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12 cbse-hindi-antara- Chapter 2- saroj smriti-sooryakant Tripathi nirala – ‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला- कविता का मूल भावार्थ – बहु विकल्पीय प्रश्न -(MCQ )

February 1, 2026
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12 cbse-hindi-antara- Chapter 2- saroj smriti-sooryakant Tripathi nirala – ‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला- कविता का मूल भावार्थ – बहु विकल्पीय प्रश्न -(MCQ )

कविता का भावार्थ

cbse board परीक्षा में  hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board  द्वारा निर्धारित hindi book  (antara) का अध्ययन करनेवाले शिक्षार्थियों !

12 cbse/hindi/antara/ Chapter 2- saroj smriti-sooryakant Tripathi nirala ( ‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन ( कविता का मूल ,काव्यांश का भावार्थ ,काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न -(MCQ )आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .

इस भाग में 12 cbse/hindi/antara/ Chapter 2- saroj smriti-sooryakant Tripathi nirala ( ‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’) केअंतर्गत कविता का मूल भाव ,व्याख्या तथा काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है .

‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला- 

काव्यांश को तीन भागों में बांटा गया है –(अ)(ब)(स),

अ -भाग में कविता का मूल भाव दिया गया है

ब -भाग में काव्यांश का भावार्थ -व्याख्या दी गई है .

स-भाग में काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है

यहाँ पर काव्य खंड के Chapter 2- saroj smriti-sooryakant Tripathi nirala

( ‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)  के  Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) इस प्रकार से तैयार किये गए है जो परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं  , तीनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.

‘सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’-कविता का प्रतिपाद्य

सरोज स्मृति’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक एवं आत्मकथात्मक शोक-काव्य है, जिसे कवि ने अपनी पुत्री सरोज के असामयिक निधन के पश्चात उसकी स्मृति में लिखा। यह कविता पिता के हृदय में उमड़ते गहन दुःख, आत्मपीड़ा और स्मृतियों के भावनात्मक प्रवाह को सशक्त रूप में व्यक्त करती है। इस दीर्घ कविता में कवि ने सरोज के बचपन से लेकर उसके विवाह और अंततः उसकी मृत्यु तक की घटनाओं को करुण स्वर प्रदान किया है। पाठ्यक्रम में विशेष रूप से सरोज के विवाह तथा उसके बाद घटित दुःखद प्रसंगों का चित्रण किया गया है।

कवि सरोज के विवाह को परंपरागत विवाह से भिन्न, एक नए और पवित्र संस्कार के रूप में देखता है। विवाह के अवसर पर उस पर कलश का पावन जल छिड़का गया और वह मंद-मंद मुस्कान के साथ अपने पिता की ओर निहार रही थी। उस क्षण वह अपने भावी दांपत्य जीवन की सुखद कल्पनाओं में डूबी हुई, अत्यंत प्रसन्न और खिलते हुए रूप में प्रतीत होती है। पुत्री के इस रूप को देखकर कवि को अपनी पत्नी की स्मृति हो आती है, जिससे उसका हृदय और अधिक भावुक हो उठता है।

सरोज के विवाह में कवि का कोई निकट संबंधी उपस्थित नहीं था। ऐसे में कवि स्वयं ही विदाई के समय माँ के समान उसे जीवन की शिक्षा और संस्कार प्रदान करता है। विवाह के कुछ समय बाद सरोज ससुराल से अपने ननिहाल जाती है, जहाँ वह असमय मृत्यु का शिकार हो जाती है। सरोज कवि के लिए अपने जैसे भाग्यहीन व्यक्ति का एकमात्र सहारा थी; उसके निधन से कवि का जीवन पूर्णतः सूना हो जाता है।

पुत्री की मृत्यु के दो वर्ष पश्चात भी कवि उसकी स्मृति से व्यथित होकर यह कविता रचता है। वह अपने पूर्व जन्मों के समस्त पुण्य कर्मों का फल सरोज को समर्पित कर, उसी के माध्यम से उसका तर्पण करता हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार ‘सरोज स्मृति’ पिता-पुत्री के गहन स्नेह, वियोग और करुणा से भरा ऐसा काव्य है, जो पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है और मानवीय संवेदनाओं की चरम अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है।

सरोज स्मृति – सप्रसंग व्याख्या

1.

देखा वियाह आमूल नवल,

तुझपर शुभ पड़ा कलश का जल।

देखती मुझे तू हैसी मंद,

होठों में बिजली फैसी स्पंद

उर में भर झूली छधि सुंदर

प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर

तू खुली एक-उच्घ्वास-संग,

विश्वास-स्तब्ध बैंध अंग-अंग

नत नयनों से आलोक उतर

काँपा अधरों पर धर-धर-धर।

देखा मैने, वह मूर्ति-धीति

मेरे वसंत की प्रथम गीति

काव्य भाग – “ब”

**प्रसंग :**

प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित शोकगीत *‘सरोज स्मृति’* से उद्धृत हैं। इस कविता में कवि ने अपनी प्रिय पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु के पश्चात उससे जुड़ी स्मृतियों को अत्यंत करुण और आत्मीय भाव से व्यक्त किया है। कवि सरोज के विवाह-संस्कार का स्मरण करते हुए अतीत के सुखद क्षणों को वर्तमान के गहन शोक से जोड़ देता है।

**व्याख्या –

इन पंक्तियों में कवि अपनी पुत्री सरोज के विवाह-प्रसंग को स्मरण करते हुए उसे सीधे संबोधित करता है। वह कहता है कि उसके विवाह में आए हुए लोगों ने एक नवीन विधि-विधान से संपन्न होने वाला अनोखा विवाह देखा। विवाह के समय सरोज पर कलश का पवित्र जल छिड़का गया था। उस क्षण वह मंद-मंद मुस्कान के साथ अपने पिता की ओर देख रही थी और उसके अधरों पर विद्युत-तरंगों के समान चंचल हँसी दौड़ गई थी।

कवि अनुभव करता है कि सरोज के हृदय में अपने भावी जीवनसाथी की सुंदर छवि झूल रही थी और उसका दांपत्य भाव स्वाभाविक रूप से मुखर हो उठा था। एक गहरी, लंबी साँस लेकर वह मानो पूर्ण रूप से खिल उठी थी। उसके शरीर के प्रत्येक अंग में भविष्य के प्रति अटूट विश्वास और आशा की झलक दिखाई दे रही थी। उसके झुके हुए नेत्रों से उतरता हुआ प्रकाश उसके होंठों पर थरथराने लगता था।

उस समय सरोज शारीरिक और मानसिक—दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत प्रसन्न और संतुलित प्रतीत हो रही थी। उसकी धैर्यपूर्ण, सौम्य और गंभीर आकृति को देखकर कवि को ऐसा लगा मानो वह उसकी स्वयं की युवावस्था का प्रथम गीत हो। दुल्हन के रूप में सजी अपनी पुत्री को देखकर कवि का मन अतीत में लौट जाता है और उसके अपने यौवनकाल की स्मृतियाँ जाग उठती हैं। यह स्मरण वर्तमान के शोक को और भी मार्मिक बना देता है।

विशेष –

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावानुकूल एवं प्रवाहमयी है।

* अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, पुनरुक्ति-प्रकाश एवं स्मरण अलंकारों का सशक्त प्रयोग हुआ है।

* वर्णनात्मक शैली में सात्त्विक अनुभावों का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है।

* कविता मुक्त छंद में रचित है।

* स्मृति-बिंब के माध्यम से कवि का निजी शोक गहन संवेदनशीलता के साथ उभरकर सामने आता है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** ‘सरोज स्मृति’ कविता का मूल भाव क्या है?

(क) उत्सव और उल्लास

(ख) वीरता

(ग) स्मृति और शोक

(घ) सामाजिक सुधार

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** सरोज के विवाह के समय कवि ने उसके चेहरे पर किस भाव को देखा?

(क) भय

(ख) संकोच

(ग) विद्युत-सी चंचल हँसी

(घ) उदासी

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** ‘हृदय में पति की छवि झूलना’ किस भाव को प्रकट करता है?

(क) बाल्यावस्था

(ख) दांपत्य भाव

(ग) विरक्ति

(घ) संघर्ष

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** कवि ने सरोज को अपनी युवावस्था का ‘प्रथम गीत’ क्यों कहा है?

(क) उसकी गायन-प्रतिभा के कारण

(ख) उसके सौंदर्य के कारण

(ग) पुत्री में अपने अतीत की अनुभूति होने के कारण

(घ) उसके साहस के कारण

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश की काव्य-रचना किस छंद में है?

(क) दोहा

(ख) चौपाई

(ग) मुक्त छंद

(घ) सवैया

**सही उत्तर :** (ग)

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ‘सरोज स्मृति’-व्याख्या –

2.

शृंगार, रहा जो निराकार,

रस कविता में उच्छ्वसित-धार

गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग-

भरता प्राणों में राग-रेग,

रति-रूप प्राप्त कर रहा बही,

आकाश बदल कर बना माीी।

हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन,

कोई थे नहीं, न आमंत्रण

था भेजा गया, विवाहु-राग

भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;

प्रिय मौन एक संगीत भरा

नव जीवन के स्वर पर उतरा।

काव्य भाग – “ब”

**प्रसंग :**

प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित प्रसिद्ध शोकगीत *‘सरोज स्मृति’* से ली गई हैं। इस कविता में कवि अपनी प्रिय पुत्री सरोज की मृत्यु के पश्चात उसके जीवन से जुड़े प्रसंगों को स्मरण करते हुए अपने हृदय की करुण अनुभूतियों को व्यक्त करता है। यहाँ कवि सरोज के विवाह-प्रसंग को याद कर उसके प्रति अपने आत्मीय भाव प्रकट करता है।

**व्याख्या –

इन पंक्तियों में कवि अपनी पुत्री सरोज को उसके विवाह के समय दुल्हन के रूप में देखने से उत्पन्न भावों को उससे साझा करता है। वह कहता है कि सरोज के दुल्हन रूप में उसने जिस अलौकिक शृंगार का दर्शन किया, वह भले ही भौतिक रूप से आकारहीन था, किंतु उसके काव्य में रस की उमड़ती हुई धारा के समान प्रकट हो उठा। उस क्षण उसे वही मधुर संगीत सुनाई दे रहा था, जिसे उसने कभी अपनी स्वर्गवासी पत्नी के साथ गाया था। वही संगीत आज भी उसके प्राणों में आनंद का संचार कर रहा है।

कवि अनुभव करता है कि सरोज के रूप में उसकी वही पुरानी शृंगार-भावना पुनः जीवंत हो उठी थी। उस दिन उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो आकाश ने अपनी ऊँचाई का अभिमान त्यागकर धरती से एकाकार होने का भाव स्वीकार कर लिया हो। संपूर्ण प्रकृति उसे दांपत्य-भाव से परिपूर्ण दिखाई देने लगी।

कवि आगे कहता है कि सरोज का विवाह अत्यंत सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। उसमें न तो सगे-संबंधियों का जमावड़ा था, न ही किसी को औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था। न घर में विवाह-गीत गाए गए, न ही दिन-रात का जागरण हुआ। सामान्य विवाहों में जो आडंबर और उत्सव दिखाई देते हैं, वे सब सरोज के विवाह में अनुपस्थित थे। इसके स्थान पर एक मौन संगीत था, जो जीवन में उतरकर सरोज के नवजीवन में प्रवेश कर उसे भीतर से आनंदित कर रहा था। यह मौन ही उस विवाह की सबसे बड़ी गरिमा और सौंदर्य था।

विशेष –

* कवि ने सरोज के विवाह को बिना किसी आडंबर के अत्यंत सादगी से संपन्न किया।

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण एवं प्रवाहमयी है।

* अनुप्रास, स्मरण एवं उत्प्रेक्षा अलंकारों का सहज और प्रभावी प्रयोग हुआ है।

* वर्णनात्मक शैली में रचित यह काव्य मुक्त छंद का सुंदर उदाहरण है।

* स्मृति यहाँ **संचारी भाव** के रूप में संपूर्ण कविता में व्याप्त है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** सरोज के दुल्हन रूप को देखकर कवि के काव्य में क्या प्रकट हुआ?

(क) विरक्ति

(ख) रस की उमड़ती धारा

(ग) करुण विलाप

(घ) सामाजिक चेतना

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 2.** कवि को सरोज के विवाह के समय कौन-सा संगीत स्मरण हो आया?

(क) लोकगीत

(ख) विवाह-गीत

(ग) पत्नी के साथ गाया गया संगीत

(घ) मंदिर का भजन

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** ‘आकाश का धरती से एकाकार होना’ किस भाव को व्यक्त करता है?

(क) प्रकृति का क्रोध

(ख) शृंगार और दांपत्य भाव

(ग) भय का वातावरण

(घ) संघर्ष की भावना

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** सरोज के विवाह की प्रमुख विशेषता क्या थी?

(क) भव्य आडंबर

(ख) सामाजिक उत्सव

(ग) अत्यंत सादगी और मौन

(घ) लोकपरंपराओं का प्रदर्शन

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** ‘मौन संगीत’ से कवि क्या अभिप्रेत करता है?

(क) शोक का भाव

(ख) बाहरी उत्सव का अभाव

(ग) आंतरिक आनंद और आत्मिक शांति

(घ) सामाजिक उपेक्षा

**सही उत्तर :** (ग)

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ *‘सरोज स्मृति’*-व्याख्या –

3.

माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,

पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,

सोचा मन में, “वह शकुंतला,

पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।”

कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद,

बैठी नानी की स्नेह-गोद।

मामा-मामी का रहा प्यार,

भर जलद धरा को ज्यों अपार;

वे ही सुख-दुःख में रहे न्यस्त,

तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;

वह लता वहीं की, जहाँ कली

तू खिली, स्नेह से हिली, पली,

अंत भी उसी गोद में शरण

ली, मूँदे दृग वर महामरण !

**प्रसंग :**

प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित करुण शोकगीत *‘सरोज स्मृति’* से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने अपनी प्रिय पुत्री सरोज की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत अपने हृदय में व्याप्त असह्य वेदना, स्मृतियों और आत्मग्लानि को अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत अंश में कवि सरोज के विवाह, विदाई, ननिहाल में बिताए गए सुखद क्षणों तथा अंततः वहीं उसके जीवन-समापन का करुण चित्र प्रस्तुत करता है।

**व्याख्या –

इन पंक्तियों में कवि अपनी पुत्री सरोज को संबोधित करते हुए कहता है कि विदाई के समय उसने उसे वही शिक्षा दी थी, जो सामान्यतः एक माँ अपनी बेटी को देती है। माँ के अभाव में कवि ने स्वयं उस दायित्व का निर्वाह किया। उसने अपने ही हाथों से पुष्पों से उसकी शय्या सजाई और एक माता की तरह उसे जीवन की मर्यादाएँ सिखाईं। उस क्षण कवि के मन में यह भाव भी आया कि वह अपनी पुत्री को शकुंतला के समान विदा कर रहा है, जैसे महर्षि कण्व ने अपनी पाल्य-पुत्री को विदा किया था; किंतु वह यह भी स्वीकार करता है कि सरोज की शिक्षा और जीवन-पथ शकुंतला से भिन्न था।

कवि आगे कहता है कि विवाह के पश्चात कुछ समय तक सरोज अपने गृह में सुखपूर्वक रही और फिर अपनी नानी की स्नेहमयी गोद में जाकर रहने लगी। वहाँ उसके मामा और मामी का अपार स्नेह उसे प्राप्त हुआ। उनका प्रेम ऐसा था जैसे घनघोर बादल पृथ्वी पर जल-वर्षा कर उसे रस से भर देते हैं। वे ही उसके सुख-दुख के सहभागी बने और सदा उसके हित के लिए तत्पर रहे।

कवि स्पष्ट करता है कि सरोज उसी लता की कली थी, जहाँ वह पली-बढ़ी थी, अर्थात उसकी माता भी उसी ननिहाल की संतान थी। इसी कारण वहाँ का वातावरण उसके लिए पूर्णतः आत्मीय और सुरक्षित था। सरोज बचपन से उसी स्नेहमयी गोद में पली, वहीं हिल-मिलकर बड़ी हुई और अंततः जीवन की अंतिम घड़ी में भी उसी गोद में शरण पाई। अपने नेत्र मूँदकर उसने उसी स्नेहाच्छादित परिवेश में मृत्यु का आलिंगन कर लिया। यह दृश्य कवि के लिए अत्यंत करुण, पीड़ादायक और असहनीय स्मृति बन जाता है।

विशेष –

* पुत्री की विदाई से लेकर उसके ननिहाल में जीवन-समापन तक का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण, प्रवाहमयी तथा प्रसंगानुकूल है।

* अनुप्रास एवं उदाहरण अलंकार का सजीव प्रयोग हुआ है।

* रचना मुक्त छंद में है तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

* प्रतीकात्मकता और स्मृति-भाव कविता की करुणा को और गहन बनाते हैं।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** कवि ने विदाई के समय सरोज को किसकी भूमिका में शिक्षा दी?

(क) पिता की

(ख) गुरु की

(ग) माँ की

(घ) मित्र की

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** कवि ने सरोज की विदाई की तुलना किस पात्र से की है?

(क) सीता

(ख) उर्मिला

(ग) शकुंतला

(घ) सावित्री

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** मामा-मामी का स्नेह किस उपमा द्वारा व्यक्त किया गया है?

(क) दीपक और लौ

(ख) पुष्प और पराग

(ग) बादल और वर्षा

(घ) नदी और सागर

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** सरोज ने जीवन की अंतिम शरण कहाँ प्राप्त की?

(क) ससुराल में

(ख) अपने गृह में

(ग) ननिहाल की गोद में

(घ) एकांत वन में

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश का प्रमुख भाव क्या है?

(क) शृंगार

(ख) वीरता

(ग) करुणा और शोक

(घ) हास्य

**सही उत्तर :** (ग)

…………………………………………….

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ *‘सरोज स्मृति’*-व्याख्या –

4.

मुझ भाग्यहीन की तू संबल

युग वर्ष बाद जब हुई विकल,

दुख ही जीवन की कथा रही

क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।

हो इसी कर्म पर वज्रपात

यदि धर्म, रहे नत सदा माथ

इस पथ पर, मेंरे कार्य सकल

हों भषष्ट शीत के-से शतदल!

कन्ये, गत कर्मों का अर्पण

कर, करता में तेरा तर्पण!

## **काव्य भाग – “ब”**

**प्रसंग :**

प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित शोकगीत *‘सरोज स्मृति’* से ली गई हैं। इस कविता में कवि अपनी पुत्री सरोज के आकस्मिक निधन के पश्चात उसके प्रति अपने हृदय में उमड़ते हुए शोक, आत्मवेदना और दैन्य भाव को अभिव्यक्त करता है। प्रस्तुत अंश में कवि जीवन के संघर्षों, नियति के आघातों और पुत्री-वियोग की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रकट करता है।

**व्याख्या –

कवि अपनी पुत्री सरोज को संबोधित करते हुए कहता है कि इस संसार में वही उसके जीवन का एकमात्र सहारा थी। उसके निधन के दो वर्ष बीत जाने के बाद भी उसकी स्मृति उसे निरंतर व्याकुल करती रहती है। वह स्वीकार करता है कि उसका संपूर्ण जीवन दुखों और विपत्तियों से भरा रहा है। यह वेदना उसने आज तक किसी के सामने प्रकट नहीं की थी, किंतु आज पुत्री की स्मृति में उसे व्यक्त कर रहा है।

कवि आगे कहता है कि यदि उसके धर्म-पथ पर चलते हुए उसके समस्त कर्मों पर भी विपत्तियों की बिजली गिर पड़े, तब भी वह विनम्रतापूर्वक उसे सहन करेगा। यदि इस जीवन-यात्रा में उसके सभी सत्कर्म शिशिर ऋतु में मुरझा जाने वाले पुष्पों की भाँति निष्फल हो जाएँ और उसे यश अथवा सम्मान प्राप्त न हो, तब भी उसे कोई संताप नहीं होगा। उसका आशय यह है कि यश-अपयश से परे रहकर वह जीवन के कष्टों को सहर्ष स्वीकार करने को तैयार है।

अंत में कवि अपनी पुत्री से कहता है कि वह अपने पूर्व जन्मों के संचित पुण्य कर्मों के समस्त फल उसे समर्पित कर रहा है। उसी भाव से वह उसका तर्पण करता है और श्राद्ध रूप में जलांजलि अर्पित करता है। यह कृत्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पिता के हृदय से निकली हुई करुण श्रद्धांजलि है, जिसमें आत्मसमर्पण और शोक की चरम अभिव्यक्ति निहित है।

विशेष –

* इन पंक्तियों में कवि का गहन दैन्य भाव और जीवन की संपूर्ण वेदना मुखरित हुई है।

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण एवं प्रवाहमयी है।

* अनुप्रास एवं उपमा अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

* रचना मुक्त छंद में है तथा खड़ी बोली का सुंदर प्रयोग किया गया है।

* कविता में शोक, त्याग और आत्मसमर्पण का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है।

(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** कवि के अनुसार उसके जीवन का एकमात्र सहारा कौन था?

(क) धर्म

(ख) समाज

(ग) उसकी पुत्री सरोज

(घ) काव्य

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** कवि अपने जीवन को किस रूप में देखता है?

(क) संघर्ष की विजय-कथा

(ख) सुख-संपन्न जीवन

(ग) दुखों से भरी कथा

(घ) आदर्श जीवन

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** ‘बिजली टूट पड़ना’ किस भाव का प्रतीक है?

(क) प्राकृतिक सौंदर्य

(ख) आकस्मिक विपत्तियाँ

(ग) उत्सव

(घ) क्रोध

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** शिशिर ऋतु में मुरझाने वाले पुष्प किसका प्रतीक हैं?

(क) स्थायी सफलता

(ख) क्षणिक सुख

(ग) निष्फल सत्कर्म

(घ) नवीन आशा

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** कवि पुत्री को जलांजलि किस भाव से अर्पित करता है?

(क) औपचारिक धार्मिक कर्तव्य के रूप में

(ख) सामाजिक दबाव में

(ग) करुण श्रद्धा और आत्मसमर्पण के भाव से

(घ) लोक-परंपरा के कारण

**सही उत्तर :** (ग)

 

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