12 cbse/hindi/antara/ Chapter 1- dev sena ka geet/karnelia ka geet /jay shaker prasad/ Question Answer/ देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत-जय शंकर प्रसाद
Chapter 1 देवसेना का गीत, –जय शंकर प्रसाद,प्रश्न-उत्तर
प्रिय शिक्षार्थियों ,
12 cbse board परीक्षा में hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board द्वारा निर्धारित hindi book (antara) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .
प्रश्न -उत्तर को दो भागों में बांटा गया है .पहले भाग में पाठ के अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए है तथा दूसरे भाग में परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दिए गए है .,यहाँ पर काव्य खंड के chapter-1 dev sena ka geet (देवसेना का गीत )-jay shaker prasad (जय शंकर प्रसाद ) के Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) दिए गए . दोनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.
प्रश्न 1.
“मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई ” – पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1-इस पंक्ति के माध्यम से देवसेना अपने अतीत की ओर दृष्टि डालते हुए आत्ममंथन करती है। वह स्वीकार करती है कि उसने जीवनभर अपने हृदय में कोमल भावनाओं और स्नेहपूर्ण कल्पनाओं को सँजोकर रखा, किंतु यह सब उसकी भूल सिद्ध हुई। जिस व्यक्ति को उसने उसके आगमन पर ही लौटा दिया, उसके लिए मन में मधुर स्वप्न रचना निरर्थक था। परिणामस्वरूप, उसे अंततः अपने संचित भावों को भिक्षा की भाँति लुटाना पड़ा। वह अपने जीवनभर की भावनात्मक पूँजी को सुरक्षित नहीं रख सकी और विवश होकर उसे त्याग देना पड़ा—यह उसके आंतरिक विघटन और आत्मिक पराजय का संकेत है।
प्रश्न 2.
कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
उत्तर :
2-कवि ने ‘आशा’ को ‘बावली’ इसलिए कहा है क्योंकि मनुष्य जीवन में असंख्य अपेक्षाएँ पालता रहता है—वह सोचता है कि आज नहीं तो कल, एक दिन उसकी अभिलाषाएँ अवश्य पूरी होंगी। किंतु वास्तविकता यह है कि उसकी अधिकांश आशाएँ या तो अधूरी रह जाती हैं या कभी साकार ही नहीं होतीं। बार-बार निराश होने के बावजूद मनुष्य आशा का दामन नहीं छोड़ता और उसी के सहारे जीता रहता है। इसी निरंतर, तर्कहीन और अडिग प्रतीक्षा के कारण आशा को ‘बावली’ कहा गया है। देवसेना ने भी अनेक स्वप्न देखे थे, किंतु उसके जीवन में भी कोई आशा पूर्ण न हो सकी। प्रश्न 3.
“मैंने निज दुर्बल ‘मैंने निज दुर्बल ……. होड़ लगाई” इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘हारी होड़’ में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
3-देवसेना का संपूर्ण जीवन विसंगतियों और त्रासदियों से घिरा रहा है। उसके भाई का पूरा परिवार हूणों के अत्याचार का शिकार हो गया, जिससे वह पूर्णतः अकेली पड़ गई। इसके बावजूद उसने स्वयं को राष्ट्र-सेवा में समर्पित कर दिया और इस उच्च उद्देश्य के लिए अपने व्यक्तिगत प्रेम का भी त्याग कर दिया। सांसारिक विपत्तियों का उसका अकेले सामना करना ऐसा प्रतीत होता है मानो वह प्रलयकालीन परिस्थितियों से अपने दुर्बल पैरों के सहारे जूझ रही हो। उसने विपत्तियों से संघर्ष करने की जो शर्त स्वयं से बाँधी थी, उसे निभाने का उसने पूरा प्रयास किया, किंतु अंततः उसे पराजय ही हाथ लगी। वह संसार की कुटिल चालों और निर्दय यथार्थ का सामना करने में असमर्थ रही—यही उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।
प्रश्न 4.
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
4. (क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया ………. तान उठाई।
उत्तर : देवसेना का यह कथन उसके अंतर्मन की गहरी थकान को प्रकट करता है। वह स्वीकार करती है कि उसके स्वप्न अब श्रमित और निष्प्राण हो चुके हैं, किंतु हृदय की आसक्ति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उसके कानों में अब भी विहाग राग का मधुर स्वर गूँजता रहता है, जो अतीत की स्मृतियों को निरंतर जाग्रत रखता है। इस अंश में तत्सम-प्रधान शब्दावली का प्रभाव स्पष्ट है। ‘श्रमित स्वप्न’ और ‘उनींदी श्रुति’ जैसे प्रयोगों में लाक्षणिक सौंदर्य विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है। अनुप्रास अलंकार के माध्यम से काव्य में नाद-सौंदर्य की सृष्टि हुई है। शृंगार रस के वियोग पक्ष का अत्यंत मार्मिक और कोमल चित्रण हुआ है। माधुर्य गुण तथा गेयता इस अंश को भावनात्मक रूप से प्रभावशाली बनाती है, वहीं स्थिति-विशेष का सजीव और चित्रात्मक निरूपण भी सामने आता है।
4(ख) लौटा लो ………… लाज गँवाई।
उत्तर – इस अंश में देवसेना को यह अनुभूति होती है कि अब उसमें और अधिक संताप सहने की शक्ति नहीं बची है। इसलिए वह निष्ठुर संसार से कहती है कि उसने उसे जो कुछ भी दिया है, वह उसे वापस ले ले। वह यह स्वीकार करती है कि वह अपने मन की लज्जा और आत्मसम्मान की रक्षा भी नहीं कर सकी और उसे भी खो बैठी है। यहाँ तत्सम-प्रधान तथा लाक्षणिक शब्दावली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। देवसेना के हृदय की गहन वेदना और आत्मिक पीड़ा अत्यंत सजीव रूप में व्यक्त हुई है। शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण इस अंश को करुण बना देता है। मानवीकरण अलंकार के प्रयोग से संसार को मानवीय रूप प्रदान कर उसके प्रति देवसेना के आक्रोश और पीड़ा को और अधिक प्रभावी बनाया गया है।
प्रश्न 5.
देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?
उत्तर :
5-देवसेना के जीवन का मूल स्वर त्रासदी और संघर्ष से भरा हुआ है। उसके भाई बंधुवर्मा तथा उसके समस्त परिवार को हूणों ने निर्ममता से मार डाला था। भाई की मृत्यु के पश्चात देवसेना अकेली ही उसके अधूरे स्वप्नों को साकार करने के उद्देश्य से राष्ट्र-सेवा में प्रवृत्त हो जाती है। वह स्कंदगुप्त से प्रेम करती है, किंतु स्कंदगुप्त का झुकाव विजया की ओर होने के कारण उसे प्रेम में निराशा का सामना करना पड़ता है। बाद में जब स्कंदगुप्त स्वयं उससे प्रणय निवेदन करता है, तब भी देवसेना उसे स्वीकार नहीं कर पाती। इस प्रकार उसे दोनों ही स्थितियों में प्रेम की असफलता ही मिलती है। राष्ट्र-सेवा के क्षेत्र में भी वह आक्रमणकारियों का प्रभावी रूप से सामना नहीं कर पाती। जीवनभर विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए अंततः वह हार जाती है। उसके दुर्बल चरण प्रलयकालीन संकटों को पराजित करने में असमर्थ रह जाते हैं—यही उसके जीवन की करुण परिणति है।
(ब ) कार्नेलिया का गीत : प्रश्न -उत्तर
प्रश्न 1.
‘कार्नेलिया का गीत ‘ कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर :
1-‘‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद के सुप्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से लिया गया एक भावपूर्ण गीत है। इसमें यूनान के सम्राट सिकंदर के महान उत्तराधिकारी सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया भारत-भूमि के अनुपम सौंदर्य और मानवीय गरिमा से अभिभूत होकर अपने मनोभावों को गीत के रूप में अभिव्यक्त करती है। उसके लिए यह देश केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि मधुर रस से परिपूर्ण, राग और प्रेम की सजीव भूमि है। भारत ऐसा देश है जहाँ अपरिचित व्यक्ति को भी अपनापन और आश्रय मिलता है।
भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण करते हुए कार्नेलिया कहती है कि यहाँ की वृक्ष-शिखाएँ प्रातःकाल की लालिमामयी आभा में मानो नृत्य करती प्रतीत होती हैं। सूर्य की किरणें चारों ओर फैलते ही वृक्षों की शाखाएँ लहलहाने लगती हैं और कमलों के परागकोश स्वर्णिम प्रकाश से दमक उठते हैं। हरियाली पर बिखरा मंगलमय कुमकुम जीवन और चेतना का संकेत देता है, जिससे समूची प्रकृति सचेतन और जीवंत प्रतीत होती है। यहाँ के रंग-बिरंगे पक्षी इंद्रधनुष के समान अपने पंख फैलाए शीतल पवन के सहारे उड़ते हुए इसी भूमि को अपना प्रिय नीड़ मानते हैं।
कार्नेलिया आगे कहती है कि इस देश के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की भाँति करुणा और स्नेह का जल भरा रहता है। यहाँ चारों ओर शीतल वायु की तरंगें प्रवाहित होती हैं, मानो उन्हें असीम आकाश में अपना सहज विस्तार मिल गया हो। प्रातःकाल, जब रातभर जागने के कारण तारे अलसाए से ऊँघने लगते हैं, तब उषा रूपी सुंदरी सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश से जन-जीवन पर सुख, सौंदर्य और उत्साह की वर्षा करती है। भाव यह है कि उषा देवी सूर्य रूपी स्वर्णिम घट से संपूर्ण जगत को प्रकाश और आनंद से भर देती है।
प्रश्न 2.
‘उड़ते खग’ और ‘बरसाती आँखों के बादल’ में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है ?
उत्तर :
‘उड़ते खग’ के माध्यम से कवि यह संकेत देना चाहता है कि भारतवर्ष स्वतंत्रता और अपनत्व की भूमि है, जहाँ प्रत्येक प्राणी को निर्बाध विचरण का अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि यहाँ हर जीव अपने घर जैसी सुख-सुविधाओं और सुरक्षा का अनुभव करता है तथा आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।
इसी प्रकार ‘बरसाती आँखों के बादल’ प्रतीक के द्वारा कवि यह स्पष्ट करता है कि भारत के लोगों के नेत्रों में दूसरों के प्रति करुणा, सहानुभूति और स्नेह का भाव सदैव विद्यमान रहता है। उनकी आँखें वर्षा ऋतु के बादलों की भाँति संवेदना से भरी रहती हैं, जो मानवीय संबंधों को सींचती हैं
प्रश्न 3.
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
‘हेम कुंभ ले उषा सवेरे – भरती दुलकाती सुख मेरे
मंदिर ऊँघते रहते जब – जगकर रजनी भर तारे।’ में निहित प्राकृतिक सौंदर्य को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
इन पंक्तियों में कवि ने प्रभातकालीन प्राकृतिक वातावरण का अत्यंत मोहक और जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो उषा रूपी सुंदरी स्वर्णिम कलश से प्रातःकाल समस्त सुख और प्रकाश धरती पर उड़ेल रही हो, जबकि सारी रात जागने के कारण तारे मस्ती में डूबे ऊँघते से दिखाई देते हैं। यहाँ उषा और तारों का मानवीकरण किया गया है। रूपक और अनुप्रास अलंकार के प्रयोग से काव्य-सौंदर्य और प्रभाव में वृद्धि हुई है। भाषा तत्सम-प्रधान, लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक है तथा उसमें संगीतात्मकता का गुण स्पष्ट रूप से विद्यमान है। प्रभातकालीन वातावरण का यह आलंकारिक वर्णन अत्यंत सजीवता और आकर्षण के साथ प्रस्तुत हुआ है, जिसमें उषा की स्वर्णिम आभा समूचे परिवेश को प्रकाशमय बना देती है।
प्रश्न 4.
‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ – पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह भाव स्पष्ट करता है कि भारतवर्ष राग, माधुर्य और प्रेम से ओत-प्रोत भूमि है। यहाँ आने वाला व्यक्ति चाहे कितना ही अपरिचित क्यों न हो, उसे भी यहाँ के लोगों से आत्मीय स्नेह और अपनापन सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। भारतीय जनमानस सेवा-भाव से युक्त है; इसलिए वे अजनबियों को भी आदर, सम्मान और प्रेम देकर उन्हें अपनेपन का अनुभव कराते हैं। इस प्रकार भारत केवल भू-भाग नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सहिष्णुता की जीवंत प्रतिमूर्ति है।
प्रश्न 5.
प्रसाद शब्दों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में कैसे कुशल हैं? कविता से उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
उत्तर :
जयशंकर प्रसाद शब्द-चयन के माध्यम से भावों को मार्मिक रूप देने में अद्भुत दक्षता रखते हैं और ‘कार्नेलिया का गीत’ में यह गुण सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। कवि ने ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ कहकर भारतवर्ष को प्रेम और माधुर्य से भरा हुआ देश बताया है। ‘अनजान क्षितिज’ को सहारा मिलने का बिंब यह संकेत देता है कि इस भूमि पर अपरिचितों को भी संरक्षण और अपनापन मिलता है। यहाँ के लोगों के हृदय में व्याप्त करुणा और सहानुभूति को कवि ने ‘बरसाती आँखों के बादल’ के माध्यम से सजीव रूप में अभिव्यक्त किया है। इसी प्रकार प्रभातकालीन सौंदर्य और लालिमा को वह ‘हेम कुंभ ले उषा सवेरे—भरती ढुलकाती सुख मेरे’ जैसे शब्दों द्वारा चित्रित करता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रसाद जी सटीक और अर्थगर्भित शब्दों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को अत्यंत प्रभावशाली और करुणामय बना देते हैं।
प्रश्न 6.
कार्नेलिया के गीत कविता में वर्णित भारत के प्राकृतिक दृश्यों को अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर :
कवि के अनुसार भारतवर्ष असीम और अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध देश है। इस कविता में प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत सजीव रूप में किया गया है। उषा को एक सुंदरी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो सूर्य रूपी स्वर्णिम कुंभ से धरती पर नवजीवन का संचार करती है। यहाँ का सूर्योदय समूचे वातावरण में उल्लास और आनंद भर देता है। इसी भाव को कवि ‘छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुमकुम सारा’ पंक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। इस देश में सदा शीतल और सुखद वायु प्रवाहित होती रहती है, जबकि वर्षा ऋतु के मेघ यहाँ के लोगों के अंतर्मन में बसे स्नेह और करुणा के प्रतीक बन जाते हैं। भारत की प्राकृतिक शोभा से प्रभावित होकर सागर भी मानो इसके चरणों को पखारता है—‘लहरें टकराती अनंत की पाकर जहाँ किनारा’। इस प्रकार भारतवर्ष की प्रकृति न केवल सुंदर है, बल्कि जीवनदायिनी और भावपूर्ण भी है।
परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न–देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत –
प्रश्न 1.
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘देवसेना का गीत’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘देवसेना का गीत’ जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक ‘स्कंदगुप्त’ से लिया गया एक अत्यंत करुण एवं भावप्रधान गीत है। इस गीत में कवि ने देवसेना के जीवन की त्रासदी, आत्मग्लानि और अंतर्द्वंद्व को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है, जिसका समस्त परिवार हूणों के आक्रमण में नष्ट हो गया। वह इस भीषण विनाश से बच तो जाती है, किंतु जीवनभर उसके मन में वेदना और पश्चात्ताप की अग्नि जलती रहती है।
जीवन की संध्याबेला में पहुँचकर देवसेना अपने यौवनकाल की भूलों, भ्रमों और असावधानियों को स्मरण करती है तथा अनुभव करती है कि वह अपने जीवन की अमूल्य पूँजी की रक्षा नहीं कर सकी। यही उसके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है। वह अपने दुर्बल क्षणों के लिए स्वयं को दोषी मानती है, फिर भी वह नियति के प्रहारों से संघर्ष करती रही। इस गीत के माध्यम से कवि ने मनुष्य के दुःख, प्रकृति के परिवेश और जीवन की अनिवार्य त्रासदी के बीच गहरे संबंध को प्रभावशाली रूप में उकेरा है।
प्रश्न 2.
देवसेना का संक्षिप्त चरित्र-चित्रण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
देवसेना मालवा के प्रतापी राजा बंधुवर्मा की बहन थी। वह स्वभाव से संवेदनशील, कर्तव्यनिष्ठ और आत्मबल से युक्त नारी थी। स्कंदगुप्त से उसका प्रेम था, किंतु व्यक्तिगत सुख से अधिक उसके लिए राष्ट्र और कर्तव्य का महत्व था। हूणों के आक्रमण में जब उसका पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हुआ, तब भी वह टूटकर बिखरने के स्थान पर अपने भाइयों के अधूरे स्वप्नों को साकार करने का संकल्प लेती है।
आर्यावर्त पर आए संकट के समय देवसेना ने निजी जीवन को त्यागकर राष्ट्र-सेवा का व्रत धारण किया। उसके व्यक्तित्व में त्याग, बलिदान, आत्मसंयम और राष्ट्रभक्ति के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इस प्रकार देवसेना एक आदर्श नारी और कर्तव्यपरायण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है।
प्रश्न 3.
सेल्यूकस चंद्रगुप्त से क्यों प्रभावित हुआ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सेल्यूकस चंद्रगुप्त मौर्य के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुआ, क्योंकि चंद्रगुप्त एक असाधारण प्रतापी, साहसी और शक्तिशाली सम्राट था। उसकी सैन्य क्षमता, युद्ध-कौशल और संगठन शक्ति अद्वितीय थी। वह न केवल युद्धभूमि में पराक्रमी था, बल्कि शासन संचालन में भी अत्यंत कुशल और दूरदर्शी था।
चंद्रगुप्त की वीरता, आत्मविश्वास और राजनीतिक समझ ने सेल्यूकस को यह अनुभव करा दिया कि वह केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान राष्ट्रनिर्माता भी है। इसी कारण सेल्यूकस उसके व्यक्तित्व और सामर्थ्य से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।
प्रश्न 4.
‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ गीत में कवि ने किस देश की ओर संकेत किया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ गीत में कवि ने भारतवर्ष की ओर संकेत किया है। इस गीत में भारत की गौरवशाली संस्कृति, उदार परंपराएँ और प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव चित्रण किया गया है। कवि भारत को ऐसा देश मानता है जहाँ प्रकृति, मानवता और करुणा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
यह वह भूमि है जहाँ पक्षी भी अपने घोंसलों की कल्पना करते हुए लौट आते हैं, जहाँ भटके हुए को आश्रय मिलता है और जहाँ प्रत्येक को अपनत्व का अनुभव होता है। इस प्रकार गीत भारतवर्ष की आत्मीयता और महानता को उजागर करता है।
प्रश्न 5.
‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ पंक्ति के माध्यम से भारतवर्ष की किस विशिष्ट विशेषता की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर :
इस पंक्ति के माध्यम से कवि भारतवर्ष की उदारता, मानवता और अतिथि-सत्कार की परंपरा को उजागर करता है। भारत वह देश है जहाँ अपरिचित व्यक्ति भी अपनापन और सम्मान पाता है। भारतीय संस्कृति में ‘अतिथि देवो भवः’ की भावना गहराई से रची-बसी है।
यहाँ दूर-दराज़ से आया व्यक्ति भी पराया नहीं रहता, बल्कि उसे स्नेह, सुरक्षा और सहारा प्रदान किया जाता है। यही गुण भारतवर्ष को अन्य देशों से विशिष्ट बनाता है और उसकी सांस्कृतिक महानता को प्रमाणित करता है।
प्रश्न 6.
कवि ने भारतीयों की आँखों में करुणा का जल भरा रहने की बात क्यों कही है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ है, जिसका अर्थ है—संपूर्ण विश्व एक परिवार के समान है। इसी जीवन-दृष्टि के कारण भारतीय जनमानस में करुणा, सहानुभूति और संवेदनशीलता गहराई से समाई हुई है। अन्य देशों की तुलना में भारतीय अधिक भावुक, सहृदय और मानवीय माने जाते हैं।
भारतीय लोग दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझते हैं और पीड़ित व्यक्ति की वेदना में सहभागी बनते हैं। किसी के कष्ट, पीड़ा या विपत्ति को देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठता है और आँखों से करुणा के आँसू बहने लगते हैं। इसी मानवीय संवेदनशीलता और आत्मीयता के कारण कवि ने कहा है कि भारतीयों की आँखों में सदैव करुणा का जल भरा रहता है।
प्रश्न 7.
देवसेना का परिचय देते हुए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
देवसेना जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक ‘स्कंदगुप्त’ की एक प्रमुख एवं प्रभावशाली पात्र है। वह मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है, जिनका हूणों के आक्रमण में वीरगति को प्राप्त होना उसके जीवन की दिशा ही बदल देता है। परिवार के विनाश के उपरांत भी देवसेना साहस और धैर्य के साथ जीवन का सामना करती है।
वह अपने भाई के अधूरे स्वप्नों को साकार करने के लिए राष्ट्र-सेवा का व्रत ग्रहण करती है। स्कंदगुप्त से उसका गहरा प्रेम है, किंतु वह व्यक्तिगत सुख को त्यागकर विवाह का निर्णय नहीं लेती। अपनी साधना और तपस्या का संपूर्ण फल वह अपने प्रिय के चरणों में समर्पित कर जीवन की आशाओं और आकांक्षाओं से विरक्त हो जाती है। देवसेना के व्यक्तित्व में त्याग, संयम, वीरता, धैर्य और राष्ट्रभक्ति के गुण स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। देश-सेवा के लिए वह भिक्षावृत्ति अपनाने में भी संकोच नहीं करती, जो उसके महान चरित्र को उजागर करता है।
प्रश्न 8.
कवि ने भारतवर्ष को ‘मधुमय देश’ क्यों कहा है? विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कविवर जयशंकर प्रसाद ने भारतवर्ष को ‘मधुमय देश’ कहा है, क्योंकि यह भूमि प्रेम, माधुर्य, करुणा और सौंदर्य से परिपूर्ण है। भारत वह देश है जहाँ सर्वथा अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय और अपनत्व प्राप्त होता है। यहाँ की प्रकृति अत्यंत रमणीय है—लालिमा से युक्त आकाश, सुंदर वृक्ष-शिखाएँ और रंग-बिरंगे पंख फैलाए पक्षी इस भूमि की शोभा बढ़ाते हैं।
कवि के अनुसार, पक्षी भी इस देश को अपना प्रिय नीड़ समझकर इसी दिशा में उड़ते हैं। यहाँ के निवासियों की आँखों में वर्षा-ऋतु के बादलों के समान करुणा का जल भरा रहता है। प्रातःकाल उषा देवी सूर्य रूपी स्वर्णिम घट से प्रकाश को पृथ्वी पर उड़ेलती हुई प्रतीत होती है, जिससे चारों ओर आनंद और उजास फैल जाता है। इस प्रकार भारत न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध है, बल्कि यहाँ के लोगों के हृदय में प्रेम, करुणा और मानवता की सांस्कृतिक भावनाएँ अपने सर्वोच्च रूप में विद्यमान हैं—इसी कारण इसे ‘मधुमय देश’ कहा गया है।
प्रश्न 9.
‘कार्नेलिया का गीत’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से अवतरित एक भावप्रधान गीत है। इस कविता में कवि ने भारतवर्ष के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक उदारता और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है। यह गीत देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत है।
यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया जब भारत-भूमि के सौंदर्य और आत्मीय वातावरण का अनुभव करती है, तो वह अनायास ही इस देश की प्रशंसा में गीत गाने लगती है। उसे भारतवर्ष एक ऐसा मधुमय देश प्रतीत होता है, जो न केवल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है, बल्कि जहाँ प्रत्येक अपरिचित को भी आश्रय और अपनापन मिलता है। ऐसा लगता है मानो यहाँ क्षितिज को भी ठहरने का सहारा मिल जाता हो।
कविता में भारत की रंगीन कल्पनाओं, रमणीय वन-प्रांतरों और पक्षियों की चंचल उड़ानों का सुंदर चित्रण हुआ है। केसरिया आभा लिए वृक्षों की शाखाओं पर नृत्य करते पक्षी, इंद्रधनुषी पंख फैलाकर मंद, सुगंधित समीर के सहारे उड़ते हुए इस देश को अपना प्रिय रैन बसेरा मानते हैं। यह समस्त दृश्य भारत की प्राकृतिक समृद्धि और सौंदर्य को उजागर करता है।
साथ ही कवि ने भारत की सांस्कृतिक चेतना को भी रेखांकित किया है। यहाँ प्रकृति देवी की निरंतर कृपा बनी रहती है। प्रातःकाल उषा देवी सूर्य रूपी स्वर्णिम घट से प्रकाश को पृथ्वी पर उड़ेलती हुई प्रतीत होती है, जिससे समस्त संसार प्रकाश और आनंद से भर उठता है। यहाँ के निवासियों के हृदय में प्रेम, करुणा और सहानुभूति की भावनाएँ सदैव जीवंत रहती हैं, जिनका प्रतिबिंब उनकी आँखों में छलकते करुणा-जल में दिखाई देता है।
इस प्रकार ‘कार्नेलिया का गीत’ के माध्यम से कवि ने भारतवर्ष के प्राकृतिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक सौंदर्य के साथ-साथ उसकी उदात्त मानवीय परंपराओं का प्रभावशाली एवं मार्मिक चित्रण किया है।
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प्रिय शिक्षार्थियों ,
12 cbse board परीक्षा में hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board द्वारा निर्धारित hindi book (antara) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .
प्रश्न -उत्तर को दो भागों में बांटा गया है .पहले भाग में पाठ के अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए है तथा दूसरे भाग में परीक्षोपयोगी संभावित महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दिए गए है .,यहाँ पर काव्य खंड के chapter-1 dev sena ka geet (देवसेना का गीत )-jay shaker prasad (जय शंकर प्रसाद ) के Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) दिए गए . दोनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.



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