12th MP 12th RBSE vyakaran

शब्द शक्ति,shabd shakti

August 26, 2022
Spread the love

शब्द शक्ति

शब्द एवं अर्थ का अभिन्न सम्बन्ध है। शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध ही शब्द शक्ति है। ’शब्दार्थ सम्बन्धः शक्ति। अर्थात्(बोधक) शब्द एवं अर्थ के सम्बन्ध को (शब्द) शक्ति कहते हैं। शब्द शक्ति की परिभाषा इस प्रकार भी की जा सकती है- ’शब्दों के अर्थों का बोध कराने वाले अर्थ-व्यापारों को शब्द शक्ति कहते हैं।

शब्द शक्ति का अर्थ और परिभाषा – शब्द शक्ति का अर्थ है-शब्द की अभिव्यंजक शक्ति। शब्द का कार्य किसी अर्थ की अभिव्यक्त तथा उसका बोध करता होता है।

अन्य परिभाषा-

जिन शब्दों से वाक्य में निहित  अर्थ का  बोध कराने वाली शक्ति को शब्दशक्ति कहते है।

शब्द एवं अर्थ के सम्बन्ध को शब्द शक्ति कहते हैं।

शब्दों के अर्थों का बोध कराने वाले अर्थ-व्यापारों को शब्द शक्ति कहते हैं।

शब्द के भेद शब्द  के अर्थ शब्द शक्ति के  भेद
(1) वाचकवाच्यार्थ अभिधेयार्थक मुख्यार्थकअभिधा
(2) लक्षकलक्ष्यार्थलक्षणा
(3) व्यंजकव्यंगार्थव्यंजना

अभिधा शब्द शक्ति

शब्द की जिस शक्ति से सामान्य अथवा लोक प्रचलित अर्थ प्रकट होता है अर्थात मुख्य अर्थ का बोध हो उसे अभिधा शब्द शक्ति कहते हैं।

इसके प्रकट भाव को वाच्यार्थ,( मुख्यार्थ अथवा अभिधेयार्थक ) कहा जाता है।

अभिधा शब्द शक्ति से जिन शब्दों का अर्थ बोध होता है वे तीन प्रकार के होते हैं।

1 रूढ़ 2 यौगिक 3 योगरूढ़

(।) रूढ़ः- जिन शब्दों के खंड न हो , सम्पूर्ण शब्दों का एक ही अर्थ प्रकट हो , उन्हें रूढ़ शब्द कहते हैं | वे शब्द जिनकी उत्पत्ति नही होती-  जैसे – घोङा, घर,  पेड़ , हाथी , मेज , कलम आदि |

 (।।) यौगिक: – प्रत्यय ,कृदन्त , समास इत्यादि के संयोग से बने वे शब्द , जो समूह का  अर्थ का बोध कराते हैं , उन्हें यौगिक शब्द कहते हैं | जिनकी उत्पत्ति प्रत्यय, समास आदि से होती है. जैसे – महेश , , पाठशाला  ,विद्यालय, रमेश

(।।।) योगरूढ़:- यौगिक प्रक्रिया से बने शब्द जिनका एक निश्चित अर्थ रूढ़ हो गया हो , उन्हें योगरूढ़ शब्द कहते हैं | जैसे – जलज , गणनायक , दशानन

पहचान –

पाठक या श्रोता को बुद्धि बल का प्रयोग नहीं करना पड़ता और न अनुमान लगाना पड़ता है

ऐसे वाक्यों को देहाती या अनपढ़  व्यक्ति भी वही अर्थ ग्रहण करता है जो शहरी या पढा-लिखा व्यक्ति अर्थ ग्रहण करता है

इसमें शब्द के एक ही अर्थ का बोध होता है,

जैसे –

’कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय

वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय

सारंग ले सारंग उड्यो सारंग पूग्यो आय।

जे सारंग सारंग कहे, मुख को सारंग जाय

इस दोहे में सारंग शब्द कई बार प्रयोग हुआ है, जिसकी अलग अलग अर्थ है।

नदी, तनूजा, सरित, शौवालिनी, स्रोतस्विनी, आपगा, निम्रगा,कूलंकषा,तटिनी,सरि , जयमाला, तरंगिणी, दरिया, निर्झरिणी।

इस दोहे का अर्थ है कि वहां एक (सारंग) सरोवर मे कमल खिला हुआ है। उसमे एक (सारंग) सोने के जैसे रंग वाली सुंदरी बाला है जिनका नाम (सारंग) राधा है.उनके श्रीअंग मे एक छबीली (सारंग) हंसचरण है यानि उनके चरण हंस जैसे है और अर्ध (सारंग) हाथी के सूंड जैसे शोभित हो रहें हैं।

उस अर्ध (सारंग) के उपर एक (सारंग) मुखकमल व नीचे सबकुछ श्री अंग सारंग ही सारंग है ये सब कुछ जो सारंग रूप है उसपे एक सुंदर सारंग (गाल पर काला तिल) अतिशय शोभित हो रहा है ऐसी शोभा से युक्त सारंग नार (सारंग) सर्प-चोटी का भार थामे खड़ी हुई हैं। हे श्यामसुंदर आप भी (सारंग) घनश्याम मेघ हो। व सरोवर मे स्थित श्रीराधाजी (सारंग) आप दोनो की सारंग की जोड़ी अतिशय सुंदर शोभायमान हो रही है।

2-लक्षणा शब्द शक्ति

 (Figurative Sense Of a Word)

 जहां मुख्य अर्थ में बाधा उपस्थित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधार पर मुख्य अर्थ से सम्बन्धित अन्य अर्थ को लक्ष्य किया जाता है, वहां लक्षणा शब्द शक्ति होती है।

पहचान –

यहाँ वाक्य का साधारण अर्थ और भावार्थ भिन्न होता है।

वाक्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होता है।

वाक्य में प्राय:लोकोक्ति ,मुहावरा अथवा कोई रूढ़ शब्द का प्रयोग होता है

यहाँ उत्पन्न भाव को लक्ष्यार्थ कहा जाता है।

शब्द के साधारण अर्थ से उसका वास्तविक अभिप्राय नहीं प्रकट होता।

वास्तविक अभिप्राय उसके साधारण अर्थ से कुछ भिन्न होता है।

भिन्न अर्थ प्रकट होता है,

लक्षणा के भेद —  (अ)रूढ़ि लक्षणा        (ब)प्रयोजनवती लक्षणा

(अ)रूढ़ि लक्षणा- कुछ शब्द  रुढ़ हो गए हैं। जैसे – कुशल’। कुशल का शब्दार्थ होता है – ‘कुश इकट्ठा करनेवाला’ किन्तु  यह शब्द किसी कार्य में  निपुण के अर्थ में रुढ़ हो गया है। मुख्यार्थ में बाधा होने पर रूढ़ि के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, वहां रूढ़ा लक्षणा होती हैं।

जैसे – “ हिंदुस्तान जाग उठा “  अब हिंदुस्तान कोई व्यक्ति तो है नहीं जो सोकर जागा हो ,  यहाँ  मुख्यार्थ की बाधा है। इसका लक्ष्यार्थ  होगा -‘हिंदुस्तान के  लोग ‘ यहाँ ‘हिंदुस्तान के  लोगों  ‘ लिए ‘हिंदुस्तान ‘ कहना रूढ़ि है।

(ब) प्रयोजनवती लक्षणा

विशेष प्रयोजन के लिए प्रयुक्त  जब कोई शब्द मुख्यार्थ में बाधा उत्पन्न करे अर्थात  वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ प्रकट करे तब प्रयोजन सिद्धि के लिए लक्ष्यार्थ का बोध किया जाता है, वहां प्रयोजनवती लक्षणा होती है।

जैसे- हरि अल्लाह की गाय है  -इस वाक्य में ’गाय ’ का लक्ष्यार्थ ’सीधा-सदा ’ लिया गया है उक्त वाक्य में अल्लाह की गाय हरि के सीधे-सादे  को व्यक्त करने के प्रयोजन से प्रयुक्त हुआ है

प्रयोजनवती लक्षणा के दो भेद हैं-           (अ)गौणी लक्षणा            (ब) शुद्धा लक्षणा

(अ) गौणी लक्षणा

गौणी लक्षणा में समान गुण या धर्म के आधार पर  लक्ष्यार्थ का ग्रहण किया जाता है ।

(ब) शुद्धा लक्षणा

शुद्धा लक्षणा में समान गुण या धर्म के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध से लक्ष्यार्थ का बोध होता है अर्थात  सादृश्य गुण को छोङकर अन्य किसी आधार  पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है

शुद्धा लक्षणा के चार भेद माने गए  हैं-

(अ) उपादान लक्षणा

(आ) लक्षणलक्षणा

(इ) सारोपा लक्षणा

(ई) साध्यावसाना लक्षणा

 (अ ) उपादान लक्षणा –

जहां मुख्यार्थ बना रहता है तथा लक्ष्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के साथ ही होता है वहां उपादान लक्षणा होती हैं। इसमें वाच्यार्थ का सर्वथा गौण नहीं होता।

जहाँ वाक्यार्थ की संगति के लिए अन्य अर्थ के लक्षित किए जाने पर भी अपना अर्थ न छूटे वहाँ उपादान लक्षणा होती है।

जैसे, ‘पगड़ी की लाज रखिये। लक्ष्यार्थ होता है पगड़ीधारी की लाज। यहाँ पगड़ी अपना अर्थ न छोड़ते हुए पगड़ीधारी का आक्षेप करता है। यहाँ दोनों साथ-साथ हैं। अत: उपादान लक्षणा है।

लक्षण लक्षणा

जहाँ वाक्यार्थ की सिद्धि के लिए वाक्यार्थ अपने अर्थ को छोड़कर केवल लक्ष्यार्थ को सूचित करे, वहाँ लक्षण लक्षणा होती है।

इसमें अमुख्यार्थ को अनिवत होने के लिए मुख्यार्थ अपना अर्थ बिल्कुल छोड़ देता है। जैसे, ‘पेट में आग लगी है।’ यह एक सार्थक वाक्य है। इसमें ‘आग लगी है’ वाक्य अपना अर्थ छोड़ देता है और लक्ष्यार्थ होता है कि भूख लगी है। इससे लक्षण-लक्षणा है।

(आ ) लक्षण लक्षणा –

इसमें मुख्यार्थ पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तभी लक्ष्यार्थ का बोध होता है।

जैसे-मोहन गया है। लक्षण लक्षणा का उदाहरण हैं।

 (इ ) सारोपा लक्षणा

 जहां उपमेय और उपमान में अभेद आरोप करते हुए लक्ष्यार्थ की प्रतीति हो वहां सारोपा लक्षणा होती हैं। इसमें उपमेय भी होता है और उपमान भी।

जैसे – उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग।

यहां उदयगिरि रूपी मंच पर राम रूपी प्रभातकालीन सूर्य का उदय दिखाकर उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया गया है अतः सारोपा लक्षणा है।

(ई ) साध्यवसाना लक्षणा –

इसमें केवल उपमान का कथन होता है, लक्ष्यार्थ की प्रतीति हेतु उपमेय पूरी तरह छिप जाता है।

जैसे-जब शेर आया तो युद्ध क्षेत्र से गीदङ भाग गए।

यहां शेर का तात्पर्य वीर पुरुष से और गीदङ का तात्पर्य कायरों से है। उपमेय को पूरी तरह छिपा देने के कारण यहां साध्यवसाना लक्षणा है।

व्यंजना शब्द शक्ति

जहाँ न  मुख्यार्थ  से और न लक्ष्यार्थ से अर्थ प्रकट हो ,तब देशकाल ,वातावरण अथवा परिस्थिति के अनुरूप अन्य अर्थ व्यंजित होता है ,व्यंजना शब्द शक्ति कहलाती है . इससे प्रकट भाव व्यंग्यार्थ कहालाता है।

व्यंजनाशब्द शक्ति के  दो भेद हैं – ( अ )शाब्दी व्यंजना (ब )आर्थी व्यंजना।

शाब्दी व्यंजना

(अ) शाब्दी व्यंजना – जहां शब्द विशेष के कारण व्यंग्यार्थ का बोध होता है और वह शब्द हटा देने पर व्यंग्यार्थ समाप्त हो जाता है वहां शाब्दी व्यंजना होती हैं।

जैसे –

चिरजीवौ जोरी जुरै क्यों न सनेह गम्भीर।

को घटि ए वृषभानुजा वे हलधर के वीर।।

यहां वृषभानुजा, हलधर के वीर शब्दों के कारण व्यंजना सौन्दर्य है। इनके दो-दो अर्थ हैं-1. राधा, 2. गाय तथा 1. श्रीकृष्ण 2. बैल। यदि वृषभानुजा, हलधर के वीर शब्द हटा दिए जाएं और इनके स्थान पर अन्य पर्यायवाची शब्द रख दिए जाएं, तो व्यंजना समाप्त हो जाएगी।

शाब्दी व्यंजना के भी दो भेद होते हैं-  (अ) अभिधामूला (ब) लक्षणामूला।

(अ )अभिधामूला शाब्दी व्यंजना

जहां पर एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ प्रकट  होते हैं, तथा व्यंग्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के माध्यम से होता है

 जैसे-सोहत नाग न मद बिना, तान बिना नहीं राग।

यहां पर नाग और राग दोनों शब्द अनेकार्थी हैं, परन्तु ’वियोग’ कारण से इनका अर्थ नियन्त्रित कर दिया गया है। इसलिए यहां पर ’नाग’ का अर्थ हाथी और ’राग’ का अर्थ रागिनी है।

अब यदि यहां नाग का पर्यायवाची भुजंग रख दिया जाए तो व्यंग्यार्थी हो जाएगा।

मुखर मनोहर श्याम रंग बरसत मुद अनुरूप।

झूमत मतवारो झमकि बनमाली रसरूप ॥

यहाँ ‘वनमाली’ शब्द मेघ और श्रीकृष्ण दोनों का बोधक है। इसमें एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ का भी बोध हो जाता है। ध्यान दें कि यहाँ श्लेष नहीं। क्योंकि रूढ़ वाच्यार्थ ही इसमें प्रधान है। अन्य अर्थ का आभास-मात्र है। श्लेष में शब्द के दोनों अर्थ अभीष्ट होते है- समान रूप से उस पर कवि का ध्यान रहता है।

अनेकार्थ शब्द के किसी एक ही अर्थ के साथ प्रसिद्ध अर्थ भी होते हैं। जैसे-

शंख-चक्र-युत हरि कहे, होत विष्णु को ज्ञान।

‘हरि’ के सूर्य, सिंह, वानर आदि अनेक अर्थ हैं; कितु शंख-चक्र-युत कहने से यहाँ विष्णु का ही ज्ञान होता है।

(ब )लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना

जिस प्रयोजन के लिए लक्षणा का आश्रय लिया जाता है वह प्रयोजन लाक्षणिक अर्थ द्वारा व्यंग्यार्थ को उदघाटित करता  है ,उसे लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना कहते हैं।

उदाहरण –

1. ’’कहि न सको तव सुजनता! अति कीन्हों उपकार।

सखे! करत यों रहु सुखी जीवहु बरस हजार।।’’

उक्त काव्य पंक्ति में  अपकार करने वाले व्यक्ति कार्यों से दुःखी कोई व्यक्ति कह रहा है-’’मैं तुम्हारी सज्जनता का वर्णन नहीं कर सकता। तुमने बहुत उपकार किया। इसी प्रकार उपकार करते हुए तुम हजार वर्ष तक सुखी रहो।’’

यहाँ वाच्यार्थ में अपकारी की प्रशंसा की गई है, परन्तु अपकारी की कभी प्रशंसा नहीं की जा सकती है, अतः वाच्यार्थ में बाधा है।

यहाँ इस वाच्यार्थ को तिरस्कृत करके विपरीत लक्षणा से ’सुजनता’ का ’दुर्जनता’, ’उपकार’ का ’अपकार’ और ’सखे’ का ’शत्रु’ अर्थ लिया जायेगा। यहाँ व्यंग्यार्थ ’अत्यन्त अपकार’ है। अतएव यहाँ लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना है।

अन्य उदहारण –

अजौ तरयोना ही रह्यौ श्रुति सेवत इक अंग।

नाक बास बेसरि लह्यौ बसि मुकतनु के संग।।

फली सकल मन कामना, लूट्यो अगनित चैन।

आजु अँचै हरि रूप सखि, भये प्रफुल्लित नैन।।

(ब) आर्थी व्यंजना –

जब व्यंजना किसी शब्द विशेष पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित होती है, तब वहां आर्थी व्यंजना मानी जाती हैं।

यथा –

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।

यहां नीचे वाली पंक्ति से नारी के दो गुणों की व्यंजना होती है-उसका ममत्व भाव एवं कष्ट सहने की क्षमता। यह व्यंग्यार्थ किसी शब्द के कारण है अतः आर्थी व्यंजना है।

1. ’’सागर कूल मीन तङपत है हुलसि होत जल पीन।’’

यह कथन सामान्यतः कोई महत्त्व नहीं रखता, परन्तु जब इस बात का पता चल जाता है कि इसको कहने वाली गोपिकाएँ हैं, तब इसका यह अर्थ निकलता है कि हम कृष्ण के समीप होेते हुए भी मछली के समान तङप रही हैं।

कृष्ण के दर्शन से हमें वैसा ही आनंद प्राप्त होगा, जैसा कि मछली को पानी में जाने से होता है।

2. सघन कुंज छाया सुखद शीतल मंद समीर।

मन ह्वै जात अजौ वहे वा जमुना के तीर।।

3. सिंधु सेज पर धरा वधू अब, तनिक संकुचित बैठी सी।

प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किए सी ऐंठी सी।।

4. ’’प्रीतम की यह रीति सखी, मोपै कही न जाय।

झिझकत हू ढिंग ही रहत, पल न वियोग सुहाय।।’’

यह कथन किसी नायिका का है। व्यंग्यार्थ यह है कि नायिका रूपवती है, नायक उसमें अत्यधिक आसक्त है। यहाँ आर्थी व्यंजना इसलिए है कि ’झिझकत’, ’ढिंग’ आदि शब्दों के स्थान पर इनके पर्यायवाची अन्य शब्द भी रख दि

 (ब) आर्थी व्यंजना-

जहाँ व्यंग्यार्थ  शब्द आधारित न होकर अर्थ पर आधारित हो, तब वहां आर्थी व्यंजना मानी जाती हैं। यथा – आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।

यहां नीचे वाली पंक्ति से नारी के दो गुणों की व्यंजना होती है-उसका ममत्व भाव एवं कष्ट सहने की क्षमता। यह व्यंग्यार्थ किसी शब्द के कारण है अतः आर्थी व्यंजना है।

 व्यंजना के तीन भेद माने गए  है-

(1)अभिधामूला आर्थी व्यंजना (2 )लक्षणामूला आर्थी व्यंजना (3) व्यंजनामूला आर्थी व्यंजना

एक अन्य आधार पर व्यंजना के तीन भेद किए गए हैं-1. वस्तु व्यंजना, 2. अलंकार व्यंजना, 3. रस व्यंजना।

1. वस्तु व्यंजना –

जहां व्यंग्यार्थी द्वारा किसी तथ्य की व्यंजना हो वहां वस्तु व्यंजना होती हैं।

जैसे-

उषा सुनहले तीर बरसती जय लक्ष्मी सी उदित हुई।

उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अन्तर्निहित हुई।।

यहां रात्रि बीत जाने और हृदय में आशा के उदय आदि की सूचना व्यंजित की गई है अतः वस्तु व्यंजना है।

2. अलंकार व्यंजना –

जहां व्यंग्यार्थ किसी अलंकार का बोध कराये वहां अलंकार व्यंजना होती हैं।

जैसे-

उसे स्वस्थ मनु ज्यों उठता है क्षितिज बीच अरुणोदय कान्त।

लगे देखने क्षुब्ध नयन से प्रकृति विभूति मनोहर शान्त।।

यहां उत्प्रेक्षा अलंकार के कारण व्यंजना सौन्दर्य है अतः इसे अलंकार व्यंजना कहेंगे।

3. रस व्यंजना –

जहां व्यंग्यार्थ से रस व्यंजित हो रहा हो, वहां रस-व्यंजना होती है।

यथा –

जब जब पनघट जाऊं सखी री वा जमुना के तीर।

भरि-भरि जमुना उमङि चलति हैं इन नैननि के नीर।।

यहां ’स्मरण’ संचारीभाव की व्यंजना होने से वियोग रस व्यंजित है अतः रस व्यंजना है।

कभी-कभी ’उत्प्रेक्षा’ अलंकार के पदों में भी उनका मुख्य अर्थ ही प्रकट होता है, अतः इस अलंकार के पदों में भी प्रायः अभिधा शब्द शक्ति होती है।

जैसे –

।. ’’सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।

मानहु नीलमणि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात’’।।

।।. ’’कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये।

हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गये पंकज नये’’।।

।।।. भजन कह्यो तातै भज्यौ, भज्यौ न एको बार।

दूर भजन जाते कह्यौ, सो तू भज्यौ गवार’’।।

ये जायें तो भी व्यंग्यार्थ बना रहेगा।

No Comments

    Leave a Reply

    error: Content is protected !!
    error: Alert: Content is protected !!