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रस(Sentiments)

August 26, 2022
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रस(Sentiments)

रस(Sentiments) की परिभाषा

काव्य को पढ़ने अथवा सुनने  जो आनन्द की अनुभूति होती है,  रस कहलाता  हैं।

 विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

रस के चार अंग है-

(1) विभाव :- जिस माध्यम के कारण अन्य प्राणी  के हृदय में भावोद्रेक होता  है, उन कारणों को ‘विभाव’ कहा जाता है अर्थात जो प्राणी  वस्तु या परिस्थितियाँ स्थायी भावों को उद्दीप्त  या जाग्रत  करें,उसे विभाव कहते हैं।

विभाव के दो भेद हैं- (क) आलंबन विभाव (ख) उद्दीपन विभाव।

(क)आलंबन विभाव- जिसके  आलंबन से  स्थायी भाव जाग्रत होते  है, आलंबन विभाव कहलाता है।

आलंबन विभाव के दो पक्ष माने गए  है- आश्रयालंबन व विषयालंबन।

आश्रयालंबन -जिसके मन में भाव जाग्रत हो  वह आश्रयालंबन कहलाता है।

विषयालंबन- जिसके प्रति या कारण मन में भाव जाग्रत हो  विषयालंबन कहलाता है।

उदाहरण- यदि नर के मन में नारी  के प्रति रति का भाव जगता है तो नर आश्रय होंगा  और नारी  विषय।

(ख) उद्दीपन विभाव-जिसे देखकर  ( वस्तु या परिस्थिति ) को देखकर स्थायी भाव उद्यीप्त हो, अर्थात भावों को उद्दीप्त करने में सहायक हो, उद्दीपन विभाव कहलाता  हैं।

विषय की ब्राह्म चेष्टाओं और ब्राह्म वातावरण को आश्रय के मन में भावों को उद्दीप्त करें उद्दीपन विभाव कहलाता हैं।

उदहारण – सुंदर नायिका   को देखकर नायक   के मन में आकर्षण (रति भाव) उत्पन्न होता है। उस समय नायिका  की आंगिक चेष्टाएँ तथा आसपास  का सुरम्य, मादक और एकान्त वातावरण नायक   के मन में रति भाव को और अधिक उद्दीप्त  करता है, अतः यहाँ नायिका की आंगिक  चेष्टाएँ तथा सुरम्य वातावरण आदि को उद्दीपन विभाव कहा जाएगा।

(2) अनुभाव :- आलम्बन और उद्यीपन विभावों से  उत्पत्र भावों को प्रकट करनेवाली चेष्टाओं को  ‘अनुभाव’ कहते है।

अर्थात  मनोगत भाव को अभिव्यक्त करनेवाली आंगिक चेष्टाएं जो भावों का अनुभव कराते हों,  अनुभाव कहलाती है।

अनुभाव के भेद

अतः अनुभाव के पांच भेदमाने गए  है-(1 ) कायिक (2 ) वाचिक (3 ) मानसिक (4 ) आहार्य (5 ) सात्विक

(1 ) कायिक- कटाक्ष, हस्तसंचालन आदि आंगिक चेष्टाएँ

(2 ) वाचिक- भाव-दशा के कारण वचन में आये परिवर्तन

(3 ) मानसिक- आंतरिक वृत्तियों से उत्पत्र प्रमोद आदि भाव

(4 ) आहार्य- कृतिम वेश रचना

(5 ) सात्विक- शरीर के स्वाभाविक अंग-विकार

सात्विक अनुभावों की संख्या आठ मानी गयी  है-

(1) स्तंभ (2) स्वेद (3) रोमांच (4) स्वर-भंग (5 )कम्प (6) विवर्णता  (7) अश्रु (8) प्रलय (संज्ञाहीनता/निश्चेष्टता)।

(3) व्यभिचारी या संचारी भाव :- आश्रय के मन में संचरण करनेवाले अस्थिर मनोविकारीर भाव ‘संचारी’ या ‘व्यभिचारी’ भाव कहलाते है।

इन भावों के वर्गीकरण के चार सिद्धान्त माने गए हैं- (i) देश, काल और अवस्था (ii) उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति वाले , (iii) आश्रय की अपनी प्रकृति या अन्य व्यक्तियों की उत्तेजना के कारण अथवा वातावरण के प्रभाव (iv) नायक  और नायिका  के अपने स्वभाव के भेद।

संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई है-

(1) हर्ष (2) विषाद (3) त्रास (भय/व्यग्रता) (4) लज्जा (ब्रीड़ा) (5) ग्लानि (6) चिंता (7) शंका (8) असूया (दूसरे के उत्कर्ष के प्रति असहिष्णुता) (9) अमर्ष (विरोधी का अपकार करने की अक्षमता से उत्पत्र दुःख) (10) मोह (11) गर्व (12) उत्सुकता (13) उग्रता (14) चपलता (15) दीनता (16) जड़ता (17) आवेग (18) निर्वेद (अपने को कोसना या धिक्कारना) (19) घृति (इच्छाओं की पूर्ति, चित्त की चंचलता का अभाव) (20) मति (21) बिबोध (चैतन्य लाभ) (22) वितर्क (23) श्रम (24) आलस्य (25) निद्रा (26) स्वप्न (27) स्मृति (28) मद (29) उन्माद (30) अवहित्था (हर्ष आदि भावों को छिपाना) (31) अपस्मार (मूर्च्छा) (32) व्याधि (रोग) (33) मरण

(4) स्थायी भाव :- रस के मूलभूत कारण को स्थायी भाव कहा गया  हैं।अर्थात जिस भाव का स्वरूप सजातीय एवं विजातीय भावों से तिरस्कृत न हो सके और जबतक रस का आस्वाद हो, तबतक जो वर्तमान रहे, वह स्थायी भाव कहलाता है।

 ‘नाट्यशास्त्र’ में भावों की संख्या 49 कही है, जिनमें 33 संचारी या व्यभिचारी, 8 सात्विक और शेष 8 ‘स्थायी भाव’ है।

 (i) रति, (ii) ह्रास (iii) शोक (iv) क्रोध (v) उत्साह (vi) भय (vii ) जुगुप्सा/घृणा (viii) विस्मय/आश्चर्य (ix)शम/निर्वेद (वैराग्य/वीतराग) (x)वात्सल्य रति (xi)भगवद विषयक रति/अनुराग  ,ये 11 भाव ‘स्थायी भाव’ के अंतर्गत माने गए है

निर्वेद ( शान्त ) भक्ति और वात्सल्य को  भी ‘स्थायी भाव’ माना है।

रस के प्रकार

मूल रूप से रस की संख्या 8 है – शृंगार, हास्य, करूण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अदभुत किन्तु  आचार्य मम्मट और पण्डितराज जगन्नाथ ने शान्त रस को सम्मिलित करने यह संख्या 9 हो जाती है ,इसी प्रकार आचार्य विश्वनाथ के  वात्सल्य रस को सम्मिलित करने पर 10 और रूपगोस्वामी के  ‘मधुर’(भक्ति ) रस को मान्यता देने पर रसों की संख्या 11 हो जाती है .

रसस्थाई भावउदहारण
श्रृंगाररतिबतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय । सौंह करै, भौंहनु हँसे, देन कै नटि जाय ॥
हास्यहासहाथी जैसा देह, गैंडे जैसी चाल। तरबूजे-सी खोपड़ी, खरबूजे-जैसे  गाल॥ 
करुणशोक  सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। धोति फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँय उपानह की नहिं सामा॥ .
वीरउत्साह  बुन्देलों हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

(1) शृंगार रस

जहाँ विभाव  ,अनुभाव भव और संचारी भाव के संयोग से रति नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति

हो शृंगार रस कहलाता है . सुखद और दुःखद अनुभूतियाँ  के  आधार पर इसके दो भेद किए गए हैं- संयोग शृंगार और वियोग शृंगार।

(i) संयोग शृंगार

जहाँ नायक-नायिका के संयोग या मिलन का वर्णन होता है, वहाँ संयोग शृंगार होता है।

उदाहरण-

 दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माही ।

गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद जुवा जुरि विप्र पढ़ाही।।

 राम को रूप निहारित जानकि कंकन के नग की परछाही ।

यातें सबै भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं।

यहाँ सीता का राम के प्रति जो प्रेम भाव है वही रति स्थायी भाव है अतः यह  संयोग शृंगार रस के अंतर्गत रखा जायेंगा हैं।

(ii) वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार

जहाँ वियोग की अवस्था में नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन होता है, वहाँ वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार होता है।

जहाँ नायक-नायिका के विरह से उत्पन्न पीड़ा का  वर्णन होता है, वहाँ वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार होता है।

उदाहरण- ”

उधो, मन न भए दस बीस।

एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥

इन्द्री सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।

 तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।

यहाँ गोपियों  का कृष्ण  के प्रति जो विरह भाव  प्रकट हुआ है अतः यहाँ वियोग श्रृंगार रस है।

(2) हास्य रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से हास नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति

हो हास्य रस कहलाता है

इसके अंतर्गत विकृत आकार, विकृत वेष, विकृत अभिधान, , विकृत वाणी, विकृत आंगिक चेष्टा  को देखकर मन में जो हास की उत्पत्ति होती है

उदाहरण

 काहू न लखा सो चरित विशेखा । जो सरूप नृप कन्या देखा ।

 मरकट बदन भयंकर देही। देखत हृदय क्रोध भा तेही ॥

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहि न बिलोकी भूली ॥

पुनि-पुनि उकसहिं अरु अकुलाही। देखि दसा हर-गन मुसुकाही ॥

स्पष्टीकरण-

स्थायी भाव – हास

आश्रय – शिव के गण

आलम्बन – वानर की आकृति में नारद

अनुभाव – नारद को देखना, मुस्कराना, ऊपर को उचकना आदि।

व्यभिचारी भाव – हर्ष

(3) करुण रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से शोक रस नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति

हो  करुण रस  कहलाता है

इष्ट की हानि, अनिष्ट  की  प्राप्ति , प्रिय का चिरवियोग, अर्थ हानि, आदि से जहाँ शोकभाव की परिपुष्टि होती है, वहाँ करुण रस होता है।

उदाहरण-

” आह ! वेदना मिली विदाई !

मैंने भ्रम – वश जीवन संचित

मधुकरियो की भीख लुटाई

छलछल थे संध्या के श्रमकण

आंसू – से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी

नीरवता अनंत अंगड़ाई। “

(4) वीर रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से उत्साह .नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो वीर  रस कहलाता है .

उदाहरण-

बुन्देलों हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

(5) रौद्र रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से क्रोध.नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो रौद्र रस कहलाता है .

उदहारण –

श्री कृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे

लव शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे

संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े

करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ खड़े। ।

 (6) भयानक रस

जहाँ विभाव  ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से भय नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो भयानक रस कहलाता है .

उदाहरण-

 ”एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय।

विकल बटोही बीच ही, परयों मूरछा खाय।।”

(7) बीभत्स रस

जहाँ विभाव ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से जुगुप्सा या घृणा नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो वीभत्स  रस कहलाता है

उदाहरण- ”सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।

खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।

गीध जाँघ को खोदि खोदि कै मांस उपारत।

स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।।”

 (8) अदभुत रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से विस्मय.नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो अद्भुत  रस कहलाता है

ऐसा जिसे देखकर सहज विश्वास न हो अर्थात अलौकिक अथवा आश्चर्यजनक हो 

अलौकिक, आश्चर्यजनक दृश्य या वस्तु को देखकर सहसा विश्वास नहीं होता और मन में स्थायी भाव विस्मय उत्पन्न होता हैं। यही विस्मय जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में पुष्ट होकर आस्वाद्य हो जाता है, तो अद्भुत रस उत्पन्न होता है।

उदाहरण-

देख यशोदा शिशु के मुख में,

 सकल विश्व की माया ।

क्षण भर को वह बनी अचेतन,

हिल न सकी कोमल काया।।

पद पाताल सीस अजयधामा , अपर लोक अंग-अंग विश्राम

भृकुटि बिलास भयंकर काला , नयन दिवाकर कच धन माला। ।

व्याख्या –

प्रस्तुत पंक्ति में लंका नरेश रावण की पत्नी मंदोदरी स्वप्न में राम के विराट रूप का दर्शन करती है।  जिसके पैर पाताल में और शीश  आकाश लोक में है।  उनके विशाल अंग अनेकों लोक में फैले हुए हैं।  उनकी आंखें बिल्कुल लाल ऐसे प्रतीत हो रही है जैसे उन्होंने मुंडो की माला धारण की हुई है।  राम के इस विशाल रूप का वर्णन रावण को सुना रही है और उनसे बैर मोल लेने को मना कर रही है।

(9) शान्त रस

जहाँ विभाव ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से निर्वेद नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो शान्त रस कहलाता है

उदाहरण-

अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।

राम कृपा भव-निसा सिरानी, जागै फिरि न डसैहौं ॥

पायौ नाम चारु-चिन्तामनि, उर-करते न खसैहौं।

स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, उर-कंचनहि कसैहौ ॥

परबस जानि हस्यौ इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं ।

मन-मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैंहौं ।।

स्पष्टीकरण-

इस वर्णन में कबि को ज्ञान हो गया है। वह अब माया के बन्धन से मुक्त होना चाहता है।

आश्रय – कवि तुलसीदास

आलम्बन – संसार की नश्वरता का ज्ञान, ईश्वरीय सत्ता का आभास

उद्दीपन – शास्त्रों का अध्ययन, साधु संगति आदि

अनुभाव – रोमांच

व्यभिचारी भाव – धैर्य, मति, विबोध, हर्ष आदि

रस – शान्त रस की व्यंजना

स्थायी भाव – निर्वेद।

”सुत वनितादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबही ते।

अन्तहिं तोहि तजेंगे पामर! तू न तजै आभि ते।।

अब नाथहिं अनुराग जाग जड़, त्यागु दुरदसा जीते।

बुझै न काम अगिनि ‘तुलसी’ कहुँ विषय भोग बहु घी ते।।”

यहाँ स्थायी भाव, निर्वेद आश्रय, सम्बोधित सांसरिक जन आलम्बन, सुत वनिता आदि अनुभाव, सुत वनितादि को छोड़ने को कहना संचारी भाव धृति, मति विमर्श आदि हैं, अतः यहाँ शान्त रस है।

शास्त्रीय दृष्टि से नौ ही रस माने गए हैं लेकिन कुछ विद्वानों ने सूर और तुलसी की रचनाओं के आधार पर दो नए रसों को मान्यता प्रदान की है- वात्सल्य और भक्ति।

(10) वात्सल्य रस

जहाँ विभाव   ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से वत्सलता नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो वात्सल्य  रस कहलाता है .

वात्सल्य रस का सम्बन्ध छोटे बालक-बालिकाओं के प्रति माता-पिता एवं सगे-सम्बन्धियों का प्रेम एवं ममता के भाव से है।

हिन्दी कवियों में सूरदास ने वात्सल्य रस को पूर्ण प्रतिष्ठा दी है। तुलसीदास की विभिन्न कृतियों के बालकाण्ड में वात्सल्य रस की सुन्दर व्यंजना द्रष्टव्य है। वात्सल्य रस का स्थायी भाव वत्सलता या स्नेह है।

उदाहरण-

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।

हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ सोइ, कछु गावै।

सन्देश देवकी सों कहिए,

हौं तो धाम तिहारे सुत कि कृपा करत ही रहियो।

तुक तौ टेव जानि तिहि है हौ तऊ, मोहि कहि आवै

प्रात उठत मेरे लाल लडैतहि माखन रोटी भावै।

बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाति

अंचरा-तर लै ढ़ाकी सूर, प्रभु कौ दूध पियावति

”किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।

मणिमय कनक नन्द के आँगन बिम्ब पकरिबे धावत।

कबहूँ निरखि हरि आप छाँह को कर सो पकरन चाहत।

किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ पुनि पुनि तिहि अवगाहत।।”

यहाँ स्थायी भाव वत्सलता या स्नेह, आलम्बन कृष्ण की बाल सुलभ चेस्टाएँ, उद्दीपन किलकना, बिम्ब को पकड़ना, अनुभाव रोमांचित होना, मुख चूमना, संचारी भाव हर्ष, गर्व, चपलता, उत्सुकता आदि हैं, अतः यहाँ वात्सल्य रस है।

(11) भक्ति रस

जहाँ विभाव ,अनुभाव  और संचारी भाव के संयोग से देव रति नामक स्थाई भाव की उत्पत्ति  हो भक्ति रस कहलाता है

भक्ति रस शान्त रस से भिन्न है। शान्त रस जहाँ निर्वेद या वैराग्य की ओर ले जाता है वहीं भक्ति ईश्वर विषयक रति की ओर ले जाते हैं यही इसका स्थायी भाव भी है। भक्ति रस के पाँच भेद हैं- शान्त, प्रीति, प्रेम, वत्सल और मधुर। ईश्वर के प्रति भक्ति भावना स्थायी रूप में मानव संस्कार में प्रतिष्ठित है, इस दृष्टि से भी भक्ति रस मान्य है।उदाहरण- ”मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरों न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।।

साधुन संग बैठि लोक-लाज खोई।

अब तो बात फैल गई जाने सब कोई।”

यहाँ स्थायी भाव ईश्वर विषयक रति, आलम्बन श्रीकृष्ण उद्दीपन कृष्ण लीलाएँ, सत्संग, अनुभाव-रोमांच, अश्रु, प्रलय, संचारी भाव हर्ष, गर्व, निर्वेद, औत्सुक्य आदि हैं अतः यहाँ भक्ति रस है।

रस    स्थायी भाव  उदाहरण

(1) शृंगार रस       रति/प्रेम      (i) संयोग शृंगार : बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।

(संभोग श्रृंगार): सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)

(ii) वियोग श्रृंगार : निसिदिन बरसत नयन हमारे

(विप्रलंभ श्रृंगार): सदा रहित पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे।।(सूरदास)

(2) हास्य रस       हास   तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,

साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।

घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,

धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

(3) करुण रस      शोक  सोक बिकल सब रोवहिं रानी।

रूपु सीलु बलु तेजु बखानी।।

करहिं विलाप अनेक प्रकारा।।

परिहिं भूमि तल बारहिं बारा।। (तुलसीदास)

(4) वीर रस उत्साह       वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।

सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।

तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं।। (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

(5) रौद्र रस क्रोध  श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।

सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे।

संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।

करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े।। (मैथिली शरण गुप्त)

(6) भयानक रस   भय   उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी।

चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी।। (जयशंकर प्रसाद)

(7) बीभत्स रस     जुगुप्सा/घृणा        सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।

खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।।

गीध जांघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।

स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।। (भारतेन्दु)

(8) अदभुत रस    विस्मय/आश्चर्य      आखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।

चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।। (सेनापति)

(9) शांत रस        शम/निर्वेद

(वैराग्य/वीतराग)   मन रे तन कागद का पुतला।

लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।। (कबीर)

(10) वत्सल रस     वात्सल्य रति        किलकत कान्ह घुटरुवन आवत।

मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत।। (सूरदास)

(11) भक्ति रस      भगवद विषयक

रति/अनुराग        राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।

घोर भव नीर-निधि, नाम निज नाव रे।। (तुलसीदास)

नोट:

(1) शृंगार रस को ‘रसराज/ रसपति’ कहा जाता है।

(2) नाटक में 8 ही रस माने जाते है क्योंकि वहां शांत को रस में नहीं गिना जाता। भरत मुनि ने रसों की संख्या 8 माना है।

(3) भरत मुनि ने केवल 8 रसों की चर्चा की है, पर आचार्य अभिन्नगुप्त (950-1020 ई०) ने ‘नवमोऽपि शान्तो रसः कहकर 9 रसों को काव्य में स्वीकार किया है।

(4) श्रृंगार रस के व्यापक दायरे में वत्सल रस व भक्ति रस आ जाते हैं इसलिए रसों की संख्या 9 ही मानना ज्यादा उपयुक्त है।

रस संबंधी विविध तथ्य

भरतमुनि (1 वी सदी) को ‘काव्यशास्त्र का प्रथम आचार्य’ माना जाता है। सर्वप्रथम आचार्य भरत मुनि ने अपने ग्रंथ ‘नाट्य शास्त्र’ में रस का विवेचन किया। उन्हें रस संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।

भरत मुनि के कुछ प्रमुख सूत्र

(1) ‘विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद् रस निष्पतिः’- विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी (संचारी) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

(2) ‘नाना भावोपगमाद् रस निष्पतिः। नाना भावोपहिता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्ति।’- नाना (अनेक) भावों के उपागम (निकट आने/ मिलने) से रस की निष्पत्ति होती है। नाना (अनेक) भावों से युक्त स्थायी भाव रसावस्था को प्राप्त होते हैं।

(3) ‘विभावानुभाव व्यभिचारि परिवृतः स्थायी भावो रस नाम लभते नरेन्द्रवत्’ ।- विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी से घिरे रहने वाले स्थायी भाव की स्थिति राजा के समान हैं। दूसरे शब्दों में, विभाव, अनुभाव व व्यभिचारी (संचारी) भाव को परिधीय स्थिति और स्थायी भाव को केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है।

(4) रस-संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य, मम्मट (11 वी० सदी) ने काव्यानंद को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ (ब्रह्मानंद- योगी द्वारा अनुभूत आनंद) कहा है। वस्तुतः रस के संबंध में ब्रह्मानंद की कल्पना का मूल स्रोत तैत्तरीय उपनिषद है जिसमें कहा गया है ‘रसो वै सः’- आनंद ही ब्रह्म है।

(5)रस-संप्रदाय के एक अन्य आचार्य, आचार्य विश्वनाथ (14 वी० सदी) ने रस को काव्य की कसौटी माना है। उनका कथन है ‘वाक्य रसात्मकं काव्यम्’- रसात्मक वाक्य ही काव्य है।

(6) हिन्दी में रसवादी आलोचक हैं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल डॉ० नगेन्द्र आदि। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संस्कृत के रसवादी आचार्यों की तरह रस को अलौकिक न मानकर लौकिक माना है और उसकी लौकिक व्याख्या की है। वे रस की स्थिति को ‘ह्रदय की मुक्तावस्था’ के रूप में मानते हैं। उनके शब्द हैं : ‘लोक-हृदय में व्यक्ति-हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस-दशा है’।

छन्द (Metres) की परिभाषा

वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आहाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते है।

दूसरे शब्दो में-अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रागणना तथा यति-गति से सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना ‘छन्द’ कहलाती है।

महर्षि पाणिनी के अनुसार जो आह्मादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है (चन्दति हष्यति येन दीप्यते वा तच्छन्द) ।

उनके विचार से छंद ‘चदि’ धातु से निकला है। यास्क ने निरुक्त में ‘छन्द’ की व्युत्पत्ति ‘छदि’ धातु से मानी है जिसका अर्थ है ‘संवरण या आच्छादन’ (छन्दांसि छादनात्) ।

इन दोनों अतिप्राचीन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि छंदोबद्ध रचना केवल आह्यादकारिणी ही नहीं होती, वरन् वह चिरस्थायिनी भी होती है। जो रचना छंद में बँधी नहीं है उसे हम याद नहीं रख पाते और जिसे याद नहीं रख पाते, उसका नष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है। इन परिभाषाओं के अतिरिक्त सुगमता के लिए यह समझ लेना चाहिए कि जो पदरचना अक्षर, अक्षरों की गणना, क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना, यति-गति आदि नियमों से नियोजित हो, वह छंदोबद्ध कहलाती है।

छंद शब्द ‘छद्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘आह्लादित करना’, ‘खुश करना।’ ‘छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद-शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे।

‘छन्द’ की प्रथम चर्चा ऋग्वेद में हुई है। यदि गद्य का नियामक व्याकरण है, तो कविता का छन्दशास्त्र। छन्द पद्य की रचना का मानक है और इसी के अनुसार पद्य की सृष्टि होती है। पद्यरचना का समुचित ज्ञान ‘छन्दशास्त्र’ का अध्ययन किये बिना नहीं होता। छन्द हृदय की सौन्दर्यभावना जागरित करते है। छन्दोबद्ध कथन में एक विचित्र प्रकार का आह्राद रहता है, जो आप ही जगता है। तुक छन्द का प्राण है- यही हमारी आनन्द-भावना को प्रेरित करती है। गद्य में शुष्कता रहती है और छन्द में भाव की तरलता। यही कारण है कि गद्य की अपेक्षा छन्दोबद्ध पद्य हमें अधिक भाता है।

सौन्दर्यचेतना के अतिरिक्त छन्द का प्रभाव स्थायी होता है। इसमें वह शक्ति है, जो गद्य में नहीं होती। छन्दोबद्ध रचना का हृदय पर सीधा प्रभाव पड़ता है। गद्य की बातें हवा में उड़ जाती है, लेकिन छन्दों में कही गयी कोई बात हमारे हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है। मानवीय भावों को आकृष्ट करने और झंकृत करने की अदभुत क्षमता छन्दों में होती है। छन्दाबद्ध रचना में स्थायित्व अधिक है। अपनी स्मृति में ऐसी रचनाओं को दीर्घकाल तक सँजोकर रखा जा सकता है। इन्हीं कारणों से हिन्दी के कवियों ने छन्दों को इतनी सहृदयता से अपनाया। अतः छन्द अनावश्यक और निराधार नहीं हैं। इनकी भी अपनी उपयोगिता और महत्ता है। हिन्दी में छन्दशास्त्र का जितना विकास हुआ, उतना किसी भी देशी-विदेशी भाषा में नहीं हुआ।

छन्द के अंग

छन्द के निम्नलिखित अंग है-

(1)चरण /पद /पाद

(2) वर्ण और मात्रा

(3) संख्या क्रम और गण

(4)लघु और गुरु

(5) गति

(6) यति /विराम

(7) तुक

(1) चरण /पद /पादा

छंद के प्रायः 4 भाग होते हैं। इनमें से प्रत्येक को ‘चरण’ कहते हैं।

दूसरे शब्दों में- छंद के चतुर्थाश (चतुर्थ भाग) को चरण कहते हैं।

कुछ छंदों में चरण तो चार होते है लेकिन वे लिखे दो ही पंक्तियों में जाते हैं, जैसे- दोहा, सोरठा आदि। ऐसे छंद की प्रत्येक को ‘दल’ कहते हैं।

हिन्दी में कुछ छंद छः-छः पंक्तियों (दलों) में लिखे जाते हैं। ऐसे छंद दो छंदों के योग से बनते है, जैसे कुण्डलिया (दोहा +रोला), छप्पय (रोला +उल्लाला) आदि।

चरण 2 प्रकार के होते है- सम चरण और विषम चरण।

प्रथम व तृतीय चरण को विषम चरण तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण को सम चरण कहते हैं।

(2) वर्ण और मात्रा

वर्ण/अक्षर

एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर हस्व हो या दीर्घ।

जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो (जैसे हलन्त शब्द राजन् का ‘न्’, संयुक्ताक्षर का पहला अक्षर- कृष्ण का ‘ष्’) उसे वर्ण नहीं माना जाता।

वर्ण को ही अक्षर कहते हैं। ‘वर्णिक छंद’ में चाहे हस्व वर्ण हो या दीर्घ- वह एक ही वर्ण माना जाता है; जैसे- राम, रामा, रम, रमा इन चारों शब्दों में दो-दो ही वर्ण हैं।

मात्रा

किसी वर्ण या ध्वनि के उच्चारण-काल को मात्रा कहते हैं।

दूसरे शब्दों में- किसी वर्ण के उच्चारण में जो अवधि लगती है, उसे मात्रा कहते हैं।

हस्व वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे एक मात्रा तथा दीर्घ वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे दो मात्रा माना जाता है।

मात्रा दो प्रकार के होते है-

हस्व : अ, इ, उ, ऋ

दीर्घ : आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ

वर्ण और मात्रा की गणना

वर्ण की गणना

हस्व स्वर वाले वर्ण (हस्व वर्ण)- एकवर्णिक- अ, इ, उ, ऋ; क, कि, कु, कृ

दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण)- एकवर्णिक- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ; का, की, कू, के, कै, को, कौ

मात्रा की गणना

हस्व स्वर- एकमात्रिक- अ, इ, उ, ऋ

दीर्घ स्वर- द्विमात्रिक- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ

वर्णो और मात्राओं की गिनती में स्थूल भेद यही है कि वर्ण ‘सस्वर अक्षर’ को और मात्रा ‘सिर्फ स्वर’ को कहते है।

वर्ण और मात्रा में अंतर- वर्ण में हस्व और दीर्घ रहने पर वर्ण-गणना में कोई अंतर नहीं पड़ता है, किंतु मात्रा-गणना में हस्व-दीर्घ से बहुत अंतर पड़ जाता है। उदाहरण के लिए, ‘भरत’ और ‘भारती’ शब्द कोलें। दोनों में तीन वर्ण हैं, किन्तु पहले में तीन मात्राएँ और दूसरे में पाँच मात्राएँ हैं।

(3) संख्या क्रम और गण

वर्णो और मात्राओं की सामान्य गणना को संख्या कहते हैं, किन्तु कहाँ लघुवर्ण हों और कहाँ गुरुवर्ण हों- इसके नियोजन को क्रम कहते है।

छंद-शास्त्र में तीन मात्रिक वर्णो के समुदाय को गण कहते है।

वर्णिक छंद में न केवल वर्णों की संख्या नियत रहती है वरन वर्णो का लघु-गुरु-क्रम भी नियत रहता है।

मात्राओं और वर्णों की ‘संख्या’ और ‘क्रम’ की सुविधा के लिए तीन वर्णों का एक-एक गण मान लिया गया है। इन गणों के अनुसार मात्राओं का क्रम वार्णिक वृतों या छन्दों में होता है, अतः इन्हें ‘वार्णिक गण’ भी कहते है। इन गणों की संख्या आठ है। इनके ही उलटफेर से छन्दों की रचना होती है। इन गणों के नाम, लक्षण, चिह्न और उदाहरण इस प्रकार है-

गण   वर्ण क्रम     चिह्न   उदाहरण    प्रभाव

यगण आदि लघु, मध्य गुरु, अन्त गुरु ।ऽऽ   बहाना        शुभ

मगन आदि, मध्य, अन्त गुरु    ऽऽ    आजादी      शुभ

तगण आदि गुरु, मध्य गुरु, अन्त लघु ऽऽ।   बाजार        अशुभ

रगण  आदि गुरु, मध्य लघु, अन्त गुरु ऽ।ऽ   नीरजा        अशुभ

जगण आदि लघु, मध्य गुरु, अन्त लघु ।ऽ।   प्रभाव अशुभ

भगण आदि गुरु, मध्य लघु, अन्त लघु ऽ।।   नीरद शुभ

नगण आदि, मध्य, अन्त लघु    ।।।    कमल        शुभ

सगन आदि लघु, मध्य लघु, अन्त गुरु ।।ऽ   वसुधा अशुभ

काव्य या छन्द के आदि में ‘अगण’ अर्थात ‘अशुभ गण’ नहीं पड़ना चाहिए। शायद उच्चारण कठिन अर्थात उच्चारण या लय में दग्ध होने के कारण ही कुछ गुणों को ‘अशुभ’ कहा गया है। गणों को सुविधापूर्वक याद रखने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा: । इस सूत्र में प्रथम आठ वर्णों में आठ गणों के नाम आ गये है। अन्तिम दो वर्ण ‘ल’ और ‘ग’ छन्दशास्त्र में ‘दशाक्षर’ कहलाते हैं। जिस गण का स्वरूप जानना हो, उस गण के आद्यक्षर और उससे आगे दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लेना होता है। जैसे- ‘तगण’ का स्वरूप जानना हो तो इस सूत्र का ‘ता’ और उससे आगे के दो अक्षर ‘रा ज’=’ताराज’, ( ऽऽ।) लेकर ‘तगण’ का लघु-गुरु जाना जा सकता है कि ‘तगण’ में गुरु+गुरु+लघु, इस क्रम से तीन वर्ण होते है। यहाँ यह स्मरणीय है कि ‘गण’ का विचार केवल वर्णवृत्त में होता है, मात्रिक छन्द इस बन्धन से मुक्त है।

(4) लघु और गुरु

लघु-

(i) अ, इ, उ- इन हस्व स्वरों तथा इनसे युक्त एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को ‘लघु’ समझा जाता है। जैसे- कलम; इसमें तीनों वर्ण लघु हैं। इस शब्द का मात्राचिह्न हुआ- ।।।।

(ii) चन्द्रबिन्दुवाले हस्व स्वर भी लघु होते हैं। जैसे- ‘हँ’ ।

गुरु-(i) आ, ई, ऊ और ऋ इत्यादि दीर्घ स्वर और इनसे युक्त व्यंजन गुरु होते है। जैसे- राजा, दीदी, दादी इत्यादि। इन तीनों शब्दों का मात्राचिह्न हुआ- ऽऽ।

(ii) ए, ऐ, ओ, औ- ये संयुक्त स्वर और इनसे मिले व्यंजन भी गुरु होते हैं। जैसे- ऐसा ओला, औरत, नौका इत्यादि।

(iii) अनुस्वारयुक्त वर्ण गुरु होता है। जैसे- संसार। लेकिन, चन्द्रबिन्दुवाले वर्ण गुरु नहीं होते।

(iv) विसर्गयुक्त वर्ण भी गुरु होता है। जैसे- स्वतः, दुःख; अर्थात- ।ऽ, ऽ ।।

(v) संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण गुरु होता है। जैसे- सत्य, भक्त, दुष्ट, धर्म इत्यादि, अर्थात- ऽ।।

(5) गति

छंद के पढ़ने के प्रवाह या लय को गति कहते हैं।

वर्णवृत्तों में इसकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु मात्रिक वृतों में इसकी आवश्यकता पड़ती है। ‘जब सकोप लखन वचन बोले’ में ९६ मात्राएँ हैं, लेकिन इसे हम चौपाई का एक चरण नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें गति नहीं है। गति ठीक करने के लिए इसे ‘लखन सकोप वचन जब बोले’ करना पड़ेगा।

गति का महत्व वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों में अधिक है। बात यह है कि वर्णिक छंदों में तो लघु-गुरु का स्थान निश्चित रहता है किन्तु मात्रिक छंदों में लघु-गुरु का स्थान निश्चित नहीं रहता, पूरे चरण की मात्राओं का निर्देश मात्र रहता है।

मात्राओं की संख्या ठीक रहने पर भी चरण की गति (प्रवाह) में बाधा पड़ सकती है।

जैसे- (1) दिवस का अवसान था समीप में गति नहीं है जबकि ‘दिवस का अवसान समीप था’ में गति है।

(2) चौपाई, अरिल्ल व पद्धरि- इन तीनों छंदों के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं होती है पर गति भेद से ये छंद परस्पर भिन्न हो जाते हैं।

अतएव, मात्रिक छंदों के निर्दोष प्रयोग के लिए गति का परिज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।

गति का परिज्ञान भाषा की प्रकृति, नाद के परिज्ञान एवं अभ्यास पर निर्भर करता है।

(6) यति /विराम

छंद में नियमित वर्ण या मात्रा पर साँस लेने के लिए रूकना पड़ता है, इसी रूकने के स्थान को यति या विराम कहते है।

छन्दशास्त्र में ‘यति’ का अर्थ विराम या विश्राम ।

छोटे छंदों में साधारणतः यति चरण के अन्त में होती है; पर बड़े छंदों में एक ही चरण में एक से अधिक यति या विराम होते है।

बड़े छंदों के एक-एक चरण में इतने अधिक वर्ण होते हैं कि लय को ठीक करने तथा उच्चारण की स्पष्टता के लिए कहीं-कहीं रुकना आवश्यक हो जाता है। जैसे- ‘देवघनाक्षरी’ छंद के प्रत्येक चरण में ३३ वर्ण होते हैं और इसमें ८, ८, ८, ९ पर यति होती है। अर्थात आठ, आठ, आठ वर्णों के पश्र्चात तीन बार थोड़ा रुककर उच्चारण करना पड़ता है।

(7) तुक

छंद के चरणों के अंत में समान स्वरयुक्त वर्ण स्थापना को ‘तुक’ कहते हैं।

जैसे- आई, जाई, चक्र-वक्र आदि से चरण समाप्त करने पर कहा जाता है कि कविता तुकांत है।

जिस छंद के अंत में तुक हो उसे तुकान्त छंद और जिसके अन्त में तुक न हो उसे अतुकान्त छंद कहते हैं।

अतुकान्त छंद को अँग्रेजी में ब्लैंक वर्स (Blank Verse) कहते हैं।

छन्द के भेद

वर्ण और मात्रा के विचार से छन्द के चार भेद है-

(1) वर्णिक छन्द

(2) वर्णिक वृत्त

(3) मात्रिक छन्द

(4) मुक्तछन्द

(1) वर्णिक छन्द- जिन छंदों में वर्णों की संख्या, क्रम, गणविधान तथा लघु-गुरु के आधार पर

पदरचना होती है, उन्हें ‘वर्णिक छंद’ कहते हैं।

दूसरे शब्दों में- केवल वर्णगणना के आधार पर रचा गया छन्द ‘वार्णिक छन्द’ कहलाता है।

सरल शब्दों में- जिस छंद के सभी चरणों में वर्णो की संख्या समान हो। उन्हें ‘वर्णिक छंद’ कहते हैं।

वर्णिक छंद के सभी चरणों में वर्णो की संख्या समान रहती है और लघु-गुरु का क्रम समान रहता है।

‘वृतों’ की तरह इसमें लघु-गुरु का क्रम निश्र्चित नहीं होता, केवल वर्णसंख्या ही निर्धारित रहती है और इसमें चार चरणों का होना भी अनिवार्य नहीं।

वार्णिक छन्द के भेदवार्णिक छन्द के दो भेद है- (i) साधारण और (ii) दण्डक

१ से २६ वर्ण तक के चरण या पाद रखनेवाले वार्णिक छन्द ‘साधारण’ होते है और इससे अधिकवाले दण्डक।

प्रमुख वर्णिक छंद : प्रमाणिका (8 वर्ण); स्वागता, भुजंगी, शालिनी, इन्द्रवज्रा, दोधक (सभी 11 वर्ण); वंशस्थ, भुजंगप्रयात, द्रुतविलम्बित, तोटक (सभी 12 वर्ण); वसंततिलका (14 वर्ण); मालिनी (15 वर्ण); पंचचामर, चंचला (सभी 16 वर्ण); मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी (सभी 17 वर्ण), शार्दूल विक्रीडित (19 वर्ण), स्त्रग्धरा (21 वर्ण), सवैया (22 से 26 वर्ण), घनाक्षरी (31 वर्ण) रूपघनाक्षरी (32 वर्ण), देवघनाक्षरी (33 वर्ण), कवित्त /मनहरण (31-33 वर्ण)।

दण्डक वार्णिक छन्द ‘घनाक्षरी’ का उदाहरण-

किसको पुकारे यहाँ रोकर अरण्य बीच । -१६ वर्ण

चाहे जो करो शरण्य शरण तिहारे हैं।। – १५वर्ण

‘देवघनाक्षरी’ का उदाहरण-

झिल्ली झनकारै पिक -८ वर्ण

चातक पुकारैं बन -८ वर्ण

मोरिन गुहारैं उठै -८ वर्ण

जुगनु चमकि चमकि -८ वर्ण

कुल- ३३ वर्ण

‘रूपघनाक्षरी’ का उदाहरण

ब्रज की कुमारिका वे -८ वर्ण

लीनें सक सारिका ब -८ वर्ण

ढावैं कोक करिकानी -८ वर्ण

केसव सब निबाहि -८ वर्ण

कुल- ३२ वर्ण

साधारण वार्णिक छन्द (२६ वर्ण तक का छन्द) में ‘अमिताक्षर’ छन्द को उदाहरणस्वरूप लिया जा सकता है। अमिताक्षर वस्तुतः घनाक्षरी के एक चरण के उत्तरांश से निर्मित छन्द है, अतः इसमें ९५ वर्ण होते है और ८ वें तथा ७ वें वर्ण पर यति होती है। जैसे-

चाहे जो करो शरण्य -८ वर्ण

शरण तिहारे है -७ वर्ण

कुल-९५ वर्ण

वर्णिक छंद का एक उदाहरण : मालिनी (15 वर्ण)

वर्णो की संख्या-15, यति 8 और 7 पर

परिभाषा-

न……….न………..म………..य………..य ….. मिले तो मालिनी होवे

।………..।……….. ।………..।……….. ।

नगन……नगन……मगन…..यगण……..यगण

।।।…….।।।……….ऽऽऽ…….।ऽऽ…….।ऽऽ

3……..3…………3…………3………3 =15 वर्ण

प्रथम चरण- प्रिय पति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है ?

द्वितीय चरण- दुःख-जलनिधि-डूबी का सहारा कहाँ है ?

तृतीय चरण- लख मुख जिसका मैं आज लौं जी सकी हूँ,

चतुर्थ चरण- वह हृदय हमारा नैन-तारा कहाँ है ? (हरिऔध)

1…..2…..3…..4…..5……6……7……8…….9……..10…..11……..12……13…..14…..15

(प्रि).(य).(प)…(ति)…(व)…(ह)….(में)…(रा)…(प्रा)…..(ण)…..(प्या)…..(रा)…..(क)…..(हाँ)…..(है)

……नगन……………..नगन………….. मगन……………………यगण……………………यगण

(2) वार्णिक वृत्त- वृत्त उस समछन्द को कहते है, जिसमें चार समान चरण होते है और प्रत्येक चरण में आनेवाले वर्णों का लघु-गुरु-क्रम सुनिश्र्चित रहता है। गणों में वर्णों का बँधा होना प्रमुख लक्षण होने के कारण इसे वार्णिक वृत्त, गणबद्ध या गणात्मक छन्द भी कहते हैं। ७ भगण और २ गुरु का ‘मत्तगयन्द सवैया’ इसके उदाहरणस्वरूप है-

भगण भगण भगण भगण

ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ।।

या लकुटी अरु कामरि या पर

भगण भगण भगण गग

ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ

राज तिहूँ पुर को तजि डारौं : – कुल ७ भगण +२ गुरु=२३ वर्ण

‘द्रुतविलम्बित’ और ‘मालिनी’ आदि गणबद्ध छन्द ‘वार्णिक वृत्त’ है।

(3) मात्रिक छन्द- जिन छंदों में मात्राओं की संख्या, लघु-गुरु, यति-गति के आधार पर पदरचना होती है, उन्हें मात्रिक छन्द कहते हैं।

दूसरे शब्दों में- मात्रा की गणना पर आधृत छन्द ‘मात्रिक छन्द’ कहलाता है।

मात्रिक छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या तो समान रहती है लेकिन लघु-गुरु के क्रम पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

इसमें वार्णिक छन्द के विपरीत, वर्णों की संख्या भित्र हो सकती है और वार्णिक वृत्त के अनुसार यह गणबद्ध भी नहीं है, बल्कि यह गणपद्धति या वर्णसंख्या को छोड़कर केवल चरण की कुल मात्रासंख्या के आधार ही पर नियमित है। ‘दोहा’ और ‘चौपाई’ आदि छन्द ‘मात्रिक छन्द’ में गिने जाते है। ‘दोहा’ के प्रथम-तृतीय चरण में ९३ मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ में ९९ मात्राएँ होती है। जैसे-

प्रथम चरण- श्री गुरु चरण सरोज रज – १३ मात्राएँ

द्वितीय चरण- निज मन मुकुर सुधार- ११ मात्राएँ

तृतीय चरण- बरनौं रघुबर विमल जस- १३ मात्राएँ

चतुर्थ चरण- जो दायक फल चार- ११ मात्राएँ

उपयुक्त दोहे के प्रथम चरण में ११ वर्ण और तृतीय चरण में १२ वर्ण है जबकि कुल मात्राएँ गिनने पर १३-१३ मात्राएँ ही दोनों चरणों में होती है। गण देखने पर पहले चरण में भगण, नगन, जगण और दो लघु तथा तीसरे चरण में सगण , नगण, नगण, नगण है। अतः ‘मात्रिक छन्द’ के चरणों में मात्रा का ही साम्य होता है, न कि वर्णों या गणों का।

प्रमुख मात्रिक छंद

(A) सम मात्रिक छंद : अहीर (11 मात्रा), तोमर (12 मात्रा), मानव (14 मात्रा); अरिल्ल, पद्धरि/पद्धटिका, चौपाई (सभी 16 मात्रा); पीयूषवर्ष, सुमेरु (दोनों 19 मात्रा), राधिका (22 मात्रा), रोला, दिक्पाल, रूपमाला (सभी 24 मात्रा), गीतिका (26 मात्रा), सरसी (27 मात्रा), सार (28 मात्रा), हरिगीतिका (28 मात्रा), ताटंक (30 मात्रा), वीर या आल्हा (31 मात्रा) ।

(B) अर्द्धसम मात्रिक छंद : बरवै (विषम चरण में- 12 मात्रा, सम चरण में- 7 मात्रा), दोहा (विषम- 13, सम- 11), सोरठा (दोहा का उल्टा), उल्लाला (विषम-15, सम-13)।

(C) विषम मात्रिक छंद : कुण्डलिया (दोहा +रोला), छप्पय (रोला +उल्लाला)।

(4) मुक्तछन्द-जिस समय छंद में वर्णिक या मात्रिक प्रतिबंध न हो, न प्रत्येक चरण में वर्णो की संख्या और क्रम समान हो और मात्राओं की कोई निश्चित व्यवस्था हो तथा जिसमें नाद और ताल के आधार पर पंक्तियों में लय लाकर उन्हें गतिशील करने का आग्रह हो, वह मुक्त छंद है।

उदाहरण- निराला की कविता ‘जूही की कली’ इत्यादि।

चरणों की अनियमित, असमान, स्वच्छन्द गति और भावानुकूल यतिविधान ही मुक्तछन्द की विशेषता है। इसका कोई नियम नहीं है। यह एक प्रकार का लयात्मक काव्य है, जिसमें पद्य का प्रवाह अपेक्षित है। निराला से लेकर ‘नयी कविता’ तक हिन्दी कविता में इसका अत्यधिक प्रयोग हुआ है।

इसमें न तो वर्णों की गणना होती है, न मात्राओं की। भाव-प्रवाह के आधार पर पदरचना होती है।

प्रमुख वर्णिक छंद

(1) इंद्रवज्रा (2) उपेन्द्रवज्रा (3) तोटक (4) वंशस्थ (5) द्रुतविलंबित (6) भुजंगप्रयात (7) वसंततिलका

(8) मालिनी (9) मंदाक्रांता (10) शिखरिणी (11) शार्दूलविक्रीडित (12) सवैया (13) कवित्त

(1) इंद्रवज्रा- प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। इनका क्रम है- तगण, नगण, जगण तथा अंत में दो गुरु (ऽऽ ।, । । ।, । ऽ।, ऽऽ) । यथा-

तूही बसा है मन में हमारे।

तू ही रमा है इस विश्र्व में भी।।

तेरी छटा है मनमुग्धकारी।

पापापहारी भवतापहारी।।

(2) उपेन्द्रवज्रा- प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- जगण, तगण, जगण और अंत में दो गुरु (। ऽ।, ऽऽ ।, । ऽ।, ऽऽ) । यथा-

बड़ा कि छोटा कुछ काम कीजै।

परन्तु पूर्वापर सोच लीजै।।

बिना विचारे यदि काम होगा।।

कभी न अच्छा परिणाम होगा।।

(3) तोटक- प्रत्येक चरण में चार सगण ( । । ऽ) अर्थात १२ वर्ण होते हैं। यथा –

जय राम सदा सुखधाम हरे।

रघुनायक सायक-चाप धरे।।

भवबारन दारन सिंह प्रभो।

गुणसागर नागर नाथ विभो।।

(4) वंशस्थ- प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- जगण, तगण, जगण और रगण (। ऽ।, ऽऽ ।, । ऽ।, ऽ। ऽ) । यथा-

जहाँ लगा जो जिस कार्य बीच था।

उसे वहाँ ही वह छोड़ दौड़ता।।

समीप आया रथ के प्रमत्त सा।

विलोकन को घनश्याम माधुरी।।

(5) द्रुतविलम्बित- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक नगण (।।।), दो भगण (ऽ।।, ऽ।।)और एक रगण (ऽ।ऽ) के क्रम से 12 वर्ण होते हैं। उदाहरण-

न जिसमें कुछ पौरुष हो यहाँ,

सफलता वह पा सकता कहाँ ?

(6) भुजंगप्रयात- इसके प्रत्येक चरण में १२ वर्ण होते हैं। इसमें चार यगण होते हैं। यथा-

अरी व्यर्थ है व्यंजनों की बड़ाई।

हटा थाल तू क्यों इसे साथ लाई।।

वही पार है जो बिना भूख भावै।

बता किंतु तू ही उसे कौन खावै।।

(7) वसंततिलका- इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं। वर्णो के क्रम में तगण ( ऽऽ।), भगण (ऽ।।),

दो जगण (। ऽ।, । ऽ।) तथा दो गुरु ( ऽऽ) रहते हैं। जैसे-

रे क्रोध जो सतत अग्नि बिना जलावे।

भस्मावशेष नर के तन को बनावे।।

ऐसा न और तुझ-सा जग बीच पाया।

हारे विलोक हम किंतु न दृष्टि आया।

(8) मालिनी- इस छन्द में । ऽ वर्ण होते हैं तथा आठवें व सातवें वर्ण पर यति होती है। वर्णों के क्रम में

दो नगण (।।।, ।।।), एक मगन (ऽऽऽ) तथा दो यगण (।ऽऽ, ।ऽऽ) होते हैं; जैसे-

पल-पल जिसके मैं पन्थ को देखती थी,

निशिदिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती।

(9) मन्दाक्रान्ता- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक मगण (ऽऽऽ), एक भगण (ऽ।।), एक नगण (।।।), दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) मिलाकर 17 वर्ण होते हैं। चौथे, छठवें तथा सातवें वर्ण पर यति होती है; जैसे-

तारे डूबे, तम टल गया, छा गई व्योम-लाली।

पक्षी बोले, तमचर, जगे, ज्योति फैली दिशा में।।

शाखा डोली तरु निचय की, कंज फूले सरों के।

धीरे-धीरे दिनकर कढ़े, तामसी रात बीती।।

(10) शिखरिणी- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक यगण (।ऽऽ), एक मगण (ऽऽऽ), एक नगण (।।।), एक सगण (।।ऽ), एक भगण ( ऽ।।), एक लघु (।) एवं एक गुरु (ऽ) होता है। इसमें 17 वर्ण तथा छः वर्णों पर यति होता है; जैसे-

मनोभावों के हैं शतदल जहाँ शोभित सदा।

कलाहंस श्रेणी सरस रस-क्रीड़ा-निरत है।।

जहाँ हत्तंत्री की स्वरलहरिका नित्य उठती।

पधारो हे वाणी, बनकर वहाँ मानसप्रिया।।

(11) शार्दूलविक्रीडित- इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण, और अंत में गुरु। यति 12, 7 वर्णों पर होती है। यथा-

सायंकाल हवा समुद्र-तट की आरोग्यकारी यहाँ।

प्रायः शिक्षित सभ्य लोग नित ही जाते इसी से वहाँ।।

बैठे हास्य-विनोद-मोद करते सानंद वे दो घड़ी।

सो शोभा उस दृश्य की ह्रदय को है तृप्ति देती बड़ी।।

(12) सुन्दरी सवैया- जिन छंदों के प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण होते है, उन्हें ‘सवैया’ कहते हैं।

यह बड़ा ही मधुर एवं मोहक छंद है। इसका प्रयोग तुलसी, रसखान, मतिराम, भूषण, देव, घनानंद तथा भारतेंदु जैसे कवियों ने किया है। इसके अनेक प्रकार और अनेक नाम हैं; जैसे- मत्तगयंद, दुर्मिल, किरीट, मदिरा, सुंदरी, चकोर आदि।

इस छन्द के प्रत्येक चरण में आठ सगण (।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ) और अन्त में एक गुरु (ऽ) मिलाकर 25 वर्ण होते है; जैसे-

मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पसु हों तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।

पाहन हों तो वही गिरि को जो धरयौ करछत्र पुरंदर धारन।

जौ खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।।

(13) कवित्त- यह वर्णिक छंद है। इसमें गणविधान नहीं होता, इसलिए इसे ‘मुक्त वर्णिक छंद’ भी कहते हैं।

कवित्त के प्रत्येक चरण में 31 से 33 वर्ण होते हैं। इसके अनेक भेद हैं जिन्हें मनहरण, रूपघनाक्षरी, देवघनाक्षरी आदि नाम से पुकारते हैं।

मनहरण कवित्त का एक उदाहरण लें। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। अंत में गुरु होता है। 16, 15 वर्णो पर यति होती है। जैसे-

इंद्र जिमि जंभ पर बाडव सुअंभ पर,

रावण सदंभ पर रघुकुलराज हैं।

पौन वारिवाह पर संभु रतिनाह पर,

ज्यों सहस्त्रबाहु पर राम द्विजराज हैं।

दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुंड पर,

भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज हैं।

तेज तम-अंस पर कान्ह जिमि कंस पर,

प्रमुख मात्रिक छन्द

(1) चौपाई- यह मात्रिक सम छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती है। चरण के अन्त में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना वर्जित है। तुक पहले चरण की दूसरे से और तीसरे की चौथे से मिलती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है। उदाहरणार्थ-

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।

बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुनगन गावन लागे ।।

गुरु पद रज मृदु मंजुल मंजन। नयन अमिय दृग दोष विभंजन।।

तेहि करि विमल विवेक विलोचन। बरनउँ रामचरित भवमोचन ।।

(2) रोला (काव्यछन्द)- यह मात्रिक सम छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 मात्राओं पर यति ही अधिक प्रचलित है। प्रत्येक चरण के अन्त में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते हैं। दो-दो चरणों में तुक आवश्यक है। उदाहरणार्थ-

जो जगहित पर प्राण निछावर है कर पाता।

जिसका तन है किसी लोकहित में लग जाता ।।

(3) हरिगीतिका- यह मात्रिक सम छन्द है। इस छन्द के प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। 16 और 12 मात्राओं पर यति तथा अन्त में लघु-गुरु का प्रयोग ही अधिक प्रचलित है। उदाहरणार्थ-

कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।

हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ।।

(4) बरवै- यह मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। इस छन्द के विषम चरणों (प्रथम और तृतीय) में 12 और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 7 मात्राएँ होती है। सम चरणों के अन्त में जगण या तगण आने से इस छन्द में मिठास बढ़ती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है। जैसे-

वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार।

सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ।।

(5) दोहा- यह अर्द्धसममात्रिक छन्द है। इसमें 24 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरण (प्रथम व तृतीय) में 13-13 तथा सम चरण (द्वितीय व चतुर्थ) में 11-11 मात्राएँ होती हैं; जैसे-

”मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।

जा तन की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय।।”

(6) सोरठा- यह भी अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। यह दोहा का विलोम है, इसके प्रथम व तृतीय चरण में 11-11 और द्वितीय व चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती है; जैसे-

”सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।

बिहँसे करुना ऐन चितइ जानकी लखन तन।।”

(7) वीर- इसके प्रत्येक चरण में 31 मात्राएँ होती हैं। 16, 15 पर यति पड़ती है। अंत में गुरु-लघु का विधान है। ‘वीर’ को ही ‘आल्हा’ कहते हैं।

सुमिरि भवानी जगदंबा को, श्री शारद के चरन मनाय।

आदि सरस्वती तुमको ध्यावौं, माता कंठ विराजौ आय।।

ज्योति बखानौं जगदंबा कै, जिनकी कला बरनि ना जाय।

शरच्चंद्र सम आनन राजै, अति छबि अंग-अंग रहि जाय।।

(8) उल्लाला- इसके पहले और तीसरे चरणों में 15-15 तथा दूसरे और चौथे चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं। यथा-

हे शरणदायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है।

हे मातृभूमि ! संतान हम, तू जननी, तू प्राण है।।

(9) कुंडलिया- यह ‘संयुक्तमात्रिक छंद’ है। इसका निर्माण दो मात्रिक छंदों-दोहा और रोला-के योग से होता है। पहले एक दोहा रख लें और उसके बाद दोहा के चौथे चरण से आरंभ कर यदि एक रोला रख दिया जाए तो वही कुंडलिया छंद बन जाता है। जिस शब्द से कुंडलिया प्रारंभ हो, समाप्ति में भी वही शब्द रहना चाहिए- यह नियम है, किंतु इधर इस नियम का पालन कुछ लोग छोड़ चुके हैं। दोहा के प्रथम और द्वितीय चरणों में (13 + 11) 24 मात्राएँ होती हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों (13 + 11) में भी 24 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार दोहे के चार चरण कुंडलिया के दो चरण बन जाते हैं। रोला सममात्रिक छंद हैं जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रारंभ के दो चरणों में 13 और 11 मात्राएँ पर यति होती है तथा अंत के चार चरणों में 11 और 13 मात्राओं पर।

हिन्दी में गिरिधर कविराय कुंडलियों के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं। वैसे तुलसी, केशव आदि ने भी कुछ कुंडलियाँ लिखी हैं। उदाहरण देखें-

दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान।

चंचल जल दिन चारि कौ, ठाउँ न रहत निदान।।

ठाउँ न रहत निदान, जियन जग में जस लीजै।

मीठे बचन सुनाय, विनय सबही की कीजै।।

कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घर तौलत।

पाहुन निसिदिन चारि, रहत सब ही के दौलत।।

(10) छप्पय- यह संयुक्तमात्रिक छंद है। इसका निर्माण मात्रिक छंदों- रोला और उल्लाला- के योग से होता है। पहले रोला को रख लें जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होंगी। इसके बाद एक उल्लाला को रखें। उल्लाला के प्रथम तथा द्वितीय चरणों में (15 + 13) 28 मात्राएँ होंगी तथा तृतीय और चतुर्थ चरणों में भी (15 + 13) 28 मात्राएँ होंगी। रोला के चार चरण तथा उल्लाला के चार चरण- जो यहाँ दो चरण हो गये हैं- मिलकर छप्पय के छह चरण अर्थात छह पाद या पाँव हो जाएँगे। प्रथम चार चरणों में 11, 13 तथा अंत के दो चरणों में 14, 13 मात्राओं पर यति होगी।

जिस प्रकार तुलसी की चौपाइयाँ, बिहारी के दोहे, रसखान के सवैये, पद्माकर के कवित्त तथा गिरिधर कविराय की कुंडलिया प्रसिद्ध हैं; उसी प्रकार नाभादास के छप्पय प्रसिद्ध हैं। उदाहरण के लिए मैथलीशरण गुप्त का एक छप्पय देखें-

जिसकी रज में लोट-पोट कर बड़े हुए हैं।

घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं।।

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।

जिसके कारण धूल-भरे हीरे कहलाये।।

हम खेले कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।

हे मातृभूमि ! तुमको निरख मग्न क्यों न हों मोद में।।

मुक्तछंद

मुक्तछंद में न तो वर्णों का बंधन होता है और न मात्राओं का ही। कवि का भावोच्छ्वास काव्य की एक पूर्ण इकाई में व्यक्त हो जाता है। मुक्तछंद पर्वत के अंतस्तल से फूटता स्रोत है, जो अपने लिए मार्ग बना लेता है। मुक्त छंद के लिए बने-बनाये ढाँचे अनुपयुक्त होते हैं। उदाहरण के लिए एक मुक्तछंद देखें-चितकबरे चाँद को छेड़ो मत

शकुंतला-लालित-मृगछौना-सा अलबेला है।

प्रणय के प्रथम चुंबन-सा

लुके-छिपे फेंके इशारे-सा कितना भोला है।

टाँग रहा किरणों के झालर शयनकक्ष में चौबारा

ओ मत्सरी, विद्वेषी ! द्वेषानल में जलना अशोभन है।

दक्षिण हस्त से यदि रहोगे कार्यरत

तो पहनायेगा चाँद कभी न कभी जयमाला।

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