदमाता क्यों कहा है?
अथवा
कवि ने ‘यह दीप अकेला सेहभरा है गर्वभरा मदमाता’ क्यों कहा है?
उत्तर :
1.
इस कविता में कवि ने ‘दीप अकेला’ को ऐसी अस्मिता का प्रतीक माना है, जिसमें लघु होने पर भी ऊँचा उठने की गर्वपूर्ण आकांक्षा विद्यमान है। यह दीप प्रेम और स्नेह रूपी तेल से भरा हुआ है, जिसके कारण वह आत्मगौरव से दीप्त होकर ऊपर उठता है और आनंदपूर्वक अपना प्रकाश चारों दिशाओं में फैलाता है। अकेला होते हुए भी वह एक आलोक-स्तंभ के समान है, जो समाज का मार्गदर्शन करता है और लोक-कल्याण की दिशा में प्रकाश फैलाता है। उसका मदमाता गर्व उसे अन्य सबसे अलग और विशिष्ट बनाता है।
प्रश्न 2.
यह दीप अकेला है ‘पर इसको भी पंक्ति को दे दो’ के आधार पर व्यष्टि का समष्टि में विलय क्यों और कैसे संभव है ?
उत्तर :
कवि ने इस कविता में ‘दीप’ को प्रतीक बनाकर अपने जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त किया है। यह दीप एकाकी है, आकार में लघु है, किंतु अपनी इस लघुता को वह हीनता नहीं मानता। उसका आत्मगौरव अक्षुण्ण है और वह अपने पृथक अस्तित्व के प्रति पूर्ण सजग है। अपने अस्तित्व को सार्थक बनाने के लिए वह ‘पंक्ति’ अर्थात समाज के प्रति स्वयं को निरपेक्ष भाव से समर्पित कर देता है। यह समर्पण अखंड, निस्स्वार्थ और शुद्ध है। उसकी प्रत्येक क्रिया विलक्षण है। वह ऐसा सर्जक है जो भविष्य के लिए ऐसे गीत रचता है, जिनकी तुलना कोई नहीं कर सकता। वह उस गोताखोर के समान है जो सागर की गहराइयों से सच्चे मोती निकाल लाता है।
यह दीप उस प्रज्वलित समिधा की भाँति है जो अन्य समिधाओं में अद्वितीय है, किंतु फिर भी उसका विसर्जन अवश्यंभावी है। उसका समर्पण कभी खंडित नहीं होता। कवि इस एकाकी दीप को मधु, गोरस और अंकुर कहकर संबोधित करता है—अर्थात वह मधुरता, पोषण और नवजीवन का स्रोत है। यह आलोक-स्तंभ समष्टि-हितों की सिद्धि करता है और अपने विशिष्ट गर्व के कारण पृथक रूप में उजागर होता है। इस प्रकार कवि यह प्रतिपादित करता है कि समर्पण के माध्यम से ही व्यष्टि का समष्टि में विलय संभव है।
प्रश्न 3.
‘गीत’ और ‘ मोती’ की सार्थकता किससे जुड़ी है ?
उत्तर :
‘गीत’ की सार्थकता कवि-कर्म से गहराई से जुड़ी हुई है। कवि अपने हृदय की गहराइयों में उतरकर श्रेष्ठ काव्य की सृष्टि करता है और उसी गीत के माध्यम से समाज के समक्ष अपनी अनुभूतियों को प्रकट करता है। इस प्रकार गीत व्यक्ति की भावनाओं को सामाजिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है। ठीक उसी प्रकार ‘मोती’ तभी मूल्यवान होता है, जब कोई साहसी गोताखोर समुद्र की अथाह गहराइयों से उसे निकालकर समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है और समाज उसकी पहचान व मूल्यांकन करता है।
प्रश्न 4.
‘यह अद्ववितीय-यह मेरा-यह मैं स्वयं विसर्जित’ पंक्ति के आधार पर व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता बताइए।
उत्तर :
‘यह दीप अकेला’ कविता में कवि व्यक्ति की विशिष्टता और अद्वितीयता को स्वीकार करते हुए भी सर्जक व्यक्तित्व को समाज के प्रति समर्पित करने की आवश्यकता पर बल देता है।मानव सभ्यता में संगठित सामाजिक व्यक्तित्व आस्था और सर्जनात्मकता का सशक्त आधार रहा है। इस कविता में कवि का व्यक्तित्व ‘पंक्ति’ अर्थात समाज को समर्पित है। आत्म-समर्पण और आत्म-त्याग का भाव आस्तिक चेतना से उत्पन्न होता है। कविता के माध्यम से कवि लोक-संपृक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है। यह रचना मूलतः व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण है। कवि अपने अद्वितीय व्यक्तित्व की सार्थकता इसी में देखता है कि वह समाज को अर्पित हो जाए। समाज से कटकर अकेला व्यक्ति चाहे कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो, उसका जीवन निष्फल हो जाता है। समाज के माध्यम से ही व्यक्ति को पहचान और उद्देश्य प्राप्त होता है।
प्रश्न 5.
‘यह मधु है ……… तकता निर्भय’ पंक्तियों के आधार पर बताइए कि ‘मधु’, ‘गोरस’ और ‘अंकुर’ की क्या विशेषता है?
उत्तर :
मधुमक्खी मधु का संचय बूँद-बूँद करके करती है और इसमें उसे दीर्घ समय लगता है, किंतु वह यह कार्य निरंतर और निःशब्द भाव से करती रहती है। इसी प्रकार कवि के गीतों की मधुरता उसके युगों से चले आ रहे सतत प्रयासों का संचित परिणाम है। जिस प्रकार कामधेनु अमृततुल्य पवित्र दूध प्रदान करती है, उसी प्रकार कवि भी समाज को अपने गीतों के रूप में जीवन-पोषक रस प्रदान करता है। और जैसे अंकुर निडर होकर धरती को भेदता हुआ सूर्य के प्रकाश की ओर बढ़ता है, वैसे ही कवि भी अपनी कल्पनाओं को गीतों में ढालकर निर्भयता से ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होता है।
प्रश्न 6.
भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) ‘यह प्रकृत, स्वयंभू ………………. शक्ति को दे दो।’
उत्तर :
कवि ने ‘अंकुर’ को प्रकृत, स्वयंभू और ब्रह्म के समान इसलिए माना है क्योंकि वह किसी बाहरी सहारे के बिना स्वयं धरती को चीरकर बाहर निकल आता है और निर्भय होकर सूर्य की ओर उन्मुख हो जाता है। इसी प्रकार कवि भी अपने भीतर से गीत की सृष्टि करता है और किसी भय या संकोच के बिना उसे स्वर देता है। इस आत्मस्फूर्त सृजनशीलता के कारण अंकुर और कवि—दोनों ही सम्मान के अधिकारी हैं।
(ख) ‘यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक ………….. चिर-अखंड अपनापा।’
उत्तर :
दीपक अग्नि को अपने भीतर धारण करता है और उसकी पीड़ा को भली-भाँति जानता है, फिर भी करुणा से प्रेरित होकर स्वयं जलते हुए दूसरों को प्रकाश प्रदान करता है। वह सदा सजग, जागरूक और प्रेमभाव से परिपूर्ण रहता है। ऊपर उठकर स्थिर रहते हुए वह मानो सबको अपने आलोक से आलिंगन करने के लिए बाँहें फैलाए खड़ा रहता है। इसी प्रकार कवि भी अपने जीवन के कष्ट स्वयं सहन कर समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनाने और उसका मार्ग प्रशस्त करने के लिए तत्पर रहता है।
(ग) ‘जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो।’
उत्तर :
यह दीपक निरंतर जानने की उत्कंठा से युक्त, ज्ञानवान और श्रद्धाभाव से संपन्न है; इसलिए इसे भक्ति अथवा समाज-रूपी देवता को अर्पित करने की बात कही गई है। उसी प्रकार कवि भी जिज्ञासु, सजग और श्रद्धावान होता है। अतः उसे भी समाज-कल्याण से जुड़े कार्यों में सक्रिय रूप से लगे रहने देना चाहिए, क्योंकि उसकी सृजनशीलता लोकहित का साधन बन सकती है।
प्रश्न 7.
‘बह दीप अकेला’ एक प्रयोगवादी कविता है। इस कविता के आधार पर ‘लघु मानव’ के अस्तित्व और महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
‘यह दीप अकेला’ कविता में कवि ने एक छोटे-से जलते हुए दीपक को ‘लघु मानव’ का प्रतीक माना है। जैसे छोटा-सा दीपक स्वयं जलकर अंधकार को दूर करता है और चारों ओर प्रकाश फैला देता है, उसी प्रकार लघु मानव भी समाज की एक छोटी-सी इकाई होते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसे तुच्छ या महत्वहीन नहीं समझा जा सकता। अपने कर्मों के माध्यम से वह समाज का व्यापक कल्याण कर सकता है। जिस प्रकार पनडुब्बा समुद्र की गहराइयों में जाकर मोती निकाल लाती है, उसी प्रकार लघु मानव भी समाज रूपी सागर में उतरकर लोकहित के बहुमूल्य कार्य कर सकता है। जैसे असंख्य बूँदों के मिलने से सागर का निर्माण होता है, वैसे ही अनेक लघु मानव मिलकर एक आदर्श और सशक्त समाज की रचना करते हैं। अतः समाज में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान महत्त्वपूर्ण है और उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता।
(ब ) मैंने देखा, एक बूँद,प्रश्न -उत्तर
प्रश्न 1.
‘सागर’ और ‘बूँद’ से कवि का क्या आशय है ?
उत्तर :
इस कविता में कवि ने ‘बूँद’ को मानव का और ‘सागर’ को समग्र जगत का प्रतीक माना है। इसके माध्यम से वह यह प्रतिपादित करता है कि यदि मनुष्य संसार-रूपी सागर से बूँद की भाँति अलग होकर मूलधारा से कट जाता है, तो उसका अस्तित्व तुच्छ और उपेक्षणीय बन जाता है। किंतु यदि वही बूँद अपने अखंड व्यक्तित्व के साथ विराट चेतना के आलोक से रंग जाती है, तो वह नश्वरता के बंधनों को तोड़कर अमरता को प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार कवि व्यक्ति और समष्टि के तादात्म्य को जीवन की सार्थकता का आधार मानता है।
प्रश्न 2.
‘रंग गई क्षणभर, बलते सूरज की आग से’ पंक्ति के आधार पर बूँद के क्षणभर रैंगने की सार्थकता बताइए।
उत्तर :
समुद्र की झाग से असंख्य जल-बूँदें उछलकर अलग हो जाती हैं और फिर बिना किसी विशेष पहचान के उसी जलराशि में विलीन हो जाती हैं। उनके इस आने-जाने पर सामान्यतः किसी का ध्यान नहीं जाता। किंतु जब झाग से अलग हुई एक बूँद पर संध्याकालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणें पड़ती हैं, तो वह बूँद भी क्षणभर के लिए स्वर्णिम होकर झिलमिलाने लगती है और अत्यंत आकर्षक प्रतीत होती है। यही क्षणिक स्वर्णिमता उस बूँद को अन्य बूँदों से अलग पहचान दिलाती है और उसके अस्तित्व को अर्थवत्ता प्रदान कर देती है। उस एक क्षण में उसकी आभा सभी को मुग्ध कर देती है—और यही उसका जीवन-सार्थक क्षण बन जाता है।
प्रश्न 3.
‘सूने बिराट के समुख ……… दाग से।’ पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि विचार करता है कि विराट सत्ता या परम तत्त्व स्वयं में निराकार और शून्य-सा प्रतीत होता है, किंतु जब मानव अपने जीवन के किसी क्षण में स्वयं को उस विराट के प्रति समर्पित कर देता है, तब वही विराट चेतना उसे अपने आलोक से रंग देती है। उस क्षण मानव-जीवन बूँद की भाँति स्वर्णिम हो उठता है और नश्वरता की सीमा लाँघकर अमरत्व को स्पर्श कर लेता है। इस प्रकार कवि निष्कर्ष निकालता है कि मानव-जीवन के वही क्षण वास्तव में सार्थक होते हैं, जो विराट चेतना के प्रकाश से आलोकित हो जाते हैं।
प्रश्न 4.
क्षण के महत्त्व को उजागर करते हुए कविता का मूल भाव लिखिए।
उत्तर :
अज्ञेय ने अपने काव्य में ‘क्षण’ को विशेष महत्त्व प्रदान किया है। उनके अनुसार जीवन की सफलता और असफलता किसी दीर्घकालिक अवधि पर नहीं, बल्कि विशिष्ट क्षणों पर निर्भर करती है। वे उन क्षणों को गरिमामय मानते हैं जो मानव जीवन को गति, चेतना और अर्थ प्रदान करते हैं। उनके मत में ‘अस्तित्व का एक सजीव क्षण सत्य के साक्षात्कार का ऐसा अनुपम अवसर होता है, जिसमें मनुष्य स्वयं को पूर्णतः भूलकर उसी में लीन हो जाता है।’ इसी कारण वे दीर्घ आयु की अपेक्षा एक क्षण को पूर्ण आनंद और चेतना के साथ जीना अधिक मूल्यवान मानते हैं।
‘मैंने देखा, एक बूँद’ कविता में भी कवि ने इसी क्षण-विशेष के चमत्कार को प्रस्तुत किया है। सागर की लहरों से अलग हुई एक बूँद पर जब संध्याकालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणें क्षणभर के लिए पड़ती हैं, तो वह भी स्वर्णिम हो उठती है—हालाँकि यह रूपांतरण केवल एक क्षण के लिए होता है। इसी प्रकार मानव जीवन में भी कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो उसे सुखानुभूति में डुबोकर उसके जीवन को उज्ज्वल और स्मरणीय बना देते हैं। कवि का निष्कर्ष यह है कि सामान्यतः समष्टि-धारा से अलग होना व्यक्ति को नगण्य बना देता है, किंतु यदि उसके व्यक्तित्व को विराट चेतना अपने आलोक की एक बूँद से स्पर्श कर दे, तो वही व्यक्ति कालजयी और अमर बन जाता है।
भाग – “स” : परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1.
कवि ने दीपक के माध्यम से किन-किन विशेषताओं का चित्रण किया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि के अनुसार दीपक अडिग विश्वास और आस्था का प्रतीक है। आकार में छोटा होने पर भी वह कभी विचलित या भयभीत नहीं होता। उसमें आत्मबल और धैर्य का अद्भुत सामंजस्य है। दीपक अपने भीतर धारण की गई अग्नि की पीड़ा को स्वयं ही अनुभव करता है—अर्थात अपने कष्टों का वास्तविक बोध वही कर सकता है।
यह दीपक निंदा, उपेक्षा, अपमान और अंधकार से भरे वातावरण में भी निरंतर जलता रहता है। वह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, जो उसकी करुणा, त्याग और परोपकार की भावना को दर्शाता है। दीपक सदैव जागरूक, सावधान और प्रेमपूर्ण दृष्टि से संसार को देखने वाला है। वह स्थिर भाव से ऊपर उठी भुजाओं की भाँति विश्वास और श्रद्धा को धारण किए रहता है। उसमें ज्ञान पाने की उत्कंठा, जिज्ञासा और श्रद्धा का भाव निरंतर विद्यमान रहता है। इस प्रकार दीपक दृढ़ निष्ठा, साहस, करुणा और आत्मबल का सशक्त प्रतीक बन जाता है।
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प्रश्न 2.
कवि अपनी व्यष्टि (व्यक्तित्व) को सुरक्षित रखते हुए समष्टि (समाज) के प्रति किस प्रकार समर्पित होना चाहता है?
उत्तर :
कवि का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट पहचान और गुणों के साथ जन्म लेता है। वह समाज से बहुत कुछ ग्रहण करता है, इसलिए बदले में समाज को कुछ देना भी उसका दायित्व है। कवि समाज से जुड़ना चाहता है, किंतु अपनी आस्था, विश्वास और आत्मसम्मान को खोकर नहीं।
दीपक के प्रतीक के माध्यम से कवि अपनी काव्य-दृष्टि स्पष्ट करता है। उसे अपनी कविता और अनुभूति पर अटूट विश्वास है, इसलिए वह आलोचकों की निंदा, उपेक्षा या अपमान से कभी विचलित नहीं होता। उसके काव्य में निहित पीड़ा की गहराई को उसकी कविता स्वयं अभिव्यक्त करती है। उसने जीवन में अनेक कष्ट सहे, तिरस्कार और उपेक्षा का सामना किया, फिर भी उसके काव्य-सृजन की निरंतरता और संवेदनशीलता में कोई कमी नहीं आई।
कवि समाज के कल्याण के लिए लिखता है, किंतु वह ऐसा करते हुए अपने स्वाभिमान और आत्मगौरव से समझौता नहीं करना चाहता। इस प्रकार वह समष्टि के प्रति समर्पण और व्यष्टि की रक्षा—दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता है।
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प्रश्न 3.
कवि के समाज संबंधी विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि का विचार है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितनी ही संवेदनशीलता और कल्याणकारी भावनाओं से युक्त क्यों न हो, समाज से कटकर सार्थक नहीं हो सकता। व्यक्ति की प्रतिभा और सृजनशीलता का वास्तविक विकास समाज के भीतर ही संभव है।
कवि स्वयं को समाज-रूपी सागर में उतरने वाला गोताखोर मानता है, जो गहराइयों से श्रेष्ठ मोती—अर्थात मूल्यवान विचार और रचनाएँ—निकालकर समाज को समृद्ध करता है। यदि समाज कवि को उचित सम्मान और स्थान नहीं देगा, तो चेतना, जागरण और क्रांति की अग्नि प्रज्वलित करने वाला कौन होगा? कवि समिधा की भाँति स्वयं की आहुति देकर समाज में चेतना का यज्ञ रचता है।
कवि का आग्रह है कि समाज उसे अन्य कवियों की पंक्ति में स्थान दे, ताकि उसकी प्रतिभा और अस्तित्व को पहचाना जा सके। समाज यदि कवि का सम्मान करेगा, तभी कवि अपनी संपूर्ण क्षमता के साथ समाज के कल्याण में योगदान दे सकेगा।
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प्रश्न 4.
कवि अपने काव्य की रचना किस प्रकार करता है?
उत्तर :
कवि अपने काव्य-सृजन में दीपक के समान एकाकी रहकर भी निरंतर जलता रहता है। वह मानवीय प्रेम, संवेदना और आत्मानुभूति में डूबकर कविता की रचना करता है। उसकी सृजन-प्रक्रिया आत्ममंथन और गहन अनुभूति से जन्म लेती है।
कवि गोताखोर की भाँति हृदय और जीवन की गहराइयों में उतरकर श्रेष्ठ कविता-रूपी मोती निकाल लाता है। वह भावपूर्ण और अर्थगर्भित गीतों की रचना करता है, जो समाज को दिशा और संवेदना प्रदान करते हैं। कवि स्वयं को समिधा के समान मानता है, जो काव्य-यज्ञ में अपनी आहुति देकर रचना की अग्नि को प्रज्वलित करता है।
कवि अनुपम और अद्वितीय होता है। वह अन्य कवियों से पृथक नहीं, बल्कि कवि-परंपरा का ही एक जाग्रत स्वर है, जो स्वयं को काव्य-देवता को समर्पित कर समाज के लिए सृजन करता है।
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प्रश्न 5.
*आत्मा के पक्ष में* कविता के भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कविता में आत्मा को दीपक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो एकाकी होते हुए भी निरंतर प्रकाशमान है। यह आत्मा ईश्वर-प्रेम से परिपूर्ण है और प्रभु की कृपा एवं सान्निध्य पर गर्व अनुभव करती है। प्रभु-प्रेम में डूबी हुई यह आत्मा मदमस्त अवस्था में रहती है, किंतु उसका सौंदर्य तभी पूर्ण होता है जब उसे भक्तों की पंक्ति में स्थान मिलता है।
कवि का भाव है कि यदि भक्त-आत्मा प्रभु के गुणगान के गीत न गाए, तो कोई अन्य यह कार्य नहीं कर सकता। आत्मा अपने हृदय की गहराइयों में प्रभु को उसी प्रकार खोज लेती है, जैसे गोताखोर समुद्र की अतल गहराइयों से मोती निकाल लाता है। यह सामर्थ्य केवल आत्मा में ही निहित है।
आत्मा समिधा के समान स्वयं की आहुति देकर यज्ञ की भाँति प्रभु-भक्ति की अग्नि को प्रज्वलित करती है। अंततः आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं रह जाता—आत्मा प्रभु से अभिन्न होकर उसी का रूप बन जाती है और स्वयं को उसी में समर्पित कर देती है।
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प्रश्न 6.
‘मैंने देखा, एक बूँद’ कविता में कवि ने सत्यता के दर्शन किस प्रकार किए हैं?
उत्तर :
‘मैंने देखा, एक बूँद’ कविता में कवि ने आत्मबोध के माध्यम से सत्य के दर्शन किए हैं। कवि का मानना है कि मानव के भीतर ही परमसत्ता का अंश विद्यमान है और उसी विराट सत्य की एक झलक जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त होती है।
कवि प्रतीक के रूप में सागर की लहरों से छिटकी जल की एक छोटी-सी बूँद को प्रस्तुत करता है, जो संध्याकालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणों के स्पर्श से आलोकित होकर प्रभामय हो जाती है। उस क्षण वह बूँद नश्वर होते हुए भी अमरत्व का अनुभव कर लेती है। इसी प्रकार आत्मज्ञान के क्षण में मनुष्य भी नश्वरता से ऊपर उठकर सत्य और अमरत्व का साक्षात्कार करता है।
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प्रश्न 7.
कवि ने दीपक के माध्यम से किन-किन रूपकों का प्रयोग किया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि ने दीपक के माध्यम से बहुआयामी रूपकों का सफल निर्वाह किया है। दीपक को कभी व्यक्ति, कभी आत्मा और कभी स्वयं कवि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। व्यक्ति दीपक के समान प्रेम, सौंदर्य और यौवन से युक्त होता है, किंतु उसे समाज का अंग बनकर रहना आवश्यक है, क्योंकि सामाजिक जीवन में ही व्यक्ति और समाज—दोनों का महत्व बढ़ता है।
आत्मा भी दीपक के समान एकाकी होकर प्रभु-प्रेम और भक्ति से आलोकित रहती है। उसका वास्तविक सौंदर्य तभी प्रकट होता है जब वह भक्तों की पंक्ति में सम्मिलित होकर सामूहिक भक्ति का अंग बनती है।
कवि स्वयं को भी दीपक के रूप में देखता है—जो संसार से अलग अपनी काव्य-साधना में लीन रहता है, किंतु अंततः उसे भी समाज-रूपी माला का एक पुष्प बन जाना चाहिए। इन सभी रूपकों के माध्यम से कवि ने व्यक्ति, आत्मा और समाज के पारस्परिक संबंधों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है।
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