| अलंकार |
वह कारक जो काव्य की शोभा बढ़ाते हैं अलंकार कहलाते हैं।
अलंकार के भेद –
1. शब्दालंकार–
शब्दालंकार के अंतर्गत अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति प्रकाश, पुनरुक्ति वदाभास, वीप्सा सम्मिलित है ।
2. अर्थालंकार–
अर्थालंकारों के अंतर्गत उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अतिश्योक्ति, उदाहरण, दृष्टांत, विरोधाभास, भ्रांतिमान, संदेह, विभावना, विशेषोक्ति, प्रतीप, मानवीकरण, उल्लेख, स्मरण, परिकर, आक्षेप, प्रतीप, काव्यलिंग, अन्योक्ति, उपेमेयोपमा सम्मिलित है .
3. उभयालंकार–
उभयालंकार में मुख्य ये अलंकार हैं – श्लेष अलंकार जिसमें – 1.शब्द के आधार पर श्लेष और 2.अर्थ के आधार पर श्लेष आदि।
1-शब्दालंकार
अनुप्रास अलंकार
काव्य में जहाँ वर्णो की क्रमानुसार आवृत्ति हो अनुप्रास अलंकार कहते हैं ।
उदाहरण:—
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
(त अक्षर की आवृत्ति)
चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही है जल-थल में।
(च तथा ल की आवृत्ति)
रघुपति राघव राजा राम।
(र अक्षर की आवृत्ति)
भगवान भक्तों की भयंकर भूरी भीति भगाइए ।
( भ वर्ण की आवर्ती है )
अनुप्रास अलंकार के भेद –
(अ )छेकानुप्रास ( आ )श्रुत्यनुप्रास ( इ )अन्त्यानुप्रास ( ई )वृत्यनुप्रास
जहाँ एक या एक से अधिक वर्ण दो बार आये वहां छेकानुप्रास होता है .इन वर्णों का प्रयोग आदि अंत और मध्य कहीं भी हो सकता है .
(अ) छेकानुप्रास जहाँ एक या अनेक वर्णों की एक ही क्रम में आवृत्ति हो वहाँ छेकानुप्रास अलंकार होता है;
जैसे-
“इस करुणा कलित हृदय में,
अब विकल रागिनी बजती”
यहाँ करुणा कलित में छेकानुप्रास है।
उक्त काव्यांश में क वर्ण की आवृति दो बार हुई है .
(आ) श्रुत्यनुप्रास -जहाँ एक ही वर्ग से उच्चारित होनेवाले बहुत से वर्ण प्रयुक्त हो ,वहां श्रुत्यनुप्रास अलंकार होता है .
दिनान्त था ,थे दीनानाथ डूबते
सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे
स्पष्टीकरण –उक्त काव्यांश में त वर्ग के त ,थ ,द ,ध ,न वर्ण प्रयुक्त हुए है .
तुलसीदास सीदति निसिदिन देखत तुम्हार निठुराई’
यहाँ ‘त’, ‘द’, ‘स’, ‘न’ एक ही उच्चारण स्थान (दन्त्य) से उच्चरित होने। वाले वर्षों की कई बार आवृत्ति हुई है, अत: यहाँ श्रुत्यनुप्रास अलंकार है।
( इ )अन्त्यानुप्रास –जहाँ किसी काव्य पंक्ति के अंत में समान स्वर अथवा व्यंजन आते हैअर्थात पद के अन्त के एक ही वर्ण और एक ही स्वर की आवृत्ति हो, ,वहां अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है .
उदहारण –
पागल सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर
(ई) वृत्यानुप्रास –जहाँ एक या एक से अधिक वर्ण की क्रमानुसार आवृति हुई हो वहां वृत्यानुप्रास अलंकार होता है .
(वृत्यानुप्रास की तीन वृतियां बताई गई है –कोमल,मधुरा और कठोरा )
कंकन किंकिनी नूपुर धुनिसुनि
कहत लषन सन राम ह्रदय गुनि (मधुरावृति )
बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय (कोमलावृति )
सब जाति फटी दुःख की दुपटी ,कपटी न रहै जहँ एक घटी
निघटी रूचि मीचु घटी हूं घटी ,सब जीव जतिन की छूटीतटी ( कठोरावृति )
जैसे-
‘कंकन, किंकिनि, नूपुर, धुनि, सुनि’
यहाँ पर ‘न’ की आवृत्ति पाँच बार हुई है और कोमला या मधुरा वृत्ति का पोषण हुआ है। अत: यहाँ वृत्यानुप्रास है।
2- लाटानुप्रास –जब किसी वाक्य की दो या दो से अधिक बार आवृति हो परन्तु अन्वय प्रत्येक बार भिन्न हो किन्तु अर्थ में कोई अंतर नहीं पड़ता है ,वहां लाटानुप्रासअलंकार होता है .
उदहारण –
“पूत सपूत, तो क्यों धन संचय?
पूत कपूत, तो क्यों धन संचय”?
यहाँ प्रथम और द्वितीय पंक्तियों में एक ही अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग हुआ, है परन्तु प्रथम और द्वितीय पंक्ति में अन्तर स्पष्ट है, अतः यहाँ लाटानुप्रास अलंकार है।
3- पुनरुक्ति प्रकाश –जब किसी शब्द की दो या दो से अधिक बार आये किन्तु उसके अर्थ में अंतर नहीं पड़ता ,वहां पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है .
मधुर –मधुर मेरे दीपक जल
हे राम ,हमें विश्वास यही
तुम आ रहे हो, तुम आ रहे हो
ठौर- ठौर विहार करती सुन्दरी सुर नारियाँ।”
4- यमक अलंकार
एक ही शब्द, जब दो या दो से अधिक बार आये तथा उनका अर्थ अलग-अलगप्रकट करें वहाँ पर यमक अलंकार होता है ।
उदाहरण :-
जैसे-
“जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं”
यहाँ पर ‘तारे’ शब्द दो बार आया है। प्रथम का अर्थ ‘तारण करना’ या ‘उद्धार करना’ है और द्वितीय ‘तारे’ का अर्थ ‘तारागण’ है, अतः यहाँ यमक अलंकार है।
तो पर बारों उरबसी, सुन राधिके सुजान।
तू मोहन के उरबसी, छबै उरबसी समान।
कनक-कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।
काली घटा का घमंड घटा
5- श्लेष अलंकार
जिस काव्य पंक्ति में कोई एक शब्द के एक से अधिक अर्थ प्रकट हो ,श्लेष अलंकार कहलाता है ।
उदहारण
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।।
यहाँ प्रयुक्त ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ प्रकट हो रहे हैं – मोती के सन्दर्भ में पानी का अर्थ ‘चमक’ , मनुष्य के सन्दर्भ में पानी का अर्थ ‘स्वाभिमान ‘, चूने के सन्दर्भ में पानी का अर्थ ‘जल’ है।
सुवरण को ढूढ़त फिरत कवि ,व्यभिचारी,चोर
यहाँ सुवरण के तीन अर्थ हुए कवि के अर्थ में सुंदर अक्षर ,व्यभिचारी के अर्थ में सुंदर स्त्री और चोर के अर्थ में सोना
6- वक्रोक्ति अलंकार
वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ लेना वक्रोक्ति अलंकार कहलाता है अर्थात जहाँ वक्ता अलग अर्थ में बात कहता है और दूसरा भिन्न अर्थ ग्रहण करता है
उदहारण –
एक कबूतर हाथ में
पूछा कहाँ अपर है ?
अपर कैसा ,उड़ गया
वह तो सपर है
अर्थ- अपर (पंख हीन ) (पंख सहित )
राजाअपनी रानी को दो कबूतर देकर कुछ देर के लिए चले गए .कुछ देर बाद लौट कर आये तो राजा ने दो में से एक कबूतर देखकर पूछा .रानी ने कहा वह अपर (पंख हीन )कहाँ था ,वह तो सपर (पंख सहित )था ,सो उड़ गया
वक्रोक्ति के दो भेद होते है – (अ) काकु वक्रोक्ति ( ब )
(अ) काकु वक्रोक्ति- जहाँ किसी कथन का कण्ठ की ध्वनि के कारण भिन्नार्थ का बोध होता है, वहाँ काकु वक्रोक्ति अलंकार होता है;
उदहारण –
आयेहूं मधुमास के प्रीतम ऐहै नाहि
वरहिनी सखी से कहती है कि बसंत आने पर भी क्या प्रियतम नहीं आयेंगे ?
सखी प्रत्युत्तर में कहती है –क्या सचमुच बसंत आने पर भी प्रियतम नहीं आयेंगे ?
“मैं सुकुमारि, नाथ वन जोगू।
तुमहिं उचित तप मो कहँ भोगू।”
उदाहरण – जब राधाजी श्री कृष्ण को कृष्ण कहकर संबोधित करती है तो श्री कृष्ण कहते है कि मै तो घनश्याम हूँ , तो राधा जी कहती हैं जाओ कहीं और जाकर बरसो ।
(आ) श्लेष वक्रोक्ति
जहाँ वक्ता की बात को श्रोता जानबूझकर भिन्न अर्थ में ग्रहण करता है , वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है .
उदाहरण-
राधा –का तुम हो ?
कृष्ण –घनश्याम इत है
राधा –तो बरसों कित जाये
यहाँ कृष्ण अपना नाम घनश्याम बता रहे और राधा घनश्याम का अर्थ बादल के रूप में ग्रहण कर रही है .
भिक्षुक गो कित को गिरिजा
सो तो मांगन को बलि द्वार गयो री
स्पष्टीकरण –लक्ष्मी द्वारा पार्वती से यह पूछने पर कि भिक्षुक (शिव )कहाँ गए तो मनोविनोद में पार्वतीजी कहती है कि भीख माँगने बलि (श्री विष्णु )के घर गए है .अन्य उदहारण –
व नृत्य करै नित ही कित है,
ब्रज में सखि सूर-सुता के किनारे।
पशुपाल कहाँ? मिलि जाइ कहूँ,
वह चारत धेनु अरण्य मँझारे।।”
पुनरुक्तिवदाभास
जहाँ कथन में पुनरुक्ति का आभास होता है, वहाँ पुनरुक्तिवदाभास अलंकार होता है;
उदहारण –
“पुनि फिरि राम निकट सो आई।”
यहाँ ‘पुनि’ और ‘फिरि’ का समान अर्थ प्रतीत होता है, परन्तु पुनि का अर्थ-पुन: (फिर) है और ‘फिरि’ का अर्थ-लौटकर होने से पुनरुक्तिावदाभास अलंकार है।
वीप्सा
जब किसी कथन में अत्यन्त आदर के साथ एक शब्द की अनेक बार आवृत्ति होती है तो वहाँ वीप्सा अलंकार होता है;
उदहारण
“हा! हा!! इन्हें रोकन को टोक न लगावो तुम।”
यहाँ ‘हा!’ की पुनरुक्ति द्वारा गोपियों का विरह जनित आवेग व्यक्त होने से वीप्सा अलंकार है।
2– अर्थालंकार
अर्थालंकार के दो भेद है – (अ) सदृश्य मूलक अर्थालंकार (ब ) वैषम्य मूलक ( विरोध मूलक ) अर्थालंकार
(अ) सदृश्य मूलक अर्थालंकार
1-उपमा अलंकार
काव्य में जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना दूसरे समान गुण वाले व्यक्ति या वस्तु से की जाती है तब उपमा अलंकार होता है।
पहचान : सा, से, सी, सम, समान, सदृश्य, सरिता, सरिस, जिमि,
उदाहरण –
नील गगन सा शांत रस था रो रहा ।
2-रूपक अलंकार
जहां उपमेय में उपमान का आरोप किया जाए वहाँ रूपक अलंकार होता है अथवा जहां गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में ही उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। उदाहरण:—
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
आये महंत बसंत।
जलता है ये जीवन पतंग
3-उत्प्रेक्षा अलंकार
जिस काव्य पंक्ति में उपमेय और उपमान में समानता के कारण रूप में उपमान की संभावना की कल्पना व्यक्त की जाए, उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
पहचान :—उत्प्रेक्षा अलंकार में जानो, मानो , जनु, मनु, , मनहु,मानहु वाचक शब्द में से किसी एक का प्रयोग अवश्य रूप से होता है .
उदाहरण:—
उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा।
सिर फट गया उसका वही मानो अरुण रंग का घड़ा।
उत्प्रेक्षा अलंकार के दो भेद है –
( अ ) हेतु उत्प्रेक्षा (ब) वस्तूत्प्रेक्षा
( अ ) हेतु उत्प्रेक्षा –जहाँ किसी कारणवश उपमेय में उपमान की संभावना दिखाई जाये वहाँ हेतु उत्प्रेक्षा अलंकार होता है –
उदहारण –
विरह की आगि सूर जरि कांपा
मानहु राति दिवस जरे ओहि तापा
विरहाग्नि में सूर्य दिन –रात जलता रहता है अर्थात कवि ने सम्पूर्ण सृष्टि को ही जलता हुआ प्रस्तुत किया है
(ब) वस्तूत्प्रेक्षा
जहाँ सामान्यतया एक वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना व्यक्त की गयी हो वस्तूत्प्रेक्षाअलंकार होता है .
रत्नाभरण भरे अंगों में ऐसे सुंदर लगते थे
ज्यों प्रफुल्ल वल्ली पर सौ –सौ जुगनू जगमग जगते थे
स्पष्टीकरण –यहाँ नायिका के शारीर पर पहने आभूषण उपमेय है जिसमे लता पर जगमगाते जुगनूओं की संभावना व्यक्त की गई है .
4- अनन्वय अलंकार–
अनन्वय अलंकार में उपमेय के समान कोई दूसरा उपमान न मिलने पर उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है .
उदहारण –
जदपि दीन जन आरत है
तदपि भारत के सम भारत है
उक्त काव्य पंक्ति में भारत देश की तुलना भारत से ही की गई है .
5-अतिशयोक्ति अलंकार
अतिशयोक्ति अलंकार- जब किसी बात को बढ़ा चढ़ा कर बताया जाये, तब अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण –
हनुमान की पूँछ में, लग न पायी आग।
लंका सारी जल गई, गए निशाचर भाग।।
आगे नदिया परी अपार, घोरा कैसे उतरे पार
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।
6- अन्योक्ति अलंकार
जब किसी बात का प्रत्यक्ष वर्णन कर उसके समान ही किसी दूसरी वस्तु का बोध कराया जाय ,वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है .
तुलसी पावस के समय ,धरयो कोकिल मौन
अब दादुर बहु बोलिहे ,हमहिबूझि है कौन
मूर्खों (दादुर ) के बीच कोकिल (विद्वान् )का मूक रहना ही श्रेयस्कर है .
7-संदेह अलंकार
जहाँ एक वस्तु के सम्बन्ध में अनेक वस्तुओं का संदेह हो और समानता के कारण अनिश्चय की मनोदशा बनी रहे ,वहां संदेह अलंकार होता है .
उदहारण –
कैधौ ब्योम बीथिका थरे है भार धूमकेतु
वीर रस बीर तरवारी-सी उपारी है –तुलसी
8- भ्रांतिमान अलंकार
जहाँ समानता के कारण एक वस्तु में दूसरी वस्तु का भ्रम उत्पन्न हो जाये ,वहां भ्रांतिमान अलंकार होता है .
उदहारण –
कपि करि ह्रदय विचार दान्ही मुद्रिका डारि तब
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषिउठि कर गहेउ
उक्त पांति में सीताजी ,श्री राम की हीरक जडित अंगूठी को अशोक वृक्ष का फल समझ लेती है .निश्चयात्मक ज्ञान न होने के कारण उक्त पांति में भ्रांतिमान अलंकार होगा .
नाक का मोती अधर की कांति से
बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है
सोचता है अन्य शुक यह कौन है
9-दृष्टांत अलंकार
जिस काव्य पंक्ति में एक का बिम्ब दूसरे में प्रतिबिंबित होता है , दृष्टान्त अलंकार होता है।
उदाहरण
एक म्यान में दो तलवारें, कभी नहीं रह सकती है।
किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती है।
जिस प्रकार एक म्यान दो तलवारेंनहीं रह सकती ,वैसे ही एक पति दो पत्नियों के साथ सुखपूर्वक नहीं रह सकता .
सुख-दुःख के मधुर मिलन से ,यह जीवन हो परिपूरण
पिर घन में ओझल हो शशि ,फिर शशि से ओझल हो घन।
उक्त काव्यांश में शशि सुख का और घन दुःख के रूप में प्रतिबिंबित हो रहा है
10 उदहारण अलंकार
किसी बात को कहकर उसके स्पष्टीकरण हेतु कोई जग प्रसिद्द उदहारण प्रस्तुत किया जाता है ,वहाँ उदहारण अलंकार होता है.
उदहारण –
जो रहीम गति दीप की ,कुल कपूत गति सोय
बारे उजियारो करे, बढै अंधेरो होय
11- तद्गुण अलंकार
जहाँ एक वस्तु अपने गुण –और धर्म को छोड़कर दूसरों के गुणधर्म को स्वीकार कर लेती है ,वहाँ तद्गुण अलंकार होता है .
उदहारण –
अधर धरत हरि के परत ,ओठ दीठि पट ज्योति
हरित बाँसकी बांसुरी इन्द्रधनुष सी होति
12-स्मरण
पहले किसी देखि सुनी किसी वस्तु की उसके समान किसी अन्य वस्तु को देखकर अथवा सुनकर उसकी स्मृति हो आये जिसे पहले कभी देखा या सुना था ,वहाँ स्मरण अलंकार होता है .
जो होता है उदित नभ में कौमुदी कान्त आ के
प्यारा प्यारा विकचि मुखड़ा ,श्याम का याद आता
( ब ) विरोधमूलक (वैषम्यमूलक ) अलंकार
जहाँ उपमेय उपमान में विरोध प्रकट किया जाए ,अथवा विपरार्थक बताकर चमत्कार उत्पन्न किया जाए ,वहाँ विरोधमूलक (वैषम्यमूलक ) अलंकार होता है . वैषम्यमूलक पूरक अलंकारों में विरोधाभास आदि आते है .
(1 )विरोधाभास –
जहाँ काव्य दृष्टि से परस्पर विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास हो ,वहाँविरोधाभास अलंकार होता है .
या अनुरागी गति समझे नही कोय
ज्यो-ज्यो बूडै स्याम रंग,त्यों –त्यों उज्ज्वल होय
स्पष्टीकरण –काले रंग में डूबने पर भी वह और भी उज्ज्वल हो रहा है
(2)- विभावना अलंकार
विभावना अलंकार -जहाँ कारण के न होते हुए भी कार्य का होना पाया जाता है, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
उदाहरण –
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।
स्पष्टीकरण –उक्त काव्यांश में बिना पैरों के चला जाना ,बिना हाथों के कर्म करना ,मुख रहित होने पर रसास्वादन करना और बिना वाणी के कथन का होना प्रकट हो रहा है .
(3) अपह्नुति अलंकार –
जहाँ सत्य का निषेध करके मिथ्या की स्थापना की जाए वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है अर्थात उपमेय का निषेध करके उपमान की स्थापना की जाती है .
है न सुधा यह है सुधा संगती साधू समाज
उक्त काव्यांश में सुधा का निषेध करके उसकी स्थापना साधु संगति से की है .
(अ ) हेत्वापह्नुति –
जहाँ उपमेय का निषेध करके उपमान का आरोप किया गया हो वहाँ हेत्वापह्नुती अलंकार होता है .
पहले आँखों में थे ,मानस में कूद मग्न प्रिय अब है
छीटें वहीँ उड़े थे ,बड़े –बड़े अश्रु वे कब थे
उक्त काव्यांश में आंसुओं का निषेध करके उसके स्थान पर पानी के छीटें का आरोप किया गया है .
(आ ) छेकापह्नुति
जहाँ किसी बात का वर्णन करते समय श्रोता गूढ़बात समझ जाये किन्तु चतुराई से निषेध करके उसका मिथ्या समाधान प्रस्तुत करे वहाँ छेकापह्नुतिअलंकार होता है .
वो आयजब शादी होय ,उस बिन दूजा और न कोय
हे सखि,साजन ,ना सखिढोल उक्त काव्यांश में दूल्हे की अनिवार्यता तो बतलाई गयी है किन्तु सहेली के पूछने पर नायिका सत्य छुपाकर असत्य कहती है कि वह दूल्हे के बारे में नहीं अपितु ढोल के बारे में बात कर रही थी .
(4 )प्रतीप अलंकार
‘प्रतीप’ अर्थात ‘विपरीत’। यह उपमा अलंकार के बिल्कुल विपरीत होता है क्योंकि इस अलंकार में उपमान को हीन दिखाकर उपमेय की श्रेष्टता स्थापित की जाती है .
उदाहरण-
सिय मुख समता किमि करै चन्द वापुरो रंक।
(5) व्यतिरेक अलंकार–
जिस काव्यांश में उपमान की अपेक्षा उपमेय की श्रेष्ठता आरोपित की जाये ,व्यतिरेक अलंकार होता है .
जिस काव्यांश में उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाता है, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
उदाहरण
स्वर्ग कि तुलना उचित ही है यहाँ,
किन्तु सुर सरिता कहाँ सरयू कहाँ।
वह मरों को पार उतारती,
यह यहीं से सबको ताँती।।
जन्म सिंधु पुनि बंधु विष,दीनन मलिन सकलंक|
सीय मुख समता पाव किमी चंद्र बापूरो रंक ||
( 6 ) विशेषोक्ति–
जहाँ कारण उपस्थित होने पर भी कार्य नहीं होता हो ,वहाँ विशेषोक्ति- अलंकार होता है .
उदहारण –
बरसत रहत अछेह वै, नैन वारि की धार
नेहहु मिटति न है तऊ ,तो वियोग की झार
विरहणी नायिका के नेत्रों से निरंतर अश्रु धारा बह रही है किन्तु वियोग अग्नि बुझ नहीं रही है .
(7) असंगति
जहाँ कारण किसी अन्य स्थान पर तथा कार्य कहीं अन्यत्र स्थान पर घटित होना वर्णित होता है वहाँ असंगति अलंकार होता है।
उदहारण –कारागार में तो पैदा हुए
आनंद मनाया गया किन्तु नन्द धाम में
पीर राम उर उठी, लग्यो लखन के घाव।
घाव की पीड़ा लक्षमण के हृदय में होनी चाहिए किन्तु पीड़ा को राम के हृदय में बताया गया है।
8-निदर्शना अलंकार –
जब दो उपमेय और उपमान के वाक्यार्थ में भिन्नता होते हुए भी दोनों के मध्य समानता स्थापित की जाये ,वहाँ निदर्शना अलंकार होता है .
युद्ध जीतना जो चाहते है तुमसे बैर बढाकर
जीवित रहने की इच्छा वे करते है विष खाकर
9-अर्थान्तरन्यास अलंकार –
जहाँ सामान्य कथन का विशेष कथन द्वारा और विशेष कथन का सामान्य कथन द्वारा समर्थन किया जाता है ,वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है .
उदहारण –
क्या सांप्रदायिक भेद से है ऐक्य मिट सकता अहो ?
बनती नहीं क्या एक माला विविध सुमनों की कहो
10 –ब्याजस्तुति अलंकार
जिस काव्य पंक्ति में वर्णन बाह्यरूप से निंदा सा प्रतीत हो किन्तु वास्तविक रूप में स्तुति की जा रही हो वहा ब्याजस्तुति अलंकार होता हैं।
यमुना तुम अविवेकिनी कौन लियौ यह ढंग ।
पापिन सौ निज बन्धु कौ करावति भंग ॥
ब्याजनिन्दा अलंकार
जिस काव्य पंक्ति में वर्णन बाह्यरूप से स्तुति सा प्रतीत हो किन्तु वास्तविक रूप में निंदा की जा रही हो वहा ब्याजनिंदा अलंकार होता हैं।
उदहारण –
नाक कान बिनु भगिनी तिहारी,क्षमा किंह तुम धर्म बिचारी।
लाजवंत तुम सहज सुभाय निज गुण निज मुख कहसि न काऊ।।
(11) परिकर अलंकार
जहाँ वर्ण्य विषय का वर्णन करने के लिए उसके साथ ऐसा विशेषण प्रयुक्त किया जाता है जो किसी विशेष अभिप्राय युक्त होता है ,वहाँ परिकर अलंकार होता है।अर्थात विशेष प्रयोजन से विशेषण के द्वारा विशेष्य का कथन किया जाता है .
उदाहरण:
चक्रपाणि हरि को सम्मुख लख असुर सभी भग जाते है
उक्त काव्य पंक्ति में चक्रपाणि विशेषण साभिप्राय प्रयुक्त हुआ है श्री विष्णु के लिए क्योकि हाथ में चक्र देखकर राक्षस भाग रहे है
( 12 ) परिकरांकुर अलंकार
जैसा कि परिकर अलंकार में साभिप्राय विशेषण का प्रयोग होता है ,वैसे ही परिकरांकुर अलंकार में साभिप्राय विशेष्य अर्थात उपमान प्रयुक्त होता है अर्थात विशेष्य का प्रयोग विशेष अभिप्राय के उद्देश्य से होता है .
उदहारण –
हे हरि ,कस न हरहु भ्रम भारी
कवि ने हरि शब्द का प्रयोग इस विशेष उद्देश्य से किया है कि भ्रम का हरण हरि अर्थात हरण कर्ता ही कर सकते है
(13)परिसंख्या
जहाँ किसी वस्तु को अन्य स्थान से हटाकर किसी एक ही स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है ,वहाँ परिसंख्या अलंकार होता है .
उदहारण –
नृपतिराम के राज्य में है न शूल दुःख मूल
लखियत चित्रण में लिखो शकर के कर शूल
श्रीराम के राज्य में कहीं भी शूल अर्थात दुःख दिखाई नहीं देता है केवल भगवान शिव के त्रिशूल में ही शूल दिखाई दे सकता है .
(14) यथासंख्या –
जहाँ कुछ पदार्थों का उल्लेख करके उसी क्रम में उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य पदार्थों ,कार्यों या उनके गुणों को वर्णित किया जाता है अर्थात इसमें एक क्रम से कुछ पदार्थों का उल्लेख कर दिया जाता है फिर उसी क्रम से दूसरे पदार्थों से अन्वय किया जाता है।
चातक हंस सराहिए टेक विवेक विभूति
जहाँ अनुक्रम के अनुसार पदार्थों का संबंध दिखाया फिर इसमें क्रम से कहे हुऐ सम्बंधित गुणों का उसी क्रम में अन्वय दिखाया गया है . उक्त काव्य पांति में चातक और हंस का उल्लेख कर उनसे सम्बंधित गुण यथा –प्रतिज्ञा और विवेक का क्रम से वर्णन किया गया है .
अन्य उदहारण –
(1)भुज भुजंग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि |
विवरन, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरी उरनी ||
उक्त काव्य पंक्ति में भुजंग, सरोज और विधु का जिस क्रम में वर्णन किया गया है उसी क्रम में विवर्ण, सलिल और नभ का वर्णन हुआ है |
(2) कलहंस, कलानिधि, खञ्जन, कञ्ज,
कछु दिन केसव देखि जिये |
गति, आनन, लोचन, पायन के,
अनुरूपक से मन मानि लिये ||
उक्त काव्य पंक्ति में कलहंस, कलानिधि, खंजन और कंज का संबंध क्रमशः सीता जी की गति, आनन, लोचन और पायन से स्थापित किया गया है |
(15) विशेषण – विपर्यय
जहाँ अर्थ में लाक्षणिकता का प्रभाव उत्पन्न करने के विशेषण का विपर्यय अर्थात विपरीत करके उसे व्यक्ति से पृथक कर किसी अन्य वस्तु के साथ प्रयुक्त कर दिया जाता है ,तो वहाँ विशेषण – विपर्ययअलंकार होता है .
उदहारण –
इस करूणा कलित ह्रदय में
क्यों विकल रागिनी बजती
उक्त काव्य पंक्ति में ह्रदय का विशेषण विकल होना चाहिए था और रागिनी का करूणा कलित परन्तु विशेषण परिवर्तित हो जाँने से यह विशेषण – विपर्यय अलंकार हो गया .
(16) मानवीकरण–
जहां काव्य में चेतन ( प्रकृति ) -अचेतन ( वस्तु या पदार्थ ) को , मनुष्य के समान व्यवहार करते हुए प्रस्तुत किया जाये अथवा आरोपण किया गया हो , मानवीकरण अलंकार कहलाता है .
उदहारण –
जगीं वनस्पतियाँ अलसाई, मुख धोती शीतल जल से। (जयशंकर प्रसाद)


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